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Film Review: फिल्‍म देखने से पहले जानें कैसी है श्रद्धा कपूर की ''स्‍त्री''

Updated at : 31 Aug 2018 1:35 PM (IST)
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Film Review: फिल्‍म देखने से पहले जानें कैसी है श्रद्धा कपूर की ''स्‍त्री''

II उर्मिला कोरी II फ़िल्म: स्त्री निर्देशक: अमर कौशिक कलाकार: राजकुमार राव,श्रद्धा कपूर,पंकज त्रिपाठी,अपारशक्ति खुराना ,फ़्लोरा सैनी रेटिंग: तीन ‘स्त्री’ हॉरर कॉमेडी जॉनर की फ़िल्म है. फ़िल्म की कहानी की बात करें तो देश के कई हिस्सों में प्रचलित अवधारणा है कि किसी खास तिथि पर रूह औरत का भेष धरकर घर के दरवाजे पर […]

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II उर्मिला कोरी II

फ़िल्म: स्त्री

निर्देशक: अमर कौशिक

कलाकार: राजकुमार राव,श्रद्धा कपूर,पंकज त्रिपाठी,अपारशक्ति खुराना ,फ़्लोरा सैनी

रेटिंग: तीन

‘स्त्री’ हॉरर कॉमेडी जॉनर की फ़िल्म है. फ़िल्म की कहानी की बात करें तो देश के कई हिस्सों में प्रचलित अवधारणा है कि किसी खास तिथि पर रूह औरत का भेष धरकर घर के दरवाजे पर घर के पुरुष का नाम लेकर दस्तक देती है अगर पुरुष दरवाजा खोल देता है तो वह उसे अपने साथ ले जाती है. डर के इसी अवधारणा को कॉमेडी के रंग देकर इस फ़िल्म में प्रस्तुत किया है. फ़िल्म की कहानी चंदेरी गाँव पर आधारित है.

इस गांव के हर घर के दरवाजे पर लिखा जा रहा स्त्री कल आना. इस गाँव में एक स्त्री की रूह का आतंक है. वह हर साल चार दिन के मेले की रात में गाँव के मर्दों को उठा ले जाती है.

मेले के इसी चार दिनों में विक्की (राजकुमार ) की दोस्ती एक अंजान लड़की (श्रद्धा) से हो जाती है. विक्की के दोस्तों को लगता है कि यही लड़की वो स्त्री है जो पुरुषों को उठा ले जाती है लेकिन इसी बीच विक्की के दोस्त जना (अभिषेक बनर्जी) को स्त्री उठा ले जाती है.

विक्की को श्रद्धा पर शक होता है लेकिन स्त्री की रूह कोई और है. किस तरह से सब मिलकर उससे छुटकारा पाते हैं और विक्की अपने दोस्त जना सहित गाँव के सभी पुरूषों को बचाते हैं. इसी पर फ़िल्म की कहानी है. फ़िल्म में हॉरर कॉमेडी के साथ सस्पेंस भी है.

फ़िल्म का फर्स्ट हाफ बेहतरीन है. सेकंड हाफ भी आपको बांधे रखता है फ़िल्म से जुड़ा थ्रिलर इसकी खासियत है लेकिन फ़िल्म का क्लाइमेक्स बहुत कमजोर हो गया है और कंफ्यूज करने वाला भी. श्रद्धा के किरदार को थोड़ा और परिभाषित करने की ज़रूरत थी. फ़िल्म का यही कंफ्यूजन फ़िल्म के प्रभाव को कमतर कर गया.

अभिनय की बात करें तो इस फ़िल्म की सबसे बड़ी खासियत है कि फ़िल्म में मंझे हुए कलाकारों की जुगलबंदी ने फ़िल्म को खास बना दिया है. राजकुमार राव हमेशा की तरह बेहतरीन रहे हैं. वह बेहतरीन अभिनय का पर्याय बनते जा रहे हैं यह कहना गलत न होगा. पंकज त्रिपाठी भी अपने रोल में उम्दा रहे हैं. अभिषेक बनर्जी और अपारशक्ति खुराना मज़ेदार रहे हैं.श्रद्धा का काम भी अच्छा रहा है.

फ़िल्म की सिनेमेटोग्राफी अच्छी है रियल लोकेशन पर शूट होने की वजह से कहानी को और प्रभावी बना जाती है. फ़िल्म के डायलॉग मज़ेदार हैंजो आपको लोटपोट करने के साथ साथ समाज की कई अवधारणाओं पर कटाक्ष भी कर जाते हैं. कुलमिलाकर कंफ्यूज़ करते क्लाइमेक्स के बावजूद यह फ़िल्म आपका मनोरंजन करती है.

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