Main Vaapas Aaunga Review:प्यार और विस्थापन की इस भावुक कहानी में बेमिसाल हैं नसीरुद्दीन शाह

Published by : Urmila Kori Updated At : 12 Jun 2026 5:34 AM

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मैं वापस आऊंगा रिव्यू, फोटो- इंस्टाग्राम

इम्तियाज अली निर्देशित फिल्म 'मैं वापस आऊंगा' देखने की प्लानिंग है तो इससे पहले पढ़ लें यह रिव्यु

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फिल्म – मैं वापस आऊंगा
निर्माता-अप्प्लॉज और इम्तियाज अली
निर्देशक – इम्तियाज अली
कलाकार -नसीरुद्दीन शाह, वेदांग रैना, शरवरी,दिलजीत दोसांझ,बनिता संधू ,डॉली अहलूवालिया और अन्य
प्लेटफार्म -सिनेमाघर
रेटिंग – साढ़े तीन

main vaapas aaunga review :हिंदी सिनेमा में अपनी फिल्मों के जरिये प्यार की गहरी परिभाषा गढ़ने वाले फिल्मकार इम्तियाज अली आज रिलीज हुई फिल्म ‘मैं वापस आऊंगा’ से एक ऐसी प्रेमकहानी को लेकर आये हैं. जिसमें पहले प्यार की यादों को विभाजन और दशकों का अलगाव भी नहीं मिटा पाया है. यह प्रेमकहानी सिर्फ भारत के विभाजन और उससे हुए विस्थापितों के दर्दनाक अध्याय को नहीं दिखाती है बल्कि दुनिया भर के विस्थापितों के दर्द को खुद में समेटती है. जिस वजह से कुछ खामियों के बावजूद यह भावनात्मक फिल्म खास बन गयी है.

ये है फिल्म की कहानी

फ़िल्म की कहानी चंडीगढ़ के 95 वर्षीय बिजनेसमैन ईशर उर्फ़ कीनू ( नसीरुद्दीन शाह )से शुरू होती है. जो एक दिन अचानक अपने ड्राइवर को कहता है कि उसे सरगोधा जाना है . मालूम पड़ता है कि सरगोधा दूसरी तरफ़ यानी पाकिस्तान में है .ईशर जिद्द करता है लेकिन अटारी बॉर्डर पर तैनात पुलिस उसे रोक देती है और तभी ईशर को स्ट्रोक आ जाता है. परिवार वालों को लगता है कि कुछ घंटों की बात है लेकिन ईशर की जान नहीं जा रही है . उसकी आती जाती यादें उसे उसके बंटवारे के पहले की जिंदगी में वापस ले जाते हैं. सरहद पार किसी से किया कुछ वादा है ,जो उसे उसके आखिरी दिनों में भी उसे सुकून नसीब नहीं होने दे रहा है.लंदन से वापस आये उसके पोते निर्वैर ( दिलजीत दोसांझ ) उनकी उन आधी अधूरे बातों की कड़ियों को जोड़ते हुए खुद पाकिस्तान के सरगोधा पहुँच जाता है. क्या निर्वेर अपने दादा के दर्द को खत्म कर पाएगा. क्या वह अपने दादाजी की पहली मोहब्बत से आखिरी इजाजत दिला पायेगा। अपने दादा ईशर के पहली मोहब्बत तलाशने की इस जर्नी में क्या वह खुद को भी तलाश पायेगा. यही आगे की कहानी है.

