तीन बुनियादी सवाल!

Published at :15 Jun 2015 12:08 PM (IST)
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तीन बुनियादी सवाल!

-हरिवंश- धृतराष्ट्र समाज बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के तत्वावधान में बिहार में परीक्षाएं चल रही हैं. वर्ष 2013 की वार्षिक माध्यमिक परीक्षा. 13 मार्च से 19 मार्च तक परीक्षाएं चलेंगी. हर प्रश्नपत्र में परीक्षार्थियों को पंद्रह मिनट अतिरिक्त समय मिला है, ताकि वे प्रश्नपत्र को धैर्य से समझ सकें. जिस दिन परीक्षा शुरू हुई, उस […]

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-हरिवंश-

धृतराष्ट्र समाज

बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के तत्वावधान में बिहार में परीक्षाएं चल रही हैं. वर्ष 2013 की वार्षिक माध्यमिक परीक्षा. 13 मार्च से 19 मार्च तक परीक्षाएं चलेंगी. हर प्रश्नपत्र में परीक्षार्थियों को पंद्रह मिनट अतिरिक्त समय मिला है, ताकि वे प्रश्नपत्र को धैर्य से समझ सकें.

जिस दिन परीक्षा शुरू हुई, उस दिन के दृश्य कई टीवी चैनलों पर दिखे. जगह-जगह परीक्षा केंद्रों पर जमा भारी भीड़. बताया गया कि परीक्षा दे रहे छात्र-छात्राओं के सगे-संबंधियों की यह भीड़ है. परीक्षा केंद्रों के बाहर अपार भीड़ इसलिए जमी थी कि वह परीक्षार्थियों को चोरी (कदाचार या नकल) कराने में मदद कर सके. किताब खोल कर लिखते परीक्षार्थी भी टीवी पर दिखे.

अगर पूरा समाज धृतराष्ट्र की भूमिका में उतर जाये, तो आप क्या कर सकते हैं? धृतराष्ट्र महज अंधे नहीं थे, वह विवेक से परे थे. अन्याय के साथ थे. समाज के अवांछित तत्वों को प्रोत्साहित कर रहे थे. इसका परिणाम हुआ, समग्र नाश.

पूरा समाज ही अपना विवेक गिरवी रखने, अंधा बन जाने पर तुला हो, तो विनाश कौन रोक सकता है? एक पल ठहर कर कोई पूछने की स्थिति में है कि कहां ले जा रहे हैं, हम अपनी शिक्षा-व्यवस्था को? परीक्षा में नकल कर रहे छात्रों को? कहने को पढ़े-लिखे, पर अपढ़ लोगों की भीड़ बढ़ा रहे हैं. कई जानी-मानी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने भारत के अच्छे संस्थानों से निकलनेवाले इंजीनियरिंग-मैनेजमेंट के छात्रों को अनइंप्लायबुल (नौकरी के अयोग्य) पाया है. अच्छे संस्थानों की यह स्थिति है, तो मामूली जगहों पर पढ़ रहे छात्र-छात्राओं की योग्यता समझी जा सकती है. पीएचडी कर चुके लोग मिलते हैं, जो चार पंक्ति शुद्ध नहीं लिख पाते. पिछले वर्ष की खबर थी कि बिहार के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के छात्र, राजेंद्र बाबू के बारे में कुछ बता नहीं सके. सरकारें या राजनीतिक दल इस दिशा में कुछ नहीं कर सकते. उन्हें गद्दी चाहिए. इसलिए वे हर जगह वोट बैंक चाहते हैं.

एक स्टेट्समैन पीढ़ियों के बारे में सोचता है और एक राजनेता अपनी गद्दी तक. जो पीढ़ियों तक की चिंता करेगा, वो नकल जैसी चीजों पर सख्ती से पाबंदी की कोशिश करेगा. पर आज देश में जो राजनीतिक दल हैं, उनसे यह कल्पना असंभव है. एक बार उत्तर प्रदेश के शिक्षा मंत्री के तौर पर राजनाथ सिंह ने सख्ती से नकल रोक दी थी. परीक्षा केंद्रों पर जमा होनेवाली भारी भीड़ को पुलिस-प्रशासन की मदद से खाली करा दिया गया था. भाजपा को सत्ता खोनी पड़ी. चुनाव में भाजपा विरोधी दलों ने छात्रों से वादा किया वे नकल पर पाबंदी नहीं लगायेंगे. इस तरह उत्तर प्रदेश या बिहार के परीक्षा केंद्रों पर आज समान दृश्य और समान संस्कृति है.

पर छात्रों के अभिभावकों में विवेक है या नहीं? उनकी मति मारी गयी है? पूरे समाज का विवेक कहां गिरवी है? किसी एक कोने से इस गंभीर सामाजिक बीमारी के खिलाफ कोई आवाज नहीं? पूरा समाज धृतराष्ट और गांधारी की भूमिका में हो, तो कौन सुधार कर सकता है? अपढ़ लोगों की जमात खड़ी करनेवाली इस शिक्षा से क्या लाभ मिलनेवाला है? ऐसे पढ़े-लिखे अपढ़ अपनी जड़ से भी कटते हैं. यानी न खेती कर सकते हैं, न गांव में रह सकते हैं. वे अधूरे और बेचैन इंसान बनते हैं. उनमें न कोई हुनर या जज्बा होता है कि वे सही रास्ते अपना भविष्य गढ़ सके. जरूरत है कि पूरा समाज आत्मसमीक्षा करे कि ऐसी शिक्षा-व्यवस्था से हमें क्या लाभ है?

