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''गेस्ट इन लंदन'' फिल्‍म रिव्‍यू: इस गेस्ट से न मिलने में ही है भलाई

Updated at : 07 Jul 2017 3:16 PM (IST)
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''गेस्ट इन लंदन'' फिल्‍म रिव्‍यू: इस गेस्ट से न मिलने में ही है भलाई

II उर्मिला कोरी II फ़िल्म: गेस्ट इन लंदननिर्माता: पेनोरमा फिल्म्सनिर्देशक अश्विनी धीरकलाकार: कार्तिक आर्यन, कृति खरबंदा,परेश रावल,तन्वी आज़मी,संजय मिश्रा और अन्यरेटिंग: दो ‘गेस्ट इन लंदन’ की टीम भले ही शुरुआत से इस बात का दावा करती आयी हो कि 2010 में रिलीज हुई ‘अतिथि तुम कब जाओगे’ से इस फ़िल्म का कुछ लेना देना नहीं […]

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II उर्मिला कोरी II

फ़िल्म: गेस्ट इन लंदन
निर्माता: पेनोरमा फिल्म्स
निर्देशक अश्विनी धीर
कलाकार: कार्तिक आर्यन, कृति खरबंदा,परेश रावल,तन्वी आज़मी,संजय मिश्रा और अन्य
रेटिंग: दो

‘गेस्ट इन लंदन’ की टीम भले ही शुरुआत से इस बात का दावा करती आयी हो कि 2010 में रिलीज हुई ‘अतिथि तुम कब जाओगे’ से इस फ़िल्म का कुछ लेना देना नहीं है लेकिन यह फ़िल्म उसी फ़िल्म का दोहराव है. यह बात फ़िल्म देखते हुए आपको कई बार महसूस होगी. निर्देशक अश्विनी धीर और अभिनेता परेश रावल के साथ साथ कहानी भी वैसी ही है. आर्यन खन्ना (कार्तिक आर्यन) लंदन की नागरिकता पाने के लिए अनन्या पटेल (नेहा खरबंदा) के साथ नकली शादी करने वाला होता है. इसी बीच आर्यन के पंजाब में रह रहे चाचाजी के पड़ोसी के किराएदार आर्यन के पास पहुँच जाते हैं. वह आर्यन और अनन्या को करीब ले आते हैं जिससे उनकी नकली शादी असली में बदल जाती है कहानी यही खत्म नहीं होती.

फिर शुरू हो जाती है भारतीय संस्कारों की दुहाई के साथ-साथ हर दूसरे सीन में पाद की बात. आर्यन इस अनचाहे अतिथि को वापस भारत भेजने का फैसला करता है. उसके बाद एक घटनाक्रम इसी क्रम में आते रहते हैं लेकिन क्लाइमेक्स से पहले कहानी एक सस्पेंस भी है. फ़िल्म की कहानी भले ही पिछली फिल्म की तरह है लेकिन इस बार सिचुएशनल कॉमेडी और सीन्स नदारद हैं. फ़िल्म में सबसे ज़्यादा नस्लवादी जोक्स ही सुनने को मिले हैं. जिसका शिकार पाकिस्तान से लेकर चीन तक है. खासकर चीन की लड़की से जुड़ी दोनों कॉमेडी वाले सिचुएशन पर हंसी कम लेखक की सोच पर तरस ज़्यादा आता है.

काले रंग, औरतों और समलैंगिकता इनका मजाक बनाने के साथ साथ पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक और बाप बाप होता है जैसे संवादों का जमकर इस्तेमाल हंसी के लिए किया गया है. जब फ़िल्म में हंसी के लिए हर दूसरे सीन में पाद का नाम लिया जाए ऐसे में यह समझना ज़्यादा मुश्किल नहीं है कि फ़िल्म की कॉमेडी का स्तर क्या है. फ़िल्म में पाद पर ग़ज़ल भी हैं. फ़िल्म का क्लाइमेक्स ज़रूर अच्छा बन पड़ा है. 9.11 की घटना से कहानी को अच्छे से जोड़ा ग़या है. हां कमज़ोर वीएफएक्स उस दृश्य को प्रभाव को ज़रूर कम कर जाते हैं. फ़िल्म का फर्स्ट हाफ ठीक है दूसरे हाफ में कहानी ज़बरदस्ती खींची गई है.

अभिनय की बात करें तो कार्तिक आर्यन अपनी किरदार में जमे हैं. नेहा खरबंदा परदे पर खूबसूरत दिखी हैं. परदे पर उनके करने के लिए कुछ ज़्यादा नहीं था. यह फ़िल्म पूरी तरह से परेश रावल की फ़िल्म है. वह इस बार निराश करते हैं. परेश रावल का अभिनय अतिथि तुम कब जाओगे की पुनरावृत्ति है. उनके संवाद में पंजाबी कम गुजराती लहजा ज़्यादा है. संजय मिश्रा अपने किरदार के साथ न्याय करने में कामयाब रहे हैं. तन्वी आज़मी का अभिनय भी औसत है. वह एक ही संवाद पूरी फिल्म में कई बार दोहराती दिखती हैं.

अजय की मौजूदगी खास है. फ़िल्म का गीत संगीत कुछ खास नहीं है. वह थिएटर से निकलने के बाद याद नहीं रह जाते हैं. फ़िल्म के दूसरे पक्ष में फ़िल्म का लुक खास है. लंदन की खूबसूरती को पर्दे पर बखूबी उतारा गया है. कुलमिलाकर इस बार यह अतिथि हँसाने में नाकामयाब रहे हैं.

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