ओमलो रिव्यू: घरेलू हिंसा और समाज की कड़वी सच्चाई दिखाती है ‘ओमलो’, दिल को छू जाएगी यह फिल्म

ओमलो मूवी रिव्यू, फोटो- इंस्टाग्राम
ओमलो रिव्यू: वेव्स ओटीटी पर रिलीज हुई ‘ओमलो’ घरेलू हिंसा, महिला उत्पीड़न और समाज की कड़वी सच्चाई को बेहद सरल और भावुक अंदाज में दिखाती है. पढ़ें फिल्म का पूरा रिव्यू.
फ़िल्म समीक्षा: ‘ओमलो’
कलाकार: शम्भो महाजन, सोनू रणदीप चौधरी, सोनाली शर्मिष्ठा, देवा शर्मा, महेश जिलोवा, वंदना गुप्ता
निर्देशक: सोनू रणदीप चौधरी
निर्माता: नेहा पांडे, रोहित मखीजा, मनीष गोपलानी, सोनू रणदीप चौधरी
अवधि: 1 घंटा 32 मिनट
भाषा: हिंदी (राजस्थानी)
रिलीज की तारीख: 3 जुलाई 2026
प्लेटफार्म: वेव्स ओटीटी
रेटिंग : 3.5
ऐसे समय में जब ज्यादातर फिल्में बड़े सितारों, भव्यता और मनोरंजन के फॉर्मूले के आसपास घूमती हैं, वहीं हिन्दी (राजस्थानी) फिल्म ‘ओमलो’ समाज के उस दर्दनाक सच को सामने लाती है जिसके बारे में अक्सर लोग बात करने से बचते हैं. निर्देशक और लेखक सोनू रणदीप चौधरी ने घरेलू हिंसा, महिला उत्पीड़न, पितृसत्तात्मक सोच और पीढ़ियों से चल रहे मानसिक आघात जैसे गंभीर विषयों को बेहद संवेदनशीलता के साथ पर्दे पर उतारने की कोशिश की है. यह फिल्म केवल एक कहानी नहीं सुनाती बल्कि दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर हिंसा और दर्द की यह विरासत कब टूटेगी.
कहानी
फिल्म की कहानी राजस्थान के एक दूरदराज रेगिस्तानी गांव से शुरू होती है जहां तपती धूप के बीच मजदूरी करके लौट रही सावित्री अपने बच्चों के साथ घर की ओर निकलती है. उसके सिर पर मेहनत का बोझ है और जिंदगी की जिम्मेदारियां भी. फिल्म की शुरुआत से ही दर्शक गांव की उस दुनिया में पहुंच जाता है जहां संघर्ष रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है.
इसी दौरान एक समानांतर दृश्य में खुले रेगिस्तान में एक ऊंट को आजाद किया जाता है. उसके पैरों से बंधी रस्सियां खोल दी जाती हैं, लेकिन वह अपनी आजादी को लेकर भी असमंजस में दिखाई देता है। यह दृश्य प्रतीकात्मक रूप से पूरी फिल्म की आत्मा को दर्शाता है.
घर पहुंचने पर सावित्री को पता चलता है कि उसके ससुर की मृत्यु हो चुकी है और यहीं से कहानी भावनात्मक रूप से गहरी होने लगती है. आर्थिक तंगी, शराबी पति, सामाजिक दबाव और एक महिला की अनकही पीड़ा धीरे-धीरे कहानी की परतों में सामने आती है.
इन सबके बीच छोटा ओमलो अपनी मासूम आंखों से यह सब देखता रहता है। वह बहुत कुछ समझना चाहता है, बहुत कुछ बदलना चाहता है, लेकिन उसकी उम्र और परिस्थितियां उसे बेबस बना देती हैं. कहानी छोटी-छोटी घटनाओं के जरिए बड़े सामाजिक सवाल खड़े करती है और यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है.