शिक्षा इनसान-समाज को परिमार्जित करने का माध्यम है. विवेक, ज्ञान, संयम, समझ, शालीनता, कानून-प्रेम यानी इनसान-समाज में जो कुछ अच्छा है या हो सकता है, उसका स्रोत तो शिक्षा ही है. गंगा का जहां से उद्भव है, उस गंगोत्री में ही अगर वह प्रदूषित हो जाये, तो फिर उसकी सफाई असंभव है? स्कूलों-कॉलेजों में ही नकल, गलत आचरण, पढ़े बगैर अधिकाधिक नंबर पाने की ख्वाहिश पनपने लगे, तो समाज कहां सुधरेगा? छल, प्रपंच, अनैतिक होना, दूसरों के कंधे पर आगे बढ़ना जैसे मूल्य-संस्कार इसी नकल करनेवाली शिक्षा व्यवस्था की भी देन हैं. कम से कम इसके खिलाफ आवाज तो उठे. यह आत्मघात या सामूहिक आत्महत्या का रास्ता है.

योग्य पत्रकार

प्रेस परिषद के चेयरमैन न्यायमूर्ति (अवकाश प्राप्त) मरकडेय काटजू ने एक समिति बनायी है. पत्रकार होने की न्यूनतम योग्यता तय करने के लिए. अच्छा प्रयास है. पर क्या पत्रकारों की न्यूनतम योग्यता तय हो जाये, तो पत्रकार योग्य हो जायेंगे?

दरअसल, पत्रकारिता एक पैशन (आवेग, उमंग, उत्साह) है. कोई भी पेशा एक धुन है. सनक है. और शौक भी. पर पेशे के प्रति यह पैशन पैदा होता है, शिक्षण संस्थाओं से. समाज और राजनीति से. पत्रकार भी इसी समाज-माहौल की उपज हैं. वे किसी अलग ग्रह से नहीं उतरते. भारत के शिक्षण संस्थानों की क्या स्थिति है? विश्वविद्यालय और कॉलेजों से किस स्तर के छात्र निकल रहे हैं? उनकी योग्यता क्या है? पीएचडी किये लोग आवेदन नहीं लिख पाते.

अनेक ऐसे पत्रकार हुए, हिंदी या अंगरेजी में, जिनकी औपचारिक शिक्षा नहीं थी, पर उनमें आवेग था, प्रतिबद्धता थी, वैचारिक आग्रह था. समाज के प्रति कुछ करने की धुन थी. यह जज्बा पैदा होता था, राजनीति से. उस राजनीति से, जिसमें विचार जिंदा थे, जो राजनीति धंधा नहीं थी और न सत्ता पाने का महज मंच. डाक्टर लोहिया, जब लोकसभा का उपचुनाव जीत कर गये, तो उन्होंने लोकसभा में हिंदी में बोलना शुरू किया. तब तक संसद में अंगरेजी ही सबसे प्रभावी भाषा थी. पर डॉ लोहिया के भाषणों में वैचारिक तत्व इतने प्रखर और तेजस्वी थे कि अंगरेजी जाननेवाले विद्वानों-धुरंधर पत्रकारों ने हिंदी पढ़ी, सीखी और जानी.

समाज, देश या राजनीति में सबसे प्रमुख है, चरित्र, विचार और पैशन. यह पैदा होता है, सिर्फ वैचारिक राजनीति से. चरित्रहीन राजनीति या गद्दी की राजनीति से नहीं. आजादी की लड़ाई में ऐसे ही वैचारिक और चरित्रवान राजनेता हुए, तो पत्रकारिता भी बदल गयी. एक से एक विचारवान पत्रकार उभरे. कुछ लोगों को गलत धारणा है कि आजादी की लड़ाई में पत्रकारिता ने राजनीति बदली. दरअसल, उस वक्त की राजनीति में इतना तेज, ताप और चरित्र था कि उसने जीवन के हर क्षेत्र को बदल दिया. एक से एक बढ़कर शिक्षक हुए, वकील हुए, समाजसेवी हुए. कामराज जैसे लगभग अशिक्षित लोगों ने राजनीति में नयी लकीर खींच दी.

तमिलनाडु में प्रशासन, विकास और राजनीति के उच्च मापदंड स्थापित किये, कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में. राजनीति की गरिमा को ऊंचाई दी, अपने आचरण और काम से. आज कौन पढ़ा-लिखा राजनीतिज्ञ, उनके पासंग बराबर भी दिखायी देता है. अपवादों की बात छोड़ दें. आज समाज की मुख्यधारा यही है. हर क्षेत्र में औसत, प्रतिभाहीन, समझौता- परस्त और किसी तरह शिखर छूने को बेचैन लोग. यह आज के समाज का दर्शन है. ईमानदार, चरित्रवान तो बोझ बन गये हैं. इस आबोहवा और माहौल में सही पत्रकार बनना कठिन है. फिर भी इस कोशिश की प्रशंसा होनी चाहिए.

