'नेता सब चुवाव लड़ै छै, हम्में सब दिन रात समस्या से लड़ै छियै', गोपालपुर विधानसभा सीट का जानिए कैसा है हाल

Published by : Paritosh Shahi Updated At : 18 Oct 2025 8:55 PM

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सांकेतिक फोटो

Bihar Election 2025: भागलपुर जिले का गोपालपुर विधानसभा क्षेत्र इस बार भी राजनीतिक सरगर्मी का केंद्र बना हुआ है. गोपाल मंडल और बुलो मंडल की खींचतान के बीच यहां जातीय समीकरण, बाढ़-कटाव, पलायन और नवगछिया को जिला बनाने की मांग जैसे मुद्दे चुनाव की दिशा तय करेंगे.

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Bihar Election 2025: गोपालपुर विधानसभा क्षेत्र में राजनीति के मिजाज को भांपने का प्रयास प्रभात खबर ने किया. गोपाल मंडल व भुलो मंडल की राजनीतिक खींचतान के कारण चर्चा में रहे इस क्षेत्र के लोग क्या सोचते-समझते हैं, जिसे जानने के लिए लोगों से बात की. साथ ही वहां की समस्याओं व सामाजिक समीकरण को भी समझने के साथ चुनाव के मुद्दे को भी जाना. उनके चेहरे पर दर्जनभर रेखाएं, मानो कोई नक्शा हो, जिसके जरिए वह अपने अतीत का रास्ता पहचानते हों. उनकी आंखें नम हैं. कई जीवित सवाल मन की गहराइयों से उठते हैं. ये हैं अरुण कुमार, सेवानिवृत्त स्कूल शिक्षक.

क्या बोले अरुण

भागलपुर जिले के गोपालपुर विधानसभा क्षेत्र के छोटी परबत्ता जाने के रास्ते में अरुण से जब मुलाकात हुई, तब तेजी से दोपहर की ओर बढ़ता समय है. गोपालपुर के अतीत से लेकर वर्तमान तक, जातीय हिंसा-अपराध-राजनीति-स्थानीय मुद्दों पर चर्चा होती है. अरुण बाबू स्पष्ट समझाते हैं- “समस्याएं हैं, मुद्दे हैं, लेकिन चुनाव में अंत-अंत तक जाति का फैक्टर ही काम करता है. लोग बातें तो लंबी-चौड़ी करेंगे, लेकिन वोट डालने के पहले एक ही सूत्र होगा-बेटी व वोट जाति को.”

अरुण बाबू की बात सही है. आगे हर चौक-चौराहे पर चर्चाएं गूंज रही हैं- “बुलो की जीत आसान नहीं है. गोपाल मंडल गंगोता का वोट काटेगा. अरे तो क्या हुआ यादव वोट भी तो कट रहा है. डबलू यादव को सब यादव का वोट थोड़े मिलेगा, मोती यादव वोट काटेगा. फॉरवर्ड और बनिया का वोट को जदयू को ही मिलेगा.” जातीय समीकरणों की इन अंतहीन चर्चाओं में लोकतंत्र, चुनाव और मतदान औपचारिक लग रहा है. हालांकि, अभी लोग खुलकर कुछ नहीं बोल रहे. खास कर गोपाल मंडल के सवाल पर सन्नाटा पसर जाता है. ग्रामीणों का एक ही जवाब है-जिधर हवा बहेगी, उधर वोट करेंगे.

जैसे दूध में पानी, वैसे राजनीति में अपराध

गोपालपुर बिहार की हॉट सीटों में शुमार है. जेब में टिकट होने का दावा करनेवाले और लगातार चार बार (2005, 2010, 2015, 2020) विधायक रहे जदयू के नरेंद्र कुमार नीरज उर्फ गोपाल मंडल का टिकट कट गया. इस बार जदयू से मैदान में हैं-पिछले साल राजद छोड़कर पार्टी में शामिल हुए पूर्व सांसद शैलेश कुमार उर्फ बुलो मंडल और बगावती तेवर में गोपाल मंडल.

