फिल्म रिव्यू:बॉबी जासूस

।।उर्मिला कोरी।। फिल्म: बॉबी जासूसनिर्देशक: समर शेखनिर्माता: दिया मिर्जा, साहिल संघा और रिलांयसकालाकार: विद्या बालन, अली फजल, किरन कुमार, सुप्रिया पाठक, तन्वी आजमी, राजेंद्र गुप्ता और अन्यरेटिंग: तीन घनचक्कर और शादी के साइड़ इफेक्टस इन फिल्मों में अभिनेत्री के तौर पर गुम हुई द ग्रेट विद्या बालन बॉबी जासूस में एक बार फिर कहानी और […]
।।उर्मिला कोरी।।
फिल्म: बॉबी जासूस
निर्देशक: समर शेख
निर्माता: दिया मिर्जा, साहिल संघा और रिलांयस
कालाकार: विद्या बालन, अली फजल, किरन कुमार, सुप्रिया पाठक, तन्वी आजमी, राजेंद्र गुप्ता और अन्य
रेटिंग: तीन
घनचक्कर और शादी के साइड़ इफेक्टस इन फिल्मों में अभिनेत्री के तौर पर गुम हुई द ग्रेट विद्या बालन बॉबी जासूस में एक बार फिर कहानी और डर्टी पिक्चर वाले अंदाज में नजर आयी है. फिल्म के नाम की तरह ही फिल्म की सिरमौर वही हैं. फिल्म की कहानी हैदराबाद की पोट्टी बिलकिस बानो उर्फ बॉबी की है. वह बड़ी जासूस बनना चाहती है लेकिन हैदाराबाद की बडी जासूसी एंजेसी उसे अपनी कंपनी में यह कहते हुए नहीं लेती है कि वह ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं है.
उसका कोई क्लास नहीं है. उसके पिता को भी पसंद नहीं है कि वह जासूस करें. वह उससे बात करना बंद कर देते हैं. यह सब बातें उसे निराश जरुर करती हैं लेकिन हताश नहीं है. मोहल्ले में छोटी-मोटी जासूसी करके अपने अंदर के जासूस को जिंदा रखी हुई है. उसे यकीं है कि एकदिन अल्लाह उसे बहुत बड़ी जासूस बना देंगे. इसी बीच उसके पास अनीस खान (किरण कुमार) आता है और एक काम देता है. पहले एक लड़की को ढूंढने का काम सौंपता है. जब वह मिल जाती है तो फिर दूसरी लड़की ढूंढने का काम. दूसरी भी मिल जाती है तो अली नाम के एक लड़के की तलाश का जिम्मा बॉबी को देता है. बॉबी को समझ नहीं आता कि अनीस खान एक के बाद एक लड़कियों को क्यों ढूंढ रहा है. दो लड़कियां जो उसने ढूंढी वह कहां गयी.
बॉबी के मन में संदेह घर कर जाता है और वह पाती है कि जिन दो लड़कियों को उसने ढूंढ कर इस व्यक्ति को सौंपा था, वे गायब हैं. बॉबी असमंजस की स्थिति में पड़ जाती है. वह अनीस खान के बारे में पता लगाने में जुट जाती है और यह भी कि अनीस अली को क्यूं ढूंढ रहा है. एक अलग ही सच्चई से रुबरू बॉबी होती है. फिल्म का फस्र्ट हाफ बेहतरीन है. फिल्म की कहानी पूरी तरह से बांधे रखती है. हां क्लाइमेक्स जरुर कमजोर है. फिल्म का फस्र्ट हाफ जो उम्मीद जगाता है. वह क्लाईमेक्स में पहुंचकर मजा कम कर देता है. फिल्म की कहानी में कुछ खामियां भी है.
जैसे किरण कुमार क्यों अली को ढूंढने के लिए बंदूक लेकर जाता है. नीलोफर की मां क्यों बोलती है कि नीलोफर पता नहीं कब आएगी. ये सब बातें क्या दर्शकों को भ्रमित करने के लिए कही गयी है. फिल्म की सबसे बड़ी यूएसपी इसके कलाकार है. विद्या बालन एक बार फिर सर्वश्रेष्ठ रही हैं. फिल्म में उनका लुक(अलग अलग भेष धरना हो या बिलकिस का सादगी से भरा किरदार), संवाद हो या बॉडी लेग्वेज सबपर द ग्रेट विद्या की छाप नजर आती है. सहकलाकारों ने भी विद्या का बखूबी साथ दिया है. अली फजल, सुप्रिया पाठक,तन्वी आजमी, शेट्टी, किरन कुमार सहित सभी कलाकारों ने उम्दा अभिनय किया है. कास्टिंग बेहतरीन है. फिल्म का एक कलाकार हैदराबाद भी है. हैदराबाद के रंग ढंग को बखूबी परदे पर जिया गयाहै. हैदाराबाद के अलावा यह कहानी कहीं और इतनी रोचक और खूबसूरत ढंग से शायद ही गढ़ पाती थी. फिल्म का गीत संगीत औसत है. फिल्म का अन्य पक्ष बेहतरीन है. विद्या बालन और उनके सहकलाकारों के जबरदस्त अभिनय के लिए यह फिल्म देखी जानी चाहिए.
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