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फिल्‍म रिव्‍यू : मिलिये ''डिटेक्टिव ब्‍योमकेश बख्शी'' से...

Updated at : 03 Apr 2015 5:08 PM (IST)
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फिल्‍म रिव्‍यू :  मिलिये ''डिटेक्टिव ब्‍योमकेश बख्शी'' से...

II उर्मिला कोरी II फिल्म: डिटेक्टिव व्योमकेश बख्शी निर्माता: यशराज बैनर और दिबाकर बनर्जी निर्देशक: दिबाकर बनर्जी संगीत: स्नेहा खानविलकर कलाकार: सुशांत सिंह राजपूत, स्वस्तिका मुखर्जी,आनंद तिवारी, मियांग चांग, नीरज काबी और अन्य रेटिंग: तीन शरदेंदु बंधोपाध्याय के बांग्ला साहित्य के लोकप्रिय किरदार व्योमकेश बख्शी को फिल्मकार दिबाकर बनर्जी ने रुपहले परदे पर फिल्म डिटेक्टिव […]

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II उर्मिला कोरी II

फिल्म: डिटेक्टिव व्योमकेश बख्शी

निर्माता: यशराज बैनर और दिबाकर बनर्जी

निर्देशक: दिबाकर बनर्जी

संगीत: स्नेहा खानविलकर

कलाकार: सुशांत सिंह राजपूत, स्वस्तिका मुखर्जी,आनंद तिवारी, मियांग चांग, नीरज काबी और अन्य

रेटिंग: तीन

शरदेंदु बंधोपाध्याय के बांग्ला साहित्य के लोकप्रिय किरदार व्योमकेश बख्शी को फिल्मकार दिबाकर बनर्जी ने रुपहले परदे पर फिल्म डिटेक्टिव व्योमकेश बख्शी के जरिए लेकर सामने हैं. व्योमकेश बख्शी एक जासूस है उसकी खासियत चीजों और हालात को अवलोकन करने की क्षमता है. जिसके जरिए वह कई अनसुलझे रहस्यों को आसानी से सुलझा जाता है. लेकिन वह एक आम आदमी सा है. लुक, बोलचाल हो या बॉडी लैग्वेंज. एक आम मध्यमवर्गीय युवक.

आम आदमी वाली उसकी विशेषता की वजह से यह किरदार ८ दशक बाद भी समायिक सा लगता है. हिंदी सिनेमा में अब तक बनी जासूसी फिल्मों से दिबाकर बनर्जी की यह फिल्म आगे की कड़ी है. यह एक आम जासूस फिल्म नहीं है. इसकी शुरुआत एक हत्या की गुत्थी सुलझाने से शुरु जरुर होती है लेकिन जैसे जैसे परते खुलती हैं मालूम होता है कि पूरा कलकत्ता शहर खतरे में है. इसमे जैपनीज आर्मी, चीनी गैंग, पॉलिटिशियंस और फिल्म अदाकारा सभी शामिल है.

फिल्म का बैकड्रॉप 1942 है और अफीम भी. द्वितिय विश्वयुद्ध की भयावहता से जूझते कलकत्ता में जापानी आर्मी और चीनी गैंग ब्रिटिश हूकूमत के लिए किस तरह से चुनौती बनते जा रहे थे. इस बात को भी फिल्म की कहानी से खूबसूरती से जोड़ा गया है. जो उस दौर की हकीकत था. कहानी फर्स्ट हाफ में धीमी जरुर है लेकिन रोचकता को बनाए रखती है. दूसरा हाफ में रोचकता बरकरार रख पाने में नाकामयाब है. कहानी और उसका परदे पर नरेशन जिस तरह से होता है. वह आखिर में सारे रहस्य खुल जाने के बाद भी कहीं न कहीं आपकी जिज्ञासा को खत्म नहीं कर पाता है.

आपके मन में कई सवाल रह जाते हैं. यही इस फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी है. फिल्म की प्रस्तुति इसकी सबसे बड़ी यूएसपी है. 2014 के कोलकाता में दिबाकर बनर्जी ने 1942 का जो कलकत्ता बसाया है. वह कमाल का है. फिल्म को देखते हुए आपको एहसास होता है कि आप उसी दौर में हैं. कोलकाता का लुक हो या किरदारों का सब उसी अतीत को खुद में खूबसूरती से समेटे हुए है. फिल्म के शुरुआत में ट्राम की खिड़की और युगांतर अखबार से बहुत ही रोचक ढंग से तत्कालीन परिस्थिति को बारे में सहजता से बताया गया है.

सूत्रधार अब तक फिल्मों में तत्कालीन स्थिति को बताते आए हैं.इसके लिए भी दिबाकर तारीफ के पात्र हैं.अभिनय की बात करें तो सुशांत सिंह अपने किरदार के साथ पूरी तरह से न्याय करते नजर आते हैं. हां एक बंगाली फैक्टर जो बाकी के किरदारों में स्वभाविक सा था. वह कहीं न कहीं सुशांत में मिसिंग नजर आता है. नीरज काबी का अभिनय जानदार रहा है. वह एक वृद्ध डॉक्टर की भूमिका से अपराधिक प्रवृति वाले यॉग सभी में प्रभावी रहे हैं. सह कलाकारों में मियांग चाग, स्वतिका मुखर्जी, आनंद तिवारी सहित हर कलाकार अपने किरदार में पूरी तरह से रचा बसा नजर आया है.

स्नेहा खानविलकर का गीत संगीत इस फिल्म की प्रस्तुति को और ज्यादा खास बना जाता है. गीतों को लिप्सिंग कराने की रटी रटायी जरुरत महसूस नहीं की गयी है. कुलमिलाकर डिटेक्टिव व्योमकेश बख्शी कहानी में कुछ खामियां रह जाने के बावजूद मनोरंजन करने में सक्षम है.

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