Brain Eating Amoeba: केरल में ब्रेन इटिंग अमीबा से दहशत, क्या है यह बीमारी? बचाव और इलाज; एक सप्ताह में हो जाती है मौत

Published by : ArbindKumar Mishra Updated At : 18 Sep 2025 10:19 PM

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AI फोटो

Brain Eating Amoeba: केरल में दिमाग खाने वाले अमीबा (Brain-eating amoeba) ने दहशत फैला दिया है. इस बीमारी से राज्य में पिछले 1 महीने में 19 लोगों की मौत हो चुकी है. एक 9 वर्षीय बच्ची ब्रेन इटिंग बीमारी से संक्रमित होने के बाद मर गई. जिसके बाद पूरे परिवार को रो-रोकर बुरा हाल है. लड़की की मां का कहना है कि वह अभी भी अपनी बेटी की मौत को स्वीकार नहीं कर पा रही हैं. रोती हुई मां ने कहा, "मुझे विश्वास नहीं हो रहा है कि मेरी बेटी चली गई." इस बीमारी की भयावहता को इसी से समझा जा सकता है. इस स्टोरी में आपको बताएंगे कि ब्रेन इटिंग बीमारी क्या है और उससे बचाव के क्या उपाय हैं.

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Brain Eating Amoeba: केरल एक दुर्लभ लेकिन घातक बीमारी से जूझ रहा है. इस बीमारी से हाल के महीनों में 19 लोगों की जान गई है. इस साल राज्य में इसके 70 से ज्यादा मामले सामने आ चुके हैं. इसका कारण एक सूक्ष्म परजीवी है जिसे नेगलेरिया फाउलेरी (Brain-eating amoeba) के नाम से जाना जाता है. इसे “दिमाग खाने वाला अमीबा” कहा जाता है, जो प्राथमिक अमीबिक मेनिंगोएन्सेफलाइटिस या पीएएम नामक स्थिति उत्पन्न करता है.

ब्रेन इटिंग बीमारी किस कारण से होता है?

ब्रेन इटिंग बीमारी एक दुर्लभ लेकिन लगभग घातक मस्तिष्क संक्रमण है, जो नेगलेरिया फाउलेरी (दिमाग खाने वाले अमीबा) के कारण होता है. यह संक्रमण अमूमन जानलेवा होता है, और इससे संक्रमित होने वाले 98 प्रतिशत से ज्यादा लोगों की मौत हो जाती है.

ब्रेन इटिंग बीमारी का अमीबा कहां पाया जाता है?

अमीबा गर्म मीठे पानी जैसे तालाबों, झीलों, नदियों और खराब रखरखाव वाले स्विमिंग पूलों में पाया जाता है. स्वास्थ्य अधिकारियों के अनुसार, इसे निगलने पर यह बीमारी का कारण नहीं बनता है, लेकिन जब पानी नाक में चला जाता है तो परजीवी नाक के रास्ते मस्तिष्क में प्रवेश कर सकता है. इससे यह मस्तिष्क में सूजन और ऊतकों के विनाश का कारण बनता है. यह रोग बहुत तेजी से बढ़ता है.

ब्रेन इटिंग बीमारी से एक से दो सप्ताह के भीतर मृत्यु हो जाती है

एक स्वास्थ्य अधिकारी के अनुसार, ‘‘बुखार, सिरदर्द, मतली और गर्दन में अकड़न से शुरू होने वाली स्थिति जल्द ही दौरे और कोमा में बदल जाती है. आमतौर पर एक से दो सप्ताह के भीतर मृत्यु हो जाती है.’’ डॉक्टर का कहना है कि इसे अक्सर बैक्टीरियल मैनिंजाइटिस समझ लिया जाता है, और जब वास्तविक कारण का पता चलता है, तब तक मरीज को बचाने में बहुत देर हो चुकी होती है.

ऐसी कोई दवा नहीं है जो पीएएम का इलाज कर सके

स्वास्थ्य अधिकारियों ने कहा कि इसका इलाज बेहद मुश्किल है. ऐसी कोई एक दवा नहीं है जो पीएएम का इलाज कर सके और दुनिया भर में इससे बचने वाले लोग बहुत कम हैं. जो मरीज इस बीमारी से उबर चुके हैं, उनका इलाज शक्तिशाली दवाओं जैसे एम्फोटेरिसिन बी, मिल्टेफोसिन और रिफाम्पिसिन के संयोजन से किया गया, साथ ही इस बीमारी के साथ होने वाली खतरनाक मस्तिष्क सूजन को कम करने के लिए उपचार भी किया गया.

