बैंक कर्मचारियों का हल्ला बोल: PLI के नए फॉर्मूले को 'एकतरफा' बताकर रद्द करने की मांग, जानें क्या है पूरा विवाद

बैंक कर्मचारी (सांकेतिक फोटो/Canva)
Bank PLI Formula: बैंक यूनियनों ने सरकार के नए पीएलआई (PLI) फॉर्मूले को एकतरफा और समझौते के खिलाफ बताते हुए रद्द करने की मांग की है. मामला फिलहाल श्रम आयुक्त के पास पेंडिंग है.
Bank PLI Formula: बैंकों में काम करने वाले कर्मचारियों और सरकार के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो गई है. इस बार विवाद की जड़ है PLI (Performance Linked Incentive) यानी वो एक्स्ट्रा पैसा जो अच्छे काम के बदले मिलता है. बैंक कर्मचारियों के सबसे बड़े संगठन UFBU (यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस) ने सरकार के नए फॉर्मूले को ‘धोखा’ और ‘एकतरफा’ बताते हुए इसे तुरंत वापस लेने की मांग की है. यूनियनों का कहना है कि यह नया तरीका कर्मचारियों के बीच आपसी झगड़े और असंतोष की वजह बनेगा.
द्विपक्षीय समझौते के उल्लंघन का आरोप
बैंक यूनियनों का साफ कहना है कि पीएलआई (PLI) का पैसा कोई खैरात नहीं है, बल्कि यह एक द्विपक्षीय समझौते (Bipartite Settlement) का हिस्सा है. यानी इसे तय करने के लिए बैंक प्रबंधन और कर्मचारियों के बीच बाकायदा बातचीत और समझौता हुआ था. अब सरकार ने बिना किसी से पूछे चुपचाप नया फॉर्मूला लागू कर दिया है. यूनियनों का आरोप है कि यह न केवल पुराने वादों को तोड़ना है, बल्कि काम करने के माहौल को खराब करने की एक कोशिश भी है.
मौजूदा समझौते के तहत पीएलआई का महत्व
मौजूदा नियमों के हिसाब से पीएलआई का असली मकसद कर्मचारियों को उनके टैलेंट और मेहनत के आधार पर इनाम देना था. इसमें पूरी पारदर्शिता (Transparency) रखी गई थी ताकि किसी के साथ भेदभाव न हो. यूनियनों का कहना है कि यह समझौता दोनों पक्षों की रजामंदी से बना था, लेकिन अब सरकार अपनी मर्जी चलाकर इस पूरी व्यवस्था को बिगाड़ रही है. इससे बैंकिंग सेक्टर में सालों से चले आ रहे अच्छे रिश्तों में खटास आ सकती है.
सुलह प्रक्रिया पहले ही चल रही है
हैरानी की बात यह है कि यह मामला पहले से ही मुख्य श्रम आयुक्त (Central Labour Commissioner) के पास सुलह के लिए पड़ा हुआ है. 9 मार्च 2026 को हुई मीटिंग में भी स्केल 4 से 7 तक के बड़े अधिकारियों के पीएलआई पेमेंट को लेकर चर्चा हुई थी. यूनियनों का तर्क है कि जब कोर्ट या कमिश्नर के पास बातचीत का दौर चल रहा हो, तब सरकार या बैंकों को अपनी तरफ से कोई भी नया नियम थोपने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है.
प्रबंधन और वित्तीय सेवा विभाग से आग्रह
यूएफबीयू (UFBU) ने सरकार के वित्तीय सेवा विभाग, भारतीय बैंक संघ (IBA) और सभी सरकारी बैंकों को सख्त चेतावनी दी है. उन्होंने अपील की है कि किसी भी तरह की एकतरफा कार्रवाई को तुरंत रोका जाए. संगठन ने साफ कर दिया है कि मसले का हल केवल ‘टेबल पर बैठकर’ बातचीत से ही निकल सकता है. अगर सरकार जिद पर अड़ी रही, तो बैंकों के भीतर तनाव बढ़ेगा जिसका सीधा असर आम जनता की बैंकिंग सेवाओं पर भी पड़ सकता है.
कर्मचारियों की प्रतिक्रिया और अपेक्षाएं
बैंक कर्मचारी इस नए फॉर्मूले को किसी भी कीमत पर स्वीकार करने के मूड में नहीं हैं. उनका कहना है कि वे केवल वही नियम मानेंगे जो आपसी समझौते और कानूनी प्रक्रिया के तहत बने हों. कर्मचारियों का मानना है कि यह लड़ाई सिर्फ उनके फायदे की नहीं है, बल्कि पूरे बैंकिंग सिस्टम को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाए रखने के लिए है. अगर आज एकतरफा फैसले मान लिए गए, तो कल कर्मचारियों की एकता और ताकत कमजोर पड़ जाएगी.
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By Abhishek Pandey
अभिषेक पाण्डेय पिछले 2 वर्षों से प्रभात खबर (Prabhat Khabar) में डिजिटल जर्नलिस्ट के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने पत्रकारिता के प्रतिष्ठित संस्थान 'दादा माखनलाल की बगिया' यानी माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल (MCU) से मीडिया की बारीकियां सीखीं और अपनी शैक्षणिक योग्यता पूरी की है। अभिषेक को वित्तीय जगत (Financial Sector) और बाजार की गहरी समझ है। वे नियमित रूप से स्टॉक मार्केट (Stock Market), पर्सनल फाइनेंस, बजट और बैंकिंग जैसे जटिल विषयों पर गहन शोध के साथ विश्लेषणात्मक लेख लिखते हैं। इसके अतिरिक्त, इंडस्ट्री न्यूज, MSME सेक्टर, एग्रीकल्चर (कृषि) और केंद्र व राज्य सरकार की सरकारी योजनाओं (Sarkari Yojana) का प्रभावी विश्लेषण उनके लेखन के मुख्य क्षेत्र हैं। आम जनमानस से जुड़ी यूटिलिटी (Utility) खबरों और प्रेरणादायक सक्सेस स्टोरीज को पाठकों तक पहुँचाने में उनकी विशेष रुचि है। तथ्यों की सटीकता और सरल भाषा अभिषेक के लेखन की पहचान है, जिसका उद्देश्य पाठकों को हर महत्वपूर्ण बदलाव के प्रति जागरूक और सशक्त बनाना है।
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