इसके अलावा वीआइपी से प्रेम सागर उर्फ डबलू यादव, जनसुराज से मनकेश्वर सिंह उर्फ मंटू प्रमुख और निर्दलीय संजीव कुमार यादव उर्फ मोती यादव के चुनाव मैदान में उतरने से पूरा चुनाव जातीय-सामाजिक समीकरणों का शतरंज बन गया है. नाम नहीं छापने की शर्त पर एक स्थानीय शिक्षाविद् कहते हैं- “प्रत्याशियों की पृष्ठभूमि पर चर्चा बेमानी है. गोपालपुर की राजनीति में अपराध वैसे ही घुला है, जैसे दूध में पानी.”

गोपालपुर वर्षों हिंसा-प्रतिहिंसा को लेकर अपराध का पर्याय बना रहा. सैकड़ों हत्या हुईं. कई इलाकों खास कर दियारा में वर्षों तक आपराधिक गिरोहों की सक्रियता रही है. बेलगाम अपराध के कारण ही नवगछिया पुलिस जिला बना. हाल के वर्षों में हालात सुधरे हैं, लेकिन अपराधमुक्त समाज की मंजिल अब भी दूर है.

बाढ़-कटाव-विस्थापन है स्थायी मुद्दा

गंगा और कोसी की धाराओं के बीच बसे गोपालपुर में त्रासदी से भरा मुद्दा है-बाढ़, कटाव और विस्थापन. विस्थापन-पुनर्वास यहां के वाशिंदों की नियति है. सैदपुर के किसान रविरंजन कुमार बताते हैं- “हजारों एकड़ जमीन कट गयी. कटाव से बचाव के लिए हर साल करोड़ों खर्च होते हैं. फिर भी बाढ़-कटाव नहीं रुका है. गांव के गांव कट चुके हैं. जाह्नवी चौक से यदि पक्का बांध बने, तो लोगों को कटाव से मुक्ति मिलेगी. कभी ये इलाका केला की खेती के लिए देश भर में प्रसिद्ध था. यदि बाढ़-कटाव से राहत मिले, तो गोपालपुर का भविष्य स्वर्णिम होगा.”

साहू परबत्ता के पहले सड़क किनारे केला बेचती उजियारी देवी कहती हैं- “हर चुनाव में नेताजी आबै छै, वादा करै छै, लेकिन बाढ़ आरू कटाव के समस्या त धरले छै.” किसान उपेंद्र ठाकुर कहते हैं- “बांध हर साल टूटै छै, मरम्मत खाली कागज पर होय छै.” देव कुमार मंडल कहते हैं- “हम्में सब हर साल गंगा कोसी कटाव में उजरै छियै, नेताजी बाढ़ देखै नाव सें आबै छै, फोटो खिचाय का चली जाय छै.” युवा वैभव का कहना है- “हमरो इलाका में शिक्षा के स्थिति कमजोर छै. केंद्रीय विद्यालय खुली जैतिहै, त बच्चा सब क बाहर पढ़ै ल नय जैतिहै.” बलराम दास मंडल कहते हैं- “किसान सब के लेल कोनो योजना कहां झलकै छै. हर साल फसल डूबी जाय छै, मुआवजा केवल कागज में म छै.”

हर जुबान पर एक ही मांग-जिला का दर्जा

बेरोजगारी और पलायन ने भौगोलिक रूप से चुनौतीपूर्ण और राजनीतिक रूप से जटिल गोपालपुर के सामाजिक ढांचे को कमजोर किया है. यह क्षेत्र पूरी तरह कृषि प्रधान है. यहां केला, मकई, परवल और काला उड़द की खेती होती है. दियारा इलाकों में बड़े पैमाने पर मछली पालन होता है. अकूत पैदावार के बाद भी किसान गरीब हैं. खाद्य प्रसंस्करण उद्योग, भंडारण सुविधा और उचित मूल्य से वंचित हैं. शिक्षा व चिकित्सा के क्षेत्र में भी कई चुनौतियां हैं. स्थानीय लोगों की माने, तो इन सारी समस्याओं का एक ही समाधान है-नवगछिया को जिला का दर्जा.

जिला बनाने के मुद्दे पर राजनीति, धर्म, जाति की दीवार टूट जाती है. गोपालपुर के कोने-कोने में हर वर्ग, हर जाति के लोग एकमत हैं कि जिला का दर्जा मिले. अधिवक्ता अजीत कुमार कहते हैं- “जदयू सरकार में कई विकास कार्य हुए हैं, पर रफ्तार धीमी है. बिना पूर्ण जिला बने विकास असंभव है.” नवगछिया कोर्ट में अधिवक्ता आलोक कुमार व कृष्ण कुमार आजाद याद दिलाते हैं- “1992 में नवगछिया पुलिस जिला बना था. 33 वर्षों से पूर्ण जिला बनाने की मांग उठ रही है. यहां पुलिस, शिक्षा, रेलवे सब कुछ है. फिर भी राजस्व जिला क्यों नहीं?”

