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दिल्ली विधानसभा चुनावः राजनीतिक पार्टियों से क्या चाहते हैं दिल्ली के वरिष्ठ नागरिक

Updated at : 07 Feb 2020 11:23 AM (IST)
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दिल्ली विधानसभा चुनावः राजनीतिक पार्टियों से क्या चाहते हैं दिल्ली के वरिष्ठ नागरिक

दिल्ली से पंकज पाठक और सूरज ठाकुर की रिपोर्ट: दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए चुनाव प्रचार का शोर अब थम चुका है. अब उम्मीदवार या कार्यकर्ता बिना किसी माइक, रैली या भोंपू के केवल डोर-टू-डोर कैंपेन कर सकते हैं. इस बीच प्रभात खबर की टीम लक्ष्मीनगर इलाके में पहुंची जहां हमारी मुलाकात चाय पीते और […]

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दिल्ली से पंकज पाठक और सूरज ठाकुर की रिपोर्ट: दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए चुनाव प्रचार का शोर अब थम चुका है. अब उम्मीदवार या कार्यकर्ता बिना किसी माइक, रैली या भोंपू के केवल डोर-टू-डोर कैंपेन कर सकते हैं. इस बीच प्रभात खबर की टीम लक्ष्मीनगर इलाके में पहुंची जहां हमारी मुलाकात चाय पीते और चुनाव पर चर्चा करते कुछ वरिष्ठ नागरिकों से हुई. तो, हम वहां रूके उनसे बदलती सियासी हवा, राजनीतिक तौर तरीकों और दिल्ली में बुजुर्गों की समस्या और मुद्दों पर बातचीत की.
कभी पत्रकारिता में वर्षों तक सक्रिय रहे 80 वर्षीय वीके सिंह से हमने पूछा कि वो बीते कुछ दशकों में राजनीति और चुनावी कैंपेन में क्या मूलभूत बदलाव देखते हैं. इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि काफी कुछ बदल गया. पहले चुनाव मुद्दों पर चर्चा के लिए होता है लेकिन अब ऐसा लगता है कि सब व्यवसाय के लिए हो रहा है. उन्होंने कहा कि पहले कार्यकर्ता अपने राजनीतिक दल के प्रति समर्पित होते थे और निस्वार्थ भाव से काम करते थे. लेकिन अब लोग जिस पार्टी से ज्यादा पैसा मिलता है उसी के कार्यकर्ता हो जाते हैं. मुद्दों पर बातचीत नहीं होती.
जनप्रतिनिधियों में क्या बदलाव आया है? ये पूछने पर वीके सिंह कहते हैं कि पहले जनप्रतिनिधियों का आम जनता से सीधे संवाद होता था. लोग बेसब्री से उनका इंतजार किया करते थे. सब काम छोड़कर उनको सुनने जाया करते थे लेकिन अब वीआईपी कल्चर हावी हो गया है.
नेताजी ट्विटर के जरिये जनता तक पहुंचते हैं. भावनात्मक लगाव कम हो रहा है. इन चुनावों में उनका मुद्दा क्या होगा वरिष्ठ नागरिकों के लिए. इस सवाल के जवाब में उनका कहना था कि वरिष्ठ नागरिकों के लिए सबसे बड़ा मुद्दा स्वास्थ्य और सुरक्षा का है. उन्होंने बताया कि सरकारी अस्पतालों में हमें भी डॉक्टर से मिलने और दवाइयां लेने के लिए लंबी लाइनें लगानी पड़ती है. इस उम्र में लंबी लाइनें लगाना काफी तकलीफ देह होता है. उनका कहना था कि सरकारी परिवहन में भी बुजुर्गों के लिए सहुलियत होनी चाहिए.
वीके सिंह की हां में हां मिलाते हुए एक और बुजुर्ग ने कहा कि सरकार को यातायात में वरिष्ठ नागरिकों के सहूलियत के बारे में सोचना चाहिए. उन्होंने कहा कि रिटायरमेंट के बाद हमें भी आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ता है लेकिन बसों में यात्रा केवल महिलाओं के लिए फ्री किया गया जो कि समझ से परे हैं. इनका कहना था कि सरकार को वरिष्ठ नागरिकों के लिए भी फ्री यातायात की सुविधा देनी चाहिए थी. जो लोग यातायात का खर्च उठा सकते हैं, और शारीरिक रूप से ही सक्षम हैं, उन्हीं को यात्रा फ्री देने का क्या मतलब बनता है. उन्होंने कहा कि सरकार को ना केवल यात्रा किराये में सहूलियत देना चाहिए बल्कि यात्रा के दौरान किसी तरह की परेशानी ना हो इस बारे में भी सोचना चाहिए.
इसी चर्चा में शामिल सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी 70 वर्षीय प्रदुम्न जैन ने कहा कि देखिए, रेलवे के कर्मचारियों के लिए अलग से अस्पताल की सुविधा होती है. डिफेंस से सेवानिवृत्त होने वाले अधिकारियों-कर्मचारियों को भी सेपरेट हेल्थ सुविधा मिलती है लेकिन केंद्रीय सरकार के अधीन अधिकारियों को कोई मेडिकल सुविधा अलग से नहीं निकलती. प्रदुम्न जैन ने बताया कि सरकारी स्तर पर ऐसा प्रयास होना चाहिए कि वरिष्ठ नागरिकों का इलाज उनके घर पर ही किया जाए. ताकि उनको कई किलोमीटर तक चलकर अस्पताल जाने और वहां लंबी लाइन लगाने की परेशानी से छुटकारा मिल सके.
यहीं मौजूद एक अन्य वरिष्ठ नागरिक पालीवाल जी ने सुरक्षा को बड़ा मसला बताया. उन्होंने कहा कि यहां बड़ी संख्या में ऐसे बुजुर्ग दंपत्ति रहते हैं जिनका परिवार उनके साथ नहीं रहता. बच्चे पढ़ाई या नौकरी के लिए किसी दूसरे शहर या विदेश में रहते हैं. उन्होंने कहा कि ऐसे दंपत्तियों को कोई ये पूछने नहीं आता कि किस हाल में रह रहे हैं.
पालीवाल जी का कहना था कि नजदीकी पुलिस स्टेशन से किसी पुलिसवाले को हफ्ते में एक बार आकर देखना चाहिए कि दंपत्ति ठीक से हैं या नहीं, उन्हें कोई दिक्कत तो नहीं है. कोई उन्हें धमकी तो नहीं दे रहा. नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र से स्वास्थ्यकर्मियों को हफ्ते में कम से कम एक बार वरिष्ठ नागरिकों के स्वास्थ्य का हाल चाल लेने के लिए आना चाहिए. प्रशासनिक अधिकारियों को भी आकर जानना चाहिए कि कहीं कोई इन लोगों को धमका तो नहीं रहा है.
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