पुरानी गाड़ियों की हेडलाइट पर क्यों लगाई जाती थी काली पट्टी? वजह जानकर रह जाएंगे हैरान

Edited by Rajeev Kumar
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हेडलाइट पर काली टेप // सिम्बॉलिक एआई इमेज

कभी ट्रकों और बसों की हेडलाइट पर दिखने वाली काली पट्टी का संबंध सड़क सुरक्षा और रोशनी नियंत्रण से था. जानिए इसके पीछे की दिलचस्प कहानी और क्यों अब इसकी जरूरत नहीं पड़ती

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अगर आपने कभी पुराने ट्रकों, बसों या कारों की तस्वीरें ध्यान से देखी हों, तो एक दिलचस्प चीज जरूर नजर आई होगी. कई वाहनों की हेडलाइट पर काली पट्टी या काला रंग लगा होता था. आज की नई पीढ़ी के लिए यह सिर्फ एक अजीब डिजाइन एलिमेंट लग सकता है, लेकिन इसके पीछे सड़क सुरक्षा, तकनीकी सीमाओं और यहां तक कि युद्धकालीन जरूरतों से जुड़ी एक रोचक कहानी छिपी हुई है. आधुनिक LED और प्रोजेक्टर हेडलाइट्स के दौर में यह प्रथा लगभग खत्म हो चुकी है, लेकिन कभी यह सड़कों पर आम नजारा हुआ करती थी.

तेज रोशनी से बचाने का था सबसे बड़ा कारण

आज की तरह पहले वाहनों में एडवांस हेडलाइट टेक्नोलॉजी नहीं होती थी. ज्यादातर वाहनों में साधारण बल्ब आधारित हेडलाइट्स लगती थीं, जिनकी रोशनी को नियंत्रित करने के लिए आधुनिक फोकसिंग सिस्टम मौजूद नहीं थे. ऐसे में हाई बीम का इस्तेमाल सामने से आने वाले वाहन चालक के लिए परेशानी पैदा कर सकता था.

इसी समस्या को कम करने के लिए कई ड्राइवर हेडलाइट के ऊपरी हिस्से पर काली पट्टी लगा देते थे. इससे रोशनी का एक हिस्सा रुक जाता था और प्रकाश सीधे सामने वाले चालक की आंखों में पड़ने के बजाय सड़क पर केंद्रित रहता था.

युद्ध के दौर से जुड़ा है इसका इतिहास

हेडलाइट पर काली पट्टी लगाने का इतिहