FILM REVIEW: जानें कैसी है विद्युत जामवाल की ''जंगली''

Updated at : 29 Mar 2019 1:07 PM (IST)
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FILM REVIEW: जानें कैसी है विद्युत जामवाल की ''जंगली''

उर्मिला कोरी फिल्म : जंगली निर्देशक : चक रसेल निर्माता : जंगली पिक्चर्स कलाकार : विद्युत जामवाल, अतुल कुलकर्णी, अक्षय ओबेरॉय. आशा भट्ट , पूजा सावंत, मकरंद देशपांडे और अन्य रेटिंग : डेढ़ द मास्क, इरेजर और द स्कॉपियन किंग जैसी सफल हॉलीवुड फिल्मों के निर्देशक चक रसेल जंगली फिल्म के निर्देशन से जुड़े हैं […]

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उर्मिला कोरी

फिल्म : जंगली

निर्देशक : चक रसेल

निर्माता : जंगली पिक्चर्स

कलाकार : विद्युत जामवाल, अतुल कुलकर्णी, अक्षय ओबेरॉय. आशा भट्ट , पूजा सावंत, मकरंद देशपांडे और अन्य

रेटिंग : डेढ़

द मास्क, इरेजर और द स्कॉपियन किंग जैसी सफल हॉलीवुड फिल्मों के निर्देशक चक रसेल जंगली फिल्म के निर्देशन से जुड़े हैं इसलिए उम्मीदें भी थी कि फिल्म में कुछ अलग और अनोखा देखने को मिलेगा लेकिन फिल्म नाम बड़े और दर्शन छोटे वाला मामला ही साबित होती दिखी. चक रसेल चूक गए हैं. उन्होंने घिसी पिटी सी कहानी पर एक बेहद कमजोर फिल्म प्रस्तुत की है. घिसी पिटी कहानी की बात करें तो यह फिल्म राज ( विद्युत जामवाल ) की है जो जानवरों का डॉक्टर है. वो मुंबई में है लेकिन वह मूल रुप से चंद्रिका (फिक्शन नाम) जंगल से हैं.

राज के पिता वहां पर एक हाथियों के सरंक्षण वाला पार्क चलाते हैं. 10 साल पहले राज की मां की मौत कैंसर से हो गई थी. अपनी मां की मौत का जिम्मेदार वह अपने पिता को समझता है. उसका सोचना है कि उसके पिता मां को इलाज के लिए शहर क्‍यों नहीं ले गये.

मां की मौत के बाद उसने चंद्रिका छोड़ दिया था. मां की मौत के दस साल बाद उनकी बरसी पर वह वहां जाता है. वहां जाकर पिता और पुत्र के मतभेद खत्म हो जाते हैं लेकिन उसे यह मालूम होता है कि जंगल अब हाथियों के लिए सुरक्षित नहीं है. हाथी दांत के लालच में हाथियों का लगातार शिकार किया जा रहा है. शिकारी उसके पिता को भी नहीं बख्शते. जिसके बाद हमेशा की तरह अपना हीरो यानि राज बदला लेने निकल पड़ता है.

यही फिल्म की घिसीपिटी कहानी है. हाथियों के संरक्षण जैसे सशक्त मुद्दे को कहानी में बहुत ही कमजोर तरीके से बुना गया है. फिल्म का फर्स्ट हाफ किरदारों को स्थापित करने में चला गया लेकिन फिर भी वो आधे अधूरे से ही लगते हैं.

वहीं सेकेंड हाफ में कहानी पूरी तरह से मेलोड्रामेटिक हो जाती है जो फिल्म को बोझिल बना देता है. फिल्म का ट्रीटमेंट 80 और 90 के दशक की फिल्मों की तरह है कहना गलत ना होगा. गणेश जी वाला प्रसंग भी समझ से परे लगता है. फिल्म के इमोशनल दृश्य हास्यप्रद से लगते हैं जिससे फिल्म के आखिर में जो संदेश दिया जाता है. वह भी प्रभावी नहीं लगता है.

अभिनय की बात करें तो विद्युत एक्शन दृश्यों में हमेशा की तरह प्रभावी रहे हैं वहीं इस फिल्म का एकमात्र अच्छा पहलू भी है लेकिन एक्सप्रेशन के मामले में पूरी तरह से इस फिल्म में चूक गए हैं. अतुल कुलकर्णी और मकरंद देशपांडे जैसे नाम भी अभिनय में यहां निराश करते हैं. पूजा सावंत और आशा भट्ट भी प्रभावित नहीं कर पायी है.

दूसरे पहलूओं की बात करें तो फिल्म का बैकग्राऊंड और सिनेमाटोग्राफी अच्छी है लेकिन इनके लिए फ़िल्म नहीं देखी जा सकती है. कुलमिलाकर यह फिल्म निराश करती है.

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