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फिल्‍म रिव्‍यू : डार्क थ्रिलर है ''बदलापुर''

Updated at : 20 Feb 2015 5:05 PM (IST)
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फिल्‍म रिव्‍यू : डार्क थ्रिलर है ''बदलापुर''

II अनुप्रिया अनंत II फ़िल्म : बदलापुर निर्देशक : श्रीराम राघवन निर्माता : एरोज, दिनेश विजन कलाकार : वरुण धवन, नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी,हुमा कुरैशी,राधिका आप्टे,यामी गौतम,विनय पाठक रेटिंग : ढाई ‘शोले’ से ‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’ तक बदले की कहानी को पर्दे पर कई बार और कई तरह से दिखाया गया है.श्रीराम राघवन की फ़िल्म बदलापुर भी […]

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II अनुप्रिया अनंत II

फ़िल्म : बदलापुर

निर्देशक : श्रीराम राघवन
निर्माता : एरोज, दिनेश विजन
कलाकार : वरुण धवन, नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी,हुमा कुरैशी,राधिका आप्टे,यामी गौतम,विनय पाठक
रेटिंग : ढाई
‘शोले’ से ‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’ तक बदले की कहानी को पर्दे पर कई बार और कई तरह से दिखाया गया है.श्रीराम राघवन की फ़िल्म बदलापुर भी अपने नाम की तरह एक बदले की कहानी है.इस कहानी की खासियत यह है कि यहाँ पर कोई किरदार न तो पूरी तरह से नकारात्मक है और न ही सकारात्मक.यही इस फ़िल्म की यू एस पी है. जो इसे दूसरे रिवेंज ड्रामा से अलग कर देती है.कई खामियां भी कहानी में है. पहले कहानी जानते हैं फिर उसकी खामियों को जानेंगे.
बदलापुर की कहानी राघव (वरुण धवन)के बदले की कहानी है.उसका एक बहुत खुशहाल परिवार है. एक प्यारी सी पत्नी मिशा (यामी गौतम)है और एक बेटा है.एक बैंक डकैती में उसकी पत्नी और बेटा मारे जाते हैं. बैंक डकैतो में से एक लियाक(नवाज़ुद्दीन) पुलिस के हाथों पकड़ा जाता है लेकिन वह अपने दूसरे साथी को भगा देता है. लियाक को 20 साल की सजा हो जाती है.
राघव लियाक के बाहर आने का इंतज़ार करता है ताकि वह उससे उसके साथी का नाम जानकर उसे सजा दे सके.बदला ही उसकी ज़िन्दगी का मकसद बन जाता है.वह पुणे छोड़कर मुम्बई के बदलापुर में रहने लगता है.जो फ़िल्म का शीर्षक भी है.बदलापुर सेंट्रल रेलवे का एक स्थानक है.जहाँ एक समय गाड़ियों का ट्रैक बदला जाता था इसलिए इसे बदलापुर कहा जाता है.
खैर कहानी पर आते है क्या राघव अपना बदला ले पायेगा. बदला ही उसकी ज़िन्दगी का मकसद बन गया है. फ़िल्म का अंत काफी अनयूजवल है. क्या ये अलहदा अंत है इसके लिए आपको फ़िल्म देखनी होगी. फ़िल्म का टैगलाइन है डोन्ट मिस द बिगेनिंग लेकिन फ़िल्म की कहानी से इसका कुछ लेना नज़र नहीं आया.फ़िल्म फर्स्ट हाफ में खिचती जान पड़ती है सेकेंड हाफ में कहानी ज़रूर अच्छी है लेकिन स्क्रीनप्ले की खामियों को वो भी खत्म नहीं कर पाती.
अभिनय की बात करे तो वरुण धवन ने कुछ अलग करने की अच्छी कोशिश की है.ब्बॉय नेक्स्टडोर से एक खूंखार हत्यारे के किरदार को उन्होंने निभाया है.फ़िल्म के फर्स्ट हाफ में वह अपने किरदार के साथ संघर्ष करते नज़र आये सेकेंड हाफ में ज़रूर उन्होंने अपने किरदार के स्किन में जाने की अच्छी कोशिश की. उन्हें अपने सवांद अदायगी में और ज़्यादा मेहनत करने की ज़रूरत थी.
जिस हरफनमौला अंदाज़ में नवाज़ ने अपना किरदार निभाया है.वह थिएटर से बाहर निकलने के बाद भी आपको याद रह जाता है.यह ज़रूर है कि वे इससे पहले भी इसी अंदाज़ में नज़र आ चुके हैं.फ़िल्म में चार अभिनेत्रियां हैं लेकिन उनके हिस्से चंद सीन ही आएं हैं.उनमें ज़्यादातर सीन उन्हें सेक्स ऑब्जेक्ट के तौर पर ही फ़िल्म में प्रस्तुत करते हैं. खासकर हुमा और राधिका.
यह बात चुभती है.फ़िल्म के संगीत की बात करे तो यह फ़िल्म की कहानी के अनुरूप है. सचिन जिगर की जोड़ी जी करदा सहित अन्य गीत अच्छे बन पड़े हैं. लोकेशन्स की बात करे तो वह कहानी के साथ पूरी तरह से न्याय करते हैं. कुलमिलाकर यह डार्क थ्रिलर फ़िल्म मनोरंजन की कसौटी पर चुकती है.
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