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Paritosh Shahi

लेखक के बारे में

By Paritosh Shahi

परितोष शाही पिछले 4 वर्षों से डिजिटल मीडिया और पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत राजस्थान पत्रिका से की और वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल की बिहार टीम का हिस्सा हैं. राजनीति, सिनेमा और खेल, विशेषकर क्रिकेट में उनकी गहरी रुचि है. जटिल खबरों को सरल भाषा में पाठकों तक पहुंचाना और बदलते न्यूज माहौल में तेजी से काम करना उनकी विशेषता है. परितोष शाही ने पत्रकारिता की पढ़ाई बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) से की. पढ़ाई के दौरान ही पत्रकारिता की बारीकियों को समझना शुरू कर दिया था. खबरों को देखने, समझने और लोगों तक सही तरीके से पहुंचाने की सोच ने शुरुआत से ही इस क्षेत्र की ओर आकर्षित किया. पत्रकारिता में करियर की पहली बड़ी शुरुआत बिहार विधानसभा चुनाव 2020 के दौरान हुई, जब उन्होंने जन की बात के साथ इंटर्नशिप की. इस दौरान बिहार के 26 जिलों में जाकर सर्वे किया. यह अनुभव काफी खास रहा, क्योंकि यहां जमीनी स्तर पर राजनीति, जनता के मुद्दों और चुनावी माहौल को बहुत करीब से समझा. इसी अनुभव ने राजनीतिक समझ को और मजबूत बनाया. इसके बाद राजस्थान पत्रिका में 3 महीने की इंटर्नशिप की. यहां खबर लिखने की असली दुनिया को करीब से जाना. महज एक महीने के अंदर ही रियल टाइम न्यूज लिखने लगे. इस दौरान सीखा कि तेजी के साथ-साथ खबर की सटीकता कितनी जरूरी होती है. राजस्थान पत्रिका ने उनके अंदर एक मजबूत डिजिटल पत्रकार की नींव रखी. पत्रकारिता के सफर में आगे बढ़ते हुए पटना के जनता जंक्शन न्यूज पोर्टल में वीडियो प्रोड्यूसर के रूप में भी काम किया. यहां कैमरे के सामने बोलना, प्रेजेंटेशन देना और वीडियो कंटेंट की बारीकियां सीखीं. करीब 6 महीने के इस अनुभव ने कैमरा फ्रेंडली बनाया और ऑन-स्क्रीन प्रेजेंस को मजबूत किया. 1 अप्रैल 2023 को राजस्थान पत्रिका को प्रोफेशनल तौर पर ज्वाइन किया. यहां 17 महीने में कई बड़े चुनावी कवरेज में अहम भूमिका निभाई. लोकसभा चुनाव 2024 में नेशनल टीम के साथ जिम्मेदारी संभालने का मौका मिला. इसके अलावा मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के दौरान भी स्टेट टीम के साथ मिलकर काम किया. इस दौरान चुनावी रणनीति, राजनीतिक घटनाक्रम और बड़े मुद्दों पर काम करने का व्यापक अनुभव मिला. फिलहाल परितोष शाही प्रभात खबर डिजिटल बिहार टीम के साथ जुड़े हुए हैं. यहां बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान कई बड़ी खबरों को रियल टाइम में ब्रेक किया, ग्राउंड से जुड़े मुद्दों पर खबरें लिखीं और वीडियो भी बनाए. बिहार चुनाव के दौरान कई जिलों में गांव- गांव घूम कर लोगों की समस्या को जाना-समझा और उनके मुद्दे को जन प्रतिनिधियों तक पहुंचाया. उनकी कोशिश हमेशा यही रहती है कि पाठकों और दर्शकों तक सबसे पहले, सही और असरदार खबर पहुंचे. पत्रकारिता में लक्ष्य लगातार सीखते रहना, खुद को बेहतर बनाना और भरोसेमंद पत्रकार के रूप में अपनी पहचान मजबूत करना है.

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