हर पीढ़ी की अपनी उपलब्धियां हैं

By Prabhat Khabar Digital Desk
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। विजय बहादुर।।

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केस स्टडी 1 - झारखंड में चपरासी पद के लिए आइआइटी और पीएचडीधारी छात्रों ने आवेदन दिया, जबकि एक दशक पहले तक स्नातक और स्नातकोत्तर के मेधावी छात्रों को बढ़िया रोजगार का अवसर मिल जाता था.

केस स्टडी 2- बच्चों से ये कहा जाता है कि तुम्हारे माता- पिता ने जीवन में इतना नाम, यश और पैसा कमाया है, तो फिर तुम्हें इस लकीर को आगे बढ़ाना है या फिर कम से कम इतना तो बनाकर रखना ही है.
केस स्टडी 3- साउथ अफ्रीका के खिलाफ हालिया टूर्नामेंट में विराट कोहली ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में 21 हजार रन पूरे कर लिये हैं. विशेष बात है कि उन्होंने इतने रन बनाने में क्रिकेट के भगवान माने जानेवाले सचिन तेंदुलकर को भी पीछे छोड़ दिया है. इसके साथ ही यह बहस भी छिड़ गयी है कि क्या विराट कोहली, सचिन तेंदुलकर से बड़े खिलाड़ी बन चुके हैं.
ऊपर दिये गये तीनों केस स्टडी में दो जेनरेशन के बीच तुलनात्मक अध्ययन नजर आता है, लेकिन मन में प्रश्न उठता है कि दो जेनरेशन के बीच तुलना कितना सही है, जबकि दोनों जेनरेशन में परिवेश, सुविधाओं का स्तर, टेक्नोलॉजी, सूचना का स्तर एवं एक्सपोजर बिल्कुल अलग है.
तमाम उदाहरण मौजूद हैं. आज से 30-40 साल पहले जब लोग नौकरी के लिए साक्षात्कार में जाते थे, तो वहां जितनी रिक्तियां होती थीं, उससे कम लोग साक्षात्कार देने के लिए आते थे. ये सुनकर लगता है कि उस वक्त कितना बढ़िया दौर था, जब नौकरी के लिए कोई मारामारी नहीं थी, लेकिन जब उस जेनरेशन के लोगों के अनुभव सुनेंगे, तो लगेगा कि कैसे स्कूल और कॉलेज में पढ़ाई करना ही काफी कठिन था. पढ़ाई के लिए पैदल रोजाना 25-30 किलोमीटर आना-जाना पड़ता था, वहीं मूलभूत सुविधाओं का भी घोर अभाव था.
इसके बरक्स आज के बच्चों का आंकलन कीजिये. उन्हें ज्यादा भौतिक सुविधाएं उपलब्ध हैं, लेकिन आप उनकी दिनचर्या भी ध्यान से देखिये. पांच-छह साल का बच्चा सुबह पांच बजे किसी तरह उठता है. रोज अपने पैरेंट्स से कहता है कि सिर्फ पांच मिनट और सोने दो. किसी तरह आपाधापी में तैयार होकर किताब-कॉपी से भरे स्कूल बैग के साथ सुबह छह बजे बस में बैठने के बाद एक-दो घंटे की यात्रा कर स्कूल पहुंचता है. शाम को चार बजे स्कूल से लौटकर ट्यूशन, होम वर्क और साथ में गलाकाट प्रतिस्पर्धा में सबसे बेहतर करने का शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक और सामाजिक दबाव.
हर कालखंड में मेधावी हुए हैं. इसलिए तुलना कदापि उचित नहीं है. ये भी मानना सही नहीं है कि आज जो मैंने किया, वो अंतिम सत्य है. इंसान हो या मशीन, दोनों के लिए समय के साथ चीजें बेहतर होना एक सतत प्रक्रिया है. आज जो है, वो आनेवाले कल में उससे बेहतर होगा. ऐसा विश्वास रखना बहुत जरूरी है. ये भी सत्य है कि कल जो होगा, उसकी नींव या बेंचमार्क आज किसी ने बनाया होगा.
साहिर लुधियानवी ने लिखा है-
'कल और आएंगे नगमों की खिलती कलियां चुनने वाले,
मुझसे बेहतर कहने वाले, तुमसे बेहतर सुनने वाले'
सचिन तेंदुलकर ने जब क्रिकेट खेला, उस समय गेंदबाज, खेल के मैदान, नियम व कंडीशन्स सब कुछ (विराट कोहली, जो आज खेल रहे हैं) से अलग था.
100 मीटर वर्ल्ड रिकॉर्ड 80 के दशक में कार्ल लुइस ने बेहतर किया, जो उनसे पहले किसी ने बनाया था. 21वीं सदी में उसैन बोल्ट ने उसे और बेहतर किया और निश्चित है कि आनेवाले समय में यह और बेहतर होगा.
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