रोकथाम ही बीमारी से बचाव, बच्चों को होज या स्प्रिंकलर से रखें दूर

यह रोग अत्यंत दुर्लभ है, फिर भी इसकी उच्च मृत्यु दर ने चिंता पैदा कर दी है. विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि रोकथाम ही सबसे अच्छा बचाव है. लोगों को सलाह दी जाती है कि वे गर्मी के मौसम में स्थिर या खराब रखरखाव वाले मीठे पानी के स्रोतों में न तैरें और न ही गोता लगाएं. अगर तैरना जरूरी हो तो नाक में क्लिप लगाएं जिससे पानी के नाक में जाने का खतरा कम हो सकता है. डाक्टरों का कहना है कि बच्चों को होज या स्प्रिंकलर से नहीं खेलना चाहिए, इससे पानी नाक में जाने का खतरा है. बगीचे की होज को इस्तेमाल करने से पहले अच्छी तरह धोना चाहिए. पैडलिंग पूल की रोजाना सफाई, स्विमिंग पूल का उचित क्लोरीनीकरण और नाक धोने के लिए केवल उबला हुआ या फिल्टर किया हुआ पानी इस्तेमाल करने की भी सलाह दी गई है.

अमीबा गर्म पानी में पनपता है, जलवायु परिवर्तन से बढ़ सकता है पीएएम का खतरा

वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन से पीएएम का खतरा बढ़ सकता है. अमीबा गर्म पानी में पनपता है और उच्च तापमान पर पनपने वाले बैक्टीरिया पर निर्भर करता है. गर्मियां बढ़ने से परजीवी का दायरा बढ़ सकता है और ज्यादा लोग राहत की तलाश में झीलों और नदियों की ओर रुख कर सकते हैं, जिससे बीमारी के संपर्क में आने की आशंका बढ़ जाती है.

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लेखक के बारे में

By ArbindKumar Mishra

अरबिंद कुमार मिश्रा वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल में एक अनुभवी पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं. अप्रैल 2011 से संस्थान का हिस्सा रहे अरबिंद के पास पत्रकारिता के क्षेत्र में बतौर रिपोर्टर और डेस्क एडिटर 15 वर्षों से अधिक का अनुभव है. वर्तमान में वह नेशनल और इंटरनेशनल डेस्क की जिम्मेदारी संभालने के साथ-साथ एक पूरी शिफ्ट का नेतृत्व (Shift Lead) भी कर रहे हैं. विशेषज्ञता और अनुभव अरबिंद की लेखनी में खबरों की गहराई और स्पष्टता है. उनकी मुख्य विशेषज्ञता इन क्षेत्रों में है. राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मामले: वैश्विक राजनीति और देश की बड़ी घटनाओं पर पैनी नजर. खेल पत्रकारिता: झारखंड में आयोजित 34वें नेशनल गेम्स से लेकर JSCA स्टेडियम में हुए कई अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैचों की ग्राउंड रिपोर्टिंग का अनुभव. झारखंड की संस्कृति: राज्य की कला, संस्कृति और जनजातीय समुदायों की समस्याओं और उनकी जीवनशैली पर विशेष स्टोरीज. पंचायतनामा: ग्रामीण विकास और जमीनी मुद्दों पर 'पंचायतनामा' के लिए विशेष ग्राउंड रिपोर्टिंग. करियर का सफर प्रभात खबर डिजिटल से अपने करियर की शुरुआत करने वाले अरबिंद ने पत्रकारिता के हर आयाम को बखूबी जिया है. डिजिटल मीडिया की बारीकियों को समझने से पहले उन्होंने आकाशवाणी (All India Radio) और दूरदर्शन जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में एंकरिंग के जरिए अपनी आवाज और व्यक्तित्व की छाप छोड़ी है. शिक्षा और योग्यता UGC NET: अरबिंद मिश्रा ने यूजीसी नेट (UGC NET) उत्तीर्ण की है. मास्टर्स (MA): रांची यूनिवर्सिटी के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग से एमए की डिग्री. ग्रेजुएशन: रांची यूनिवर्सिटी से ही मास कम्युनिकेशन एंड जर्नलिज्म में स्नातक.

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