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Khagaria Vidhaanasabha: अनोखा इतिहास समेटे है खगड़िया, जानिए क्यों अकबर के दीवान ने रखा गया ये नाम

Updated at : 17 Aug 2025 7:05 AM (IST)
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Khagaria Vidhaanasabha

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Khagaria Vidhaanasabha: नाम सुनते ही लोग चौंक जाते हैं—खगड़िया! आखिर यह नाम आया कहां से? घास से, फरक से या अकबर के दीवान टोडरमल की नपाई से? बिहार का यह जिला सिर्फ नाम की वजह से ही नहीं, बल्कि अपने अनोखे इतिहास, नदियों और वीर सपूतों की कहानियों के लिए भी जाना जाता है.

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Khagaria Vidhaanasabha: बिहार के खगड़िया का इतिहास बेहद दिलचस्प है. कभी यह मुंगेर का हिस्सा था, तो कभी इसे फरकिया कहा गया. राजा अकबर के दीवान टोडरमल ने इसे नापने की कोशिश की, लेकिन सात नदियों और उनकी अनगिनत धाराओं ने इसे अनुपयोगी बना दिया. तभी इसका नाम पड़ा फरकिया. बाद में यहां उगने वाली ‘खगड़ा घास’ ने इसे नया नाम दिया—खगड़िया. 1981 में यह आधिकारिक रूप से जिला बना और अपनी अलग पहचान बनाई.

खगड़िया नाम की कहानी

आज जिसे हम खगड़िया कहते हैं, उसका नाम समय के साथ कई बार बदला. पहले इसे फरकिया कहा गया. वजह थी—अकबर के दीवान टोडरमल. जब वे यहां पहुंचे, तो सात नदियों और उनकी 56 धाराओं-उपधाराओं के कारण यहां की नपाई पूरी नहीं कर पाए. उन्होंने इसे अनुपयोगी मानते हुए ‘फरक कर दिया’. तभी से यह जगह फरकिया नाम से जानी जाने लगी. बाद में यहां खूब उगने वाली खगड़ा घास ने इसे नया नाम दिया—खागड़ का एरिया, यानी खगड़िया.

अकबर के दीवान टोडरमल

नदियों का संगम

खगड़िया को ‘सात नदियों की धरती’ कहा जाता है. यहां कोसी, कमला, करेह, काली कोसी, बागमती, बूढ़ी गंडक और गंगा बहती हैं. इसके अलावा मालती, खर्रा, भगीरथी और मंदरा जैसी धाराएं भी इसे सींचती हैं. नदियों से घिरा यह इलाका कभी उपजाऊ जमीन और कभी बाढ़ की तबाही—दोनों ही रूपों के लिए जाना जाता रहा है.

प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास

खगड़िया पहले मुंगेर जिले का हिस्सा था. महाभारत काल में इसका संबंध मोदगिरि से जोड़ा जाता है, जो वंगा और ताम्रलिप्त के पास एक राज्य की राजधानी थी. यह भूभाग प्राचीन अंग राज्य का हिस्सा रहा, जिसकी राजधानी चंपा (भागलपुर के पास) थी. सातवीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी इस इलाके का जिक्र किया. बाद में यह पाल शासकों, मुस्लिम शासकों और अंग्रेजों के अधीन रहा.

अंग्रेजी हुकूमत और विद्रोह

1762 में मीर कासिम ने मुर्शिदाबाद छोड़कर मुंगेर को राजधानी बनाया और अंग्रेजों से टकराव किया. ब्रिटिश दौर में खगड़िया अनुमंडल के रूप में 1943-44 में अस्तित्व में आया. अंततः 1981 में यह पूर्ण जिला बन गया.

आज़ादी की लड़ाई और बलिदान

बलदेव दास

खगड़िया की मिट्टी ने आज़ादी की लड़ाई में भी अपने सपूत दिए. गोगरी प्रखंड के सोंडिहा गांव के बलदेव दास का नाम इतिहास में अमर है. 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में उन्होंने डॉ. राजेंद्र प्रसाद की जान बचाई. अंग्रेज सिपाहियों ने बेरहमी से उन पर लाठियां बरसाईं और कान में हवा भर दी, लेकिन उनकी वीरता ने उन्हें इतिहास का नायक बना दिया. बाद में इंदिरा गांधी ने उन्हें ताम्रपत्र से सम्मानित किया.

जातीय संघर्ष और चर्चित घटनाएं

80 के दशक में खगड़िया जातीय संघर्षों और नरसंहारों के कारण भी सुर्खियों में रहा. 1985 का तौफिर दियारा कांड पूरे देश में चर्चा का विषय बना. इस घटना ने रणवीर यादव जैसे नामों को कुख्यात कर दिया

खगड़िया सिर्फ एक जिला नहीं, बल्कि इतिहास, संघर्ष और साहस की कहानी है. कभी फरकिया, कभी खगड़ा घास और अब खगड़िया—नाम बदलता रहा, लेकिन यहां की पहचान बनी रही. नदियों की धरती, स्वतंत्रता सेनानियों का गौरव और सामाजिक टकराव का इतिहास—खगड़िया सचमुच बिहार की अनोखी मिट्टी का हिस्सा है.

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Pratyush Prashant

लेखक के बारे में

By Pratyush Prashant

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एम.ए. तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से मीडिया और जेंडर में एमफिल-पीएचडी के दौरान जेंडर संवेदनशीलता पर निरंतर लेखन. जेंडर विषयक लेखन के लिए लगातार तीन वर्षों तक लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित रहे. The Credible History वेबसाइट और यूट्यूब चैनल के लिए कंटेंट राइटर और रिसर्चर के रूप में तीन वर्षों का अनुभव. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल, बिहार में राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर लेखन कर रहे हैं. किताबें पढ़ने, वायलिन बजाने और कला-साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं तथा बिहार को सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से समझने में विशेष दिलचस्पी.

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