तीन दशकों से भाजपा का गढ़ है बांकीपुर, क्या प्रशांत किशोर लगा पाएंगे सेंध?

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बांकीपुर में प्रचार के दौरान प्रशांत किशोर

बांकीपुर में प्रचार के दौरान प्रशांत किशोर

Bankipur By Election: बांकीपुर उपचुनाव में जन सुराज के प्रशांत किशोर एक अनोखा प्रयोग कर रहे हैं . वे भाजपा के गढ़ में सेंध लगाने के लिए घर-घर पदयात्रा कर रहे हैं . आइये जानते हैं इस उपचुनाव में उनके सामने क्या-क्या चुनौती है और इस सीट का कैसा इतिहास रहा है.

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Bankipur By Election: बांकीपुर उपचुनाव में जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर एक अलग रणनीति के साथ चुनाव मैदान में हैं. उनका मानना है कि अगर भाजपा के पारंपरिक वोटरों का समर्थन उन्हें मिलता है, तभी वे चुनाव जीत सकते हैं. इसी सोच के साथ वे लगातार इलाके में पदयात्रा कर रहे हैं और लोगों से सीधे मिल रहे हैं. वे इसे सिर्फ एक चुनाव नहीं, बल्कि नई राजनीति की शुरुआत का प्रयास बता रहे हैं. लेकिन बांकीपुर की चुनावी तस्वीर इतनी आसान नहीं है. यहां लंबे समय से वोटिंग का अपना एक तय पैटर्न रहा है, जिसे बदलना किसी भी उम्मीदवार के लिए बड़ी चुनौती माना जाता है.

क्या- क्या कर रहे प्रशांत किशोर

इसी अभियान के तहत प्रशांत किशोर ने वार्ड 29 और 35 में पदयात्रा की. इस दौरान वे गली-गली और घर-घर जाकर लोगों से मिले. उन्होंने हाथ जोड़कर लोगों का अभिवादन किया और बिना ज्यादा भाषण दिए अपनी मौजूदगी दर्ज कराई. उनके समर्थक पूरे रास्ते नारे लगाते रहे, जबकि प्रशांत किशोर शांत अंदाज में लोगों से मिलते रहे.

रास्ते में मिलने वाले बच्चों और बुजुर्गों से भी उन्होंने आत्मीयता दिखाई. जिन इलाकों में उन्होंने प्रचार किया, वहां भाजपा और राजद दोनों दलों के समर्थकों की अच्छी संख्या मानी जाती है. खासकर करबिगहिया, चिरैयाटांड़, खासमहल और चांदमारी रोड जैसे इलाकों में भाजपा का वोट बैंक मजबूत माना जाता है. यहां जलजमाव जैसी समस्याएं हर साल सामने आती हैं, लेकिन चुनाव के समय मुकाबला अक्सर भाजपा और राजद के बीच ही सिमट जाता है.

बांकीपुर विधानसभा का इतिहास जानिए

बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र का राजनीतिक इतिहास भी काफी दिलचस्प रहा है. पहले यह क्षेत्र पटना पश्चिम के नाम से जाना जाता था. यहां कायस्थ और वैश्य समाज के वोट लंबे समय से चुनावी नतीजों में अहम भूमिका निभाते रहे हैं. 1967 में इसी क्षेत्र के मतदाताओं ने तत्कालीन मुख्यमंत्री केबी सहाय को हराकर बड़ा राजनीतिक संदेश दिया था. बाद के वर्षों में राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं और 1989 के बाद से कायस्थ मतदाताओं का बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ जुड़ गया.

इसके बाद भाजपा ने इस सीट पर लगातार अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखी. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पिछले तीन दशकों में कोई भी दल इस वोट बैंक को भाजपा से अलग करने में सफल नहीं हो पाया है. यही वजह है कि इस बार भी मुकाबला आसान नहीं माना जा रहा.

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प्रशांत किशोर के सामने क्या चुनौती

प्रशांत किशोर के लिए सबसे बड़ी चुनौती भाजपा के पारंपरिक वोटरों को अपने पक्ष में लाना है. सोशल मीडिया पर इनका प्रेजेंस अच्छा है, अब जमीन पर उस समर्थन को लाना होगा. लोग व्यक्तिगत तौर पर प्रशांत किशोर का सम्मान करते हैं, लेकिन वोट देने का फैसला अलग आधार पर करते हैं. मतदाताओं के लिए सामाजिक शांति, सुरक्षा और राजनीतिक स्थिरता आज भी बड़े मुद्दे हैं.

कुछ लोगों का यह भी कहना है कि अगर प्रशांत किशोर विपक्ष के साझा उम्मीदवार होते तो मुकाबला ज्यादा कड़ा हो सकता था. फिलहाल वे बदलाव के संदेश के साथ लगातार प्रचार कर रहे हैं, जबकि दूसरी ओर भाजपा अपने मजबूत संगठन और पुराने वोट बैंक के भरोसे चुनाव मैदान में उतरी है.

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Paritosh Shahi

लेखक के बारे में

By Paritosh Shahi

परितोष शाही डिजिटल माध्यम में पिछले 3 सालों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. करियर की शुरुआत राजस्थान पत्रिका से की. अभी प्रभात खबर डिजिटल बिहार टीम में काम कर रहे हैं. देश और राज्य की राजनीति, सिनेमा और खेल (क्रिकेट) में रुचि रखते हैं.

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