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फिल्‍म रिव्‍यू: उपेक्षित वर्ग के आत्मसम्मान की कहानी ''अनारकली ऑफ़ आरा''

Updated at : 24 Mar 2017 1:47 PM (IST)
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फिल्‍म रिव्‍यू: उपेक्षित वर्ग के आत्मसम्मान की कहानी ''अनारकली ऑफ़ आरा''

II उर्मिला कोरी II फिल्म: अनारकली ऑफ़ आरा निर्माता: संदीप कपूर ,प्रिया आहूजा कपूर निर्देशक: अविनाश दास कलाकार: स्वरा भास्कर, पंकज त्रिपाठी, संजय मिश्रा, इश्तेयाक खान, मयूर मोरे, विजय कुमार और अन्य रेटिंग: साढ़े तीन अमिताभ बच्चन की ‘पिंक’ फिल्म में एक औरत की मर्जी की बात कही गई थी. फिल्म में दिखाया था कि […]

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II उर्मिला कोरी II

फिल्म: अनारकली ऑफ़ आरा

निर्माता: संदीप कपूर ,प्रिया आहूजा कपूर

निर्देशक: अविनाश दास

कलाकार: स्वरा भास्कर, पंकज त्रिपाठी, संजय मिश्रा, इश्तेयाक खान, मयूर मोरे, विजय कुमार और अन्य

रेटिंग: साढ़े तीन

अमिताभ बच्चन की ‘पिंक’ फिल्म में एक औरत की मर्जी की बात कही गई थी. फिल्म में दिखाया था कि एक औरत की ना का मतलब ना होता है. ‘अनारकली ऑफ़ आरा’ भी एक औरत की ना को दर्शाती है. यह नाच गाना करने वाले तबके की औरत की कहानी है जिसके लिए समाज की यह धारणा है कि वो सभी के लिए उपलब्ध है चूंकि वह पारदर्शी कपडे पहनती है द्विअर्थी गाने गाती है इसलिए वह सबकी सम्पति है मगर ‘आरा की अनारकली’ ऐसी नहीं है.

वह बताती है कि जब तक उसकी मर्ज़ी न हो कोई उसे कोई छू भी नहीं सकता है हाँ इसके लिए उसे एक लड़ाई लड़नी पड़ती है दबंग और रसूख रखने वालों के खिलाफ. फिल्म की कहानी की बात करें यह कहानी बिहार के आरा जिले की गायिका अनारकली (स्वरा भास्कर) है. बचपन में एक समारोह में दुर्घटना के दौरान अनारकली की मां की मौत हो जाती है और अनारकली अपनी माँ की जगह स्टेज पर परफॉर्म करना शुरू कर देती है.

सबकुछ ठीक ठाक चल रहा होता है कि शहर के दबंग ट्रस्टी धर्मेंद्र चौहान (संजय मिश्रा) का दिल अनारकली पर आ जाता है और अनारकली की मुश्किलें बढ़ जाती है. पहले वह इन सबसे भागने की कोशिश करती हैं लेकिन फिर वह इसका मुंह तोड़ जवाब देने का फैसला करती है. क्या है वह जवाब इसके लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी. फिल्म इंटरवल से पहले थोड़ी धीमी है लेकिन इंटरवल के बाद कहानी रफ़्तार पकड़ लेती है और फिर फिल्म का क्लाइमेक्स इस फिल्म को खास बना देता है.

फिल्म में स्वरा के किरदार को टिपिकल अभिनेत्री की तरह सती सावित्री नहीं दिखाया गया है. फिल्म के एक संवाद में अनारकली कहती भी है कि मैं खुद को कोई सती सावित्री नहीं कह रही. बंद कमरे की बात अलग है, लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि भरी महफिल में हमें नंगा कर दिया जाए. हर महिला के वजूद और मर्ज़ी का सम्मान हो. फिल्म की कहानी इसे मुद्दे को सशक्त तरीके से सामने लाती है.

अविनाश दास की बतौर निर्देशक यह पहली फिल्म है. उनके प्रयासों के लिए उनकी प्रशंसा करनी चाहिए. इस फिल्म के ज़रिये उन्होंने रंगीन नाच दिखाने वाली कलाकार की बेरंग जिन्दगी की कहानी को दिखाया है. एक उपेक्षित मुद्दे को सामने लाया गया है.फिल्म में द्विअर्थी शब्दों की भरमार है. कहानी की यही मांग भी थी. खास बात यह थी कि यह अश्लीलता की हद को नहीं छूती है. इसके लिए भी अविनाश तारीफ के पात्र हैं. फिल्म में बिहार के फ्लेवर को बहुत खूबी से फिल्म में समाहित किया गया है.

अभिनय की बात करें तो इस फिल्म की यूएसपी इससे जुड़े कलाकार हैं. सभी अभिनय के मंझे हुए नाम है. फिल्म में शीर्षक भूमिका निभा रही स्वरा भास्कर की जितनी तारीफ की जाए वह कम होगी. उन्होंने अपने किरदार की बॉडी लैंग्वेज और भाषा सभी पर काम किया है. उनकी मेहनत नज़र आती है. यह स्वरा का अब तक का बेहतरीन परफॉरमेंस कहा जा सकता है. संजय मिश्रा इस फिल्म में नकारात्मक भूमिका में है और वह अपने सहज अभिनय से अपने किरदार के लिए नफरत जगाने में कामयाब हुए हैं. पंकज त्रिपाठी भी रंगीला की भूमिका में एक अलग ही रंग फिल्म में भर जाते हैं. फिल्म के दूसरे कलाकार जो कम परिचित हैं लेकिन उन्होंने बेहतरीन अभिनय का परिचय दिया है. विजय कुमार, इश्तेयाक खान और मयूर मोरे ऐसे ही किरदार हैं. जो अपने परफॉरमेंस से कहानी को और विश्वसनीय बना देते हैं.

संगीत की बात करें तो रोहित शर्मा का संगीत फिल्म में एक महत्वपूर्ण किरदार है. खास बात है यह भोजपुरी स्वाद में लाया गया है. रामकुमार सिंह, डॉक्टर सागर और रविंद्र रंधावा ने गीतों पर उम्दा काम किया है. मौजूदा दौर के हिट आइटम नंबर के ट्रेंड इस फिल्म में भी है लेकिन यहाँ मामला अलग है. इस फिल्म में आइटम गीत के ज़रिये भी वास्तविकता ही दिखाने की कोशिश की गयी है. जो लो नार्थ इण्डिया से ताल्लुक रखते हैं वह इससे आसानी से जुड़ सकते हैं हाँ अर्बन दर्शकों के लिए आसानी से कनेक्शन हो पाना मुश्किल है. फिल्म की सिनेमेटोग्राफी ,कॉस्ट्यूम सहित सभी पहलू अच्छे बन पड़े हैं.

कुलमिलाकर अनारकली ऑफ़ आरा कलाकारों के परफॉरमेंस की वजह से बेहतरीन फिल्म बनती है इसका महिला प्रधान होना इसे और खास बना जाता है.

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