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Film Review : ''जेंट्स प्रॉब्लम'' की मनोरंजक कहानी कहती है ''शुभ मंगल सावधान''

Updated at : 01 Sep 2017 1:46 PM (IST)
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Film Review : ''जेंट्स प्रॉब्लम'' की मनोरंजक कहानी कहती है ''शुभ मंगल सावधान''

।। उर्मिला कोरी ।। फिल्म : शुभ मंगल सावधाननिर्माता : येलो प्रोडक्शन हाउसनिर्देशक : आरएस प्रसन्नाकलाकार : आयुष्मान खुराना, भूमि पेडनेकर, सीमा पाहवा, बृजेंद्र कालरा और अन्यरेटिंग : तीन स्टार हाल के वर्षों में हिंदी सिनेमा अपने सीमित दायरों से बाहर निकलता नजर आ रहा है. टैबू विषय, जो अब तक घर की चहारदीवारियों तक […]

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।। उर्मिला कोरी ।।

फिल्म : शुभ मंगल सावधान
निर्माता : येलो प्रोडक्शन हाउस
निर्देशक : आरएस प्रसन्ना
कलाकार : आयुष्मान खुराना, भूमि पेडनेकर, सीमा पाहवा, बृजेंद्र कालरा और अन्य
रेटिंग : तीन स्टार

हाल के वर्षों में हिंदी सिनेमा अपने सीमित दायरों से बाहर निकलता नजर आ रहा है. टैबू विषय, जो अब तक घर की चहारदीवारियों तक सीमित थे, उन पर अब फिल्म की कहानियां बुनी जा रही हैं.

ऐसी ही एक फिल्म है ‘शुभ मंगल सावधान’,जो ‘जेंट्स प्रॉब्लम’ की कहानी कहती है. आमतौर पर जिसके बारे में लड़के अपने दोस्तों से भी बात करने में सहज नहीं होते हैं. इस फिल्म की कहानी में जमकर उस पर बात हुई है.

फिल्म की कहानी मुदित शर्मा (आयुष्मान खुराना) और सुगंधा (भूमि पेडनेकर) की है. जिनकी लव मैरिज कम अरेंज मैरिज कम लव मैरिज वाली शादी हो रही है. लेकिन मुदित को मालूम होता है कि वह सेक्शुअली सुगंधा को खुश नहीं रख पायेगा.

वह सुगंधा से शादी तोड़ने को कहता है, लेकिन सुगंधा नहीं मानती है. आगे की कहानी इस वयस्क समस्या से निबटने में शामिल होती है. सुगंधा और मुदित के परिवार को जब यह मालूम होता है, तो उनकी क्या प्रतिक्रिया होती है?

क्या मुदित और सुगंधा की शादी होगी? यह जानने के लिए आपको फिल्म देखनी होगी. फिल्म का मुद्दा गंभीर है, लेकिन फिल्म में उसे बहुत ही हलके-फुल्के अंदाज में पेश किया गया.

इससे फिल्म एडल्ट कॉमेडी नहीं बल्कि रोमांटिक कॉमेडी बन गयी है. जो हर वर्ग के दर्शक को अपील करती है. हां फिल्म का दूसरा पार्ट पहले के मुकाबले थोड़ा कमजोर रह गया है और क्लाइमेक्स काफी साधारण है.

अगर इन पर थोड़ा काम किया गया होता, तो यह फिल्म अपने विषय की तरह ही बहुत खास बन जाती. अब बात एक्टिंग की. अभिनय इस फिल्म की यूएसपी है. आयुष्मान खुराना फिल्म में शानदार रहे हैं.

भूमि पेडनेकर ने पहले फ्रेम से अपना जादू चलाया है. उनका उच्चारण हो या बॉडी लैंग्वेज, वह फिल्म में मिठास घोल जाता है. इन दोनों के अभिनय को और ज्यादा खास फिल्म में माता-पिता चाचा-चाची, मामा-मामी, फुआ-फूफी, दोस्त और सहेली जैसे किरदारों का अभिनय बनाता है.

इनमें बृजेंद्र कालरा और सीमा पाहवा के किरदार देखने लायक हैं. फिल्म की कहानी का ट्रीटमेंट देसीपन वाला है, जिसे फिल्म की सिनेमेटोग्राफी बखूबी सामने लायी है.

घर, कमरे, ऑफिस और मार्केट, सब कुछ बिलकुल वैसा ही है, जैसा असली में होता है. डायरेक्टर ने जितना हो सके, फिल्म को रियलिटी के करीब रखने की कोशिश की है.

फिल्म के गीत-संगीत कहानी के अनुरूप हैं. फिल्म के संवाद खास हैं. एडल्ट विषय के बावजूद संवाद अश्लीलता को छूते नहीं हैं, हां हंसाते जरूर हैं.

कुल मिलाकर यह फिल्म न सिर्फ एंटरटेन करती है, बल्कि आपको सोच भी देती है कि हमें जेंट्स प्रॉब्लम जैसे किसी भी तरह के सेक्शुअल प्रॉब्लम को छिपाने की जरूरत नहीं है, बल्कि उस पर खुलकर बात करना चाहिए.

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