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कहीं ढह न जाए पाकिस्तान में दिलीप कुमार का पुश्तैनी घर

Updated at : 12 Dec 2014 3:24 PM (IST)
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कहीं ढह न जाए पाकिस्तान में दिलीप कुमार का पुश्तैनी घर

पेशावर : भारतीय उपमहाद्वीप केकरोड़ोंफिल्मप्रेमियों के दिलों पर राज करने वाले प्रसिद्ध अभिनेता दिलीप कुमार के पेशावर स्थित पुश्तैनी घर को पाकिस्तान की सरकार ने पिछले ही साल राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा दिया था. लेकिन मकान की दो मंजिलें छिन्न-भिन्न हो जाने के बाद अब यह पूरी तरह से ढहने के कगार पर पहुंच गया […]

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पेशावर : भारतीय उपमहाद्वीप केकरोड़ोंफिल्मप्रेमियों के दिलों पर राज करने वाले प्रसिद्ध अभिनेता दिलीप कुमार के पेशावर स्थित पुश्तैनी घर को पाकिस्तान की सरकार ने पिछले ही साल राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा दिया था. लेकिन मकान की दो मंजिलें छिन्न-भिन्न हो जाने के बाद अब यह पूरी तरह से ढहने के कगार पर पहुंच गया है.

‘किस्सा ख्वानी’ बाजार में खुदादाद मुहल्ले के निवासियों ने सरकार से गुहार लगाई है कि इस राष्ट्रीय स्मारक को बचाने के लिए तत्काल जरुरी कदम उठाए जाएं. पिछले ही साल जुलाई में जब दिलीप कुमार के इस घर को राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया गया तो इस तिमंजिला मकान को गर्व के साथ देखने वाले पेशावर के लोगों को खुश होने की एक और खास वजह मिल गई थी.

92 साल के हो चुके दिलीप कुमार को पाकिस्तान के सबसे बडे नागरिक सम्मान निशान-ए-इम्तियाज से नवाजा जा चुका है. जुलाई में संरक्षित स्मारक घोषित किया जा चुका, दिलीप कुमार का यह पुश्तैनी घर कुल 130 वर्ग मीटर में फैला है. सरकार ने इसे एक संग्रहालय की शक्ल देने की योजना बनाई थी लेकिन इस दिशा में अभी तक कुछ किया नहीं गया है.

दिलीप कुमार के पुश्तैनी घर के पड़ोस में रहने वाले शाह हुसैन ने कहा,’यह मकान बहुत बुरी स्थिति में है और कभी भी गिर सकता है. यदि ऐसा हुआ तो यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण होगा क्योंकि यह एक राष्ट्रीय स्मारक है.’ हुसैन ने आगे यह भी कहा कि,’ मकान की दो मंजिलें पहले ही कई जगहों से ढह गई हैं और पूरी इमारत किसी भी समय गिर सकती है. यह स्थिति राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक विरासत के प्रति संघीय और प्रांतीय सरकारों की उदासीनता को दर्शाती है. दिलीप कुमार का मकान जिस किस्सा ख्वानी बाजार या किस्सागोई करने वालों के बाजार में स्थित है, वह मध्य एशिया एवं भारत-पाक क्षेत्र के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान का केंद्र रहा है.’

हुसैन ने आगे कहा कि यह बहुत दुखद है कि दशकों तक सरकारें आती रहीं लेकिन वे इसकी और पेशावर की सांस्कृतिक विविधता को बचाने में विफल रहीं. पेशावर में जन्मे दिलीप कुमार का असली नाम यूसुफ खान है. उन्होंने अपनी जिंदगी के शुरुआती सात साल इसी मकान में बिताए थे. 1930 के दशक के अंत में उनका परिवार मुंबई चला गया था.

सामाजिक कार्यकर्ता रक्षिंदा नाज ने कहा कि सरकार को दिलीप कुमार के मकान को सांस्कृतिक संग्रहालय में बदलने की शुरुआत करनी चाहिए. उन्होंने कहा,’यह भारत और पाकिस्तान से आने वाले लोगों के लिए आकर्षण का एक बडा केंद्र बन सकता है क्योंकि दिलीप कुमार एक चर्चित नाम है.’ नाज ने कहा कि संग्रहालय पाकिस्तान और भारत की जनता के बीच शांति के एक प्रतीक केरूप में स्थापित होगा.

नाज ने कहा कि,’ मकान के कई हिस्से पहले ही ढह चुके हैं और पुराना फर्नीचर मकान के परिसर में भूतल पर पड़ा है. इसकी तस्वीरें मीडिया में जारी की जा चुकी हैं. खैबर पख्तूनख्वा सरकार के संस्कृति विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि मकान को राष्ट्रीय संग्रहालय में बदलने के काम में इसलिए विलंब हुआ क्योंकि संपत्ति को लेकर अदालत में एक वाद है. उन्होंने कहा, ‘इसके संरक्षण के लिए मकान मालिकों के बीच का विवाद सुलझाया जा रहा है.’ उन्होंने बताया कि सरकार इस मकान में रखा सामान अपने संरक्षण में ले चुकी है.

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