नाज करिए!

अजमेर से खबर थी. अजमेरशरीफ आध्यात्मिक संस्था के प्रमुख का बयान. अजमेरशरीफ दरगाह के दीवान जैनुल आबेदीन अली खां ने कहा कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की अजमेरशरीफ यात्रा में स्वागत नहीं करूंगा. मेरा विरोध इसलिए है कि पाकिस्तानी सेना के लोगों ने नियंत्रण रेखा (लाइन ऑफ कंट्रोल) पर भारतीय सैनिकों की गरदन काटी और उनकी हत्या की. इस घटना ने हम भारतीयों को आहत किया है. पर पाकिस्तान सरकार हमारी संवेदनाओं को समझ नहीं रही है. अवसर था, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रजा परवेज अशरफ का अजमेरशरीफ आगमन.

हर भारतवासी को इस बयान पर फख्र होना चाहिए. बयान से सहमति-असहमति अपनी जगह है, पर देशप्रेम बुनियादी चीज है. किसी मुल्क की बेहतरी और ताकतवर होने की यह पहली शर्त है. भारत में कुछ लोग मानते हैं के देशभक्ति पर कुछ खास लोगों या समूहों का अधिपत्य है.

दरअसल, भारत की यही ताकत है कि हर धर्म, कौम, जाति, क्षेत्र में देश को चाहनेवाले लोग भरे हैं. जरूरत है कि इस जज्बा को राजनीति एक सार्थक और सही दिशा दे. ध्रुव सत्य है कि राष्ट्रीयता की प्रबल भावना के बगैर कोई मुल्क इतिहास नहीं बनाता. आजादी के बाद राजनीति में क्षेत्र, जाति, धर्म के बढ़ते प्रभाव के कारण राष्ट्रीयता की वह पुरानी भावना नहीं रही.

पाकिस्तान में वे ताकतें प्रभावी हैं, जो भारत-पाकिस्तान के संबंधों में स्थिरता-सौहार्द नहीं चाहतीं. हाल में पंजाब का एक सामान्य नागरिक भूलवश पाक सीमा में प्रवेश कर गया, तो उसकी लाश भारत को सौंपी गयी. पर, इस शव के अंदर से किडनी, हार्ट वगैरह निकाल लिये गये थे. आखिर किस क्रूरता के युग में हम जी रहे हैं? कश्मीर में सीआरपीएफ पर हमले में जो दो आतंकवादी मारे गये, वे भी पाकिस्तानी हैं. इस तरह की घटनाएं नफरत, द्वेष और घृणा का माहौल बना रही हैं.

निश्चित तौर से युद्ध इसका हल या उत्तर नहीं है. पर भारत कब तक धैर्य व संयम से काम लेगा या मूकदर्शक बना रहेगा? इटली का ही प्रसंग देख लें. उसके दो नागरिकों ने केरल के दो लोगों को गोली मारी. सरेआम. भारतीय समुद्र में. अब वे हत्यारे, इटली से यहां आ नहीं रहे कि उन पर मुकदमा चले. यही घटना चीन, अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस वगैरह के लोगों के साथ हो, तो क्या होगा? चूंकि भारत कमजोर

है, अंदर से विभाजित है, यहां के राजनेताओं में देशप्रेम नहीं है, देश के सवाल पर एका नहीं है, इसलिए भारत हर जगह अपमानित हो रहा है. भारत के लोगों में जैनुल आबेदीन अली खां की तरह उत्कट देशप्रेम हो, तो भारत की राजनीति में देशप्रेम का प्रसंग एक प्रभावी मुद्दा बनेगा. राजनीति में देशप्रेम अगर मुद्दा बनेगा, तो हर दल इस सवाल पर नये सिरे से सोचने के लिए विवश होगा.

इसलिए जैनुल आबेदीन अली खां का पूरे देश में अभिनंदन होना चाहिए. वह देशप्रेम के प्रतीक हैं. बाजार और उदारीकरण ने देशप्रेम को भी प्रभावित किया है. अब स्कूलों में न पहले की तरह की तरह 26 जनवरी होती है, न 15 अगस्त. न हम उत्कट भावना या उमंग-उत्साह के साथ अपने उन राष्ट्रीय नेताओं और क्रांतिकारियों का स्मरण करते हैं, जिन्होंने अपना भविष्य कुरबान किया, ताकि हम यानी शहीदों की भावी पीढ़ी एक अच्छा और आजाद जीवन जी सके. पर हम कृतघ्न निकले. अजमेरशरीफ के जैनुल आबेदीन अली खां ने एक नयी राह दिखायी है. जरूरत है कि इस पर चलनेवाले आगे आयें.

दिनांक : 17.03.13

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