फिल्म की खूबियां और खामियां

इम्तियाज अली अपनी फिल्मों से हमेशा प्यार को सिर्फ एक भावना नहीं बल्कि जर्नी बताते आए हैं. खुद को जानने की. समझने की और स्वीकारने की जर्नी . निर्वेर के किरदार अपने दादा के 78 सालों की जर्नी से खुद को जानता ,समझता और स्वीकारता है लेकिन यह मूल कहानी नहीं है. बस उसका सब प्लाट है. मूल कहानी विभाजन के बैकड्रॉप पर प्रेमकहानी और विस्थापन के दर्द की कहानी है.अपनी पिछली फिल्मों की तरह यहाँ भी निर्देशक के तौर पर इम्तियाज ने दो कहानियां सामानांतर में दिखा रहे हैं.भले ही उनका कालखंड अलग अलग हो. दोनों ही कहानियों को बहुत ही सफाई के साथ गूंथा गया है.निर्देशक इम्तियाज के साथ साथ फिल्म एडिटर आरती बजाज भी इसके लिए तारीफ़ की काबिल हैं.विभाजन की दिल दहला देने वाली त्रासदी को यह फ़िल्म दिखाती है लेकिन किसी एक कौम दोषी नहीं बताती है बल्कि दूसरे प्लेनेट मार्श से आया हुआ बताती है.जो कहीं ना कहीं नफरती लोगों की सोच पर चोट करती है.फिल्म के आखिरी आधा घंटा फिल्म को ग्लोबल बना गया है. यह सिर्फ एक प्रेम कहानी नहीं रह जाती है बल्कि दुनिया भर के विस्थापितों की कहानी बन जाती है.पूरी दुनिया ऐसे लोगों से भरी पड़ी है.जिनसे जंग तो कभी राजनीति ने उनका सबकुछ छीन लिया है और वह अपना घर छोड़कर दर दर ठोकरें खाने को मजबूर हो गए हैं.फिल्म के आखिर में कुछ लाइन्स परदे पर आती है कि अगर घर और मौत में से किसी एक को चुनना हो तो मौत को चुनुंगा लेकिन हम रिफ्यूजियों को चुनने का मौका नहीं दिया जाता है .यह चंद लाइनें बहुत कुछ बयान करती हैं. फिल्म विभाजन के जहर को चुपचाप उस पीढ़ी द्वारा पीने पर भी सवाल उठाती है.फिल्म की कुछ खामियां भी हैं. कइयों को फिल्म स्लो लग सकती है खासकर पहले भाग में कहानी की रफ़्तार धीमी रह गयी लेकिन सेकेंड हाफ ना सिर्फ इस शिकायत को दूर करता है बल्कि फिल्म बेहद प्रभावी बन जाती है.तकनीकी रूप से भी फिल्म सशक्त है.फ़िल्म के सिनेमेटोग्राफर सिल्वेस्टर फोंसेका विशेष तौर पर बधाई के पात्र हैं. जिन्होंने आज़ादी के पहले के भारत और विभाजन के बाद के भारत को बखूबी दर्शाया है। गीत संगीत की बात करें तो ए आर रहमान की जादुई धुन और गीतकार इरशाद कामिल के शब्दों में मस्कारा , क्या कमाल है याद रह जाते हैं.संवाद कहानी और किरदारों को मजबूती देते हैं.

शानदार रहे हैं सारे कलाकार लेकिन नसीरुद्दीन शाह बेमिसाल

हिंदी सिनेमा के परिपक्व और सशक्त अभिनेता नसीरुद्दीन शाह का अभिनय इस फिल्म की सबसे बड़ी यूएसपी है.जिस तरह से उन्होंने 90 साल के बुजुर्ग का किरदार परदे पर जिया है.वह इस फिल्म को और मजबूत बना गया है. पहले ही सीन में न्यूज एंकर से अपनी बात ना सुनने पर बिफर जाने वाला दृश्य हो या फिर आखिरी दृश्य में शरवरी की तस्वीर देखकर अपनी दाढ़ी को ठीक करना ये सभी इस फिल्म को खास बनाते हैं. दिलजीत दोसांझ अपनी भूमिका में छाप छोड़ते हैं तो शरवरी दिल जीत ले जाती हैं.युवा कलाकार वेदांग रैना की भी तारीफ़ बनती है.दोनों के बीच की केमिस्ट्री मासूमियत और सादगी से भरी है.अंजना सुखानी,संजय सूरी,रजत कपूर,मनीष चौधरी,डॉली अहलूवालिया सहित बाकी के कलाकारों ने भी अपनी अपनी भूमिका के साथ न्याय किया है.


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Urmila Kori

लेखक के बारे में

By Urmila Kori

I am an entertainment lifestyle journalist working for Prabhat Khabar for the last 14 years. Covering from live events to film press shows to taking interviews of celebrities and many more has been my forte. I am also doing a lot of feature-based stories on the industry on the basis of expert opinions from the insiders of the industry.

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