निर्देशन
निर्देशक सोनू रणदीप चौधरी ने कहानी को जरूरत से ज्यादा नाटकीय बनाने के बजाय उसे वास्तविकता के करीब रखने की कोशिश की है. फिल्म कहीं भी बनावटी नहीं लगती और यही इसकी सबसे बड़ी खूबी बनकर सामने आती है.
राजस्थान की ग्रामीण संस्कृति, भाषा, रहन-सहन और सामाजिक संरचना को बहुत बारीकी से दिखाया गया है. फिल्म का हर दृश्य ऐसा महसूस कराता है जैसे दर्शक किसी कहानी को नहीं बल्कि किसी परिवार की असली जिंदगी को देख रहा हो.
पटकथा धीमी जरूर है लेकिन अपने भावनात्मक प्रभाव से दर्शकों को लगातार जोड़े रखती है.
अभिनय
शंभो महाजन ने ‘ओमलो’ के किरदार में अपनी मासूमियत और भावनात्मक अभिव्यक्ति से प्रभावित किया है. बिना ज्यादा संवादों के भी वह कई दृश्यों में गहरी छाप छोड़ते हैं.
सोनाली शर्मिष्ठा सावित्री के किरदार में बेहद स्वाभाविक नजर आती हैं. उनके अभिनय में दर्द, संघर्ष और मजबूरी साफ महसूस होती है. कई जगह ऐसा लगता है कि वह कोई अभिनेत्री नहीं बल्कि वास्तव में गांव की एक महिला हैं जो अपनी जिंदगी जी रही है.
सोनू रणदीप चौधरी शराबी और गैरजिम्मेदार पति के किरदार में पूरी तरह फिट बैठते हैं और उनका अभिनय कहानी की वास्तविकता को और मजबूत बनाता है.
वंदना गुप्ता अपने छोटे लेकिन प्रभावी किरदार से याद रह जाती हैं. देवा शर्मा और महेश जिलोवा भी अपने हिस्से के किरदारों को मजबूती देते हैं.
म्यूजिक और तकनीकी पहलू
राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता गाजी खान बरना और भुवन आहूजा का संगीत फिल्म के भावनात्मक पक्ष को और मजबूत बनाता है. वहीं देवेंद्र भोमे का बैकग्राउंड स्कोर दृश्यों की संवेदनशीलता को और बढ़ाता है.
राजस्थान के श्री डूंगरगढ़ और बीकानेर की वास्तविक लोकेशनों पर की गई शूटिंग फिल्म की सबसे बड़ी तकनीकी ताकतों में से एक है. सिनेमैटोग्राफर विल्सन रैबिन्से ने रेगिस्तान की विशालता और गांव की सादगी को खूबसूरती से कैमरे में उतारा है.
फाइनल वर्डिक्ट
‘ओमलो’ किसी व्यक्ति को समस्या नहीं बताती बल्कि उस सोच और व्यवस्था की ओर इशारा करती है जो पीढ़ियों से समाज में चली आ रही है. फिल्म बेहद संवेदनशील तरीके से दिखाती है कि बचपन में देखा गया दर्द और हिंसा किस तरह आगे की पीढ़ियों को प्रभावित करता है.
ओमलो केवल एक बच्चे का नाम नहीं बल्कि उम्मीद का प्रतीक बनकर उभरता है – एक ऐसी उम्मीद जो इस अंतहीन चक्र को बदल सकती है.
यह फिल्म मनोरंजन से ज्यादा एक भावनात्मक अनुभव है. यह बड़े-बड़े संवादों से नहीं बल्कि छोटी-छोटी घटनाओं के जरिए दिल तक पहुंचती है और लंबे समय तक दर्शकों के मन में अपनी छाप छोड़ने की क्षमता रखती है.
अगर आप ऐसी फिल्मों को पसंद करते हैं जो सिर्फ कहानी न सुनाकर समाज का आईना भी दिखाती हैं, तो ‘ओमलो’ जरूर देखी जानी चाहिए.
प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी
लेखक के बारे में
By Sheetal Choubey
Loading Review Hub...
Prabhat Khabar App :
देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए










