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GOLD Movie Review: आजादी दिवस को यादगार बनाने का एक अच्छा प्रयास

Updated at : 15 Aug 2018 5:26 PM (IST)
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GOLD Movie Review: आजादी दिवस को यादगार बनाने का एक अच्छा प्रयास

फिल्म : गोल्ड कलाकार : अक्षय कुमार, विनीत कुमार सिंह, अमित साध, विक्की कौशल, कुणाल कपूर, मौनी रॉय निर्देशक : रीमा कागती रेटिंग : 3 स्टार उर्मिला कोरी अक्षय कुमार की फिल्म गोल्ड की लंबे समय से चर्चा थी. वजह यह थी कि कहानी उस दौर की कहानी है, जब भारत तुरंत आजाद ही हुआ […]

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फिल्म : गोल्ड

कलाकार : अक्षय कुमार, विनीत कुमार सिंह, अमित साध, विक्की कौशल, कुणाल कपूर, मौनी रॉय

निर्देशक : रीमा कागती

रेटिंग : 3 स्टार

उर्मिला कोरी

अक्षय कुमार की फिल्म गोल्ड की लंबे समय से चर्चा थी. वजह यह थी कि कहानी उस दौर की कहानी है, जब भारत तुरंत आजाद ही हुआ था. देश में कई चीजें हो रही थीं.

इसी बीच एक इंसान जिसका सपना था कि ब्रिटिश इंडिया में हॉकी में खिताब हासिल करने के बाद आजाद इंडिया के लिए ओलिंपिक में गोल्ड मेडल आये और जीत हासिल करने के बाद लॉन्ग लिव द किंग नहीं, वंदे मातरम और अपना राष्ट्रीय गान गायें.

इसी सपने की कहानी लेकर रीमा कागती ने पूरी कहानी रची है. फिल्म की शुरुआत में 1936 से कहानी का प्रारंभ किया है. उस दौर से लेकर भारत की आजादी तक कई बड़ी ऐतिहासिक घटनाएं होती हैं विश्व में. फिल्म सबको झलकियों में दर्शाता है.

लेकिन उन घटनाओं का असर किस तरह हॉकी के खेल पर पड़ता है. खासतौर से भारत पाकिस्तान के विभाजन से किस तरह पूरा ढांचा ही बदल जाता है. किस तरह बड़े खिलाड़ी और कामयाब खिलाड़ी पाकिस्तान चले जाते हैं और बेस्ट हॉकी टीम मानी जाने वाली टीम टूट जाती है.

इसके साथ ही किस तरह खेल विभाग के हुक्मरान खेल के खर्च से पीछा छुड़ाने के लिए कन्नी काटने लगते हैं. इसे खूबसूरती और रियलिस्टिक अप्रोच के साथ दिखाया गया है.

फिल्म में दो जेनेरेशन के हॉकी प्लेयर्स की कहानी दिखायी गयी है. एक तरफ सम्राट और इम्तियाज वाली टीम तो दूसरी तरफ कुंवर रघुबीर और हिम्मत सिंह की टीम.

लेकिन फर्क यह है कि सम्राट की टीम टीम भावना में यकीन करती है. रघुबीर और हिम्मत वाली टीम इगो की शिकार है और इन्हीं सबके बीच किस तरह से टीम इंडिया ब्रिटिशर्स के ही मैदान में उनके साथ ही खेल के मैदान में लड़ते हुए गोल्ड जीतती है.

फिल्म इसकी ही कहानी है. हम खेल नहीं खेल रहे, अंग्रेजों से दो सौ साल की गुलामी का बदला ले रहे हैं. फिल्म में यह बात बार-बार दोहरायी जाती है. निर्देशक की सोच इस मायने में स्पष्ट नजर आती है.

एक मैनेजर तपन दास जिसमें सारी बुरी आदतें हैं. वह जुआरी है और शराबी भी. लेकिन बात जब हॉकी की आती है तो वह उसके लिए अपने घर गिरवी और पत्नी के जेवर गिरवी रखने में पीछे नहीं हटता.

रीमा ने तपन की कहानी दिखाते हुए उस दौर के भारत और उस समाज की कुछ झलकियां अच्छी तरह प्रस्तुत की है, जहां राजा के घर से आने वाले कुंवर हॉकी के मैदान में भी खुद के राजा का रुआब दिखाने से पीछे नहीं हटते.

फिल्म की कहानी में रघुवीर और हिम्मत सिंह के बीच के बीच के द्वंद्व को खूबसूरती से दर्शाया गया है. दरअसल, हिम्मत सिंह उस वर्ग का प्रतिनिधि है जहां कम संसाधन में भी अपने साकार करने की कोशिशकी जाती है, तो दूसरी तरफ रघुवीर उस जमींदार खानदान का प्रतिनिधि है जो खुद को बेस्ट माने.

रीमा की कहानी तपन दास की कहानी पर केन्द्रित है. लेकिन इम्तियाज के रूप में विनीत कुमार सिंह, सन्नी कौशल का हिम्मत सिंह किरदार, कुणाल कपूर का सम्राट किरदार नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है.

फिल्म की कहानी अंतराल से पहले काफी धीमी गति से आगे बढ़ती है और हम तपन की निजी जिंदगी की कहानी में अधिक घूमते हैं. फर्स्ट हाफ तक हम हॉकी के मैदान देख ही नहीं पाते.

अंतराल के बाद हॉकी टीम के ओलिंपिक में जाने की तैयारी दिखाते हैं. रीमा की इस फिल्म की हॉकी टीम से एक बात तो जाहिर है कि हॉकी प्लेयर्स हमेशा से भारत में अच्छे रहे हैं, चूंकि फिल्म में खिलाड़ियों की तैयारी पर अधिक प्रेशर नहीं दिखाया गया है.

ब्रिटिश मैदान पर किस तरह जब पाकिस्तान भारत एक साथ मौजूद होता है. और क्या रोमांच होता है. इसे भी ऊपरी तौर पर दिखाया गया है.

खास बात यह रहती है कि इम्तियाज जो कि अब पाकिस्तान के खिलाड़ी हैं वह भी भारत के गोल्ड जीतने पर चहक उठते हैं, यहां एक अच्छा संदेश रीमा ने यह देने के कोशिश की है कि मुल्क बंट जाते हैं लेकिन दोस्ती यारी और एक साथ देखे गये सपने नहीं बदलते.

इस दौर में जब पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्ते अच्छे नहीं हैं. उस दौर के भाईचारे और आपसी प्रेम को कुछ दृश्यों में काफी खूबसूरती से दर्शाया गया है. यह इस फिल्म की सबसे खूबसूरत बात है.

फिल्म जहां चूकी है, वह यह है कि फिल्म के कुछ किरदारों को छोड़ दें तो फिल्म कहीं भी इमोशनल कनेक्ट नहीं कर पाती है. फिल्म में रीमा ने अक्षय कुमार के किरदार पर केन्द्रित करने के चक्कर में सारे संघर्ष का ठेका उनके कंधे पर ही दे दिया है.

इसके बावजूद सनी कौशल और अमित साध ने बेहतरीन अभिनय किया है. कुणाल काफी कम समय के लिए पर्दे पर नजर आते हैं. विनीत कुमार सिंह ने सधा अभिनय किया है.

फिल्म की लेकिन कुछ कमियां यह रह गयी हैं कि अक्षय कुमार बंगाली किरदार में उतने फिट नहीं बैठते. धोती कुर्ता, मूंछ और जबरन बांग्ला बोलने की उनकी कोशिश खास प्रभावित नहीं करती है. शेष उन्होंने अभिनय अच्छा किया है.

कुछ गाने जबरन थोपे गये लगते हैं. मौनी रॉय जिन्होंने इस फिल्म से फिल्मी करियर की शुरुआत की है, उन्होंने फिल्म में बांग्ला किरदार को बखूबी निभाया है. लेकिन कुछ जगहों पर वह टीवी वाली एक्टिंग के जोन में चली जाती हैं, जो अखरता है.

कुल मिलाकर फिल्म आजादी दिवस पर ऐतिहासिक दिन को याद करने का एक अच्छा प्रयास है. कुछ कमियों के बावजूद ऐसी कहानी को परदे पर लाने के लिए रीमा और एक्सेल टीम बधाई के पात्र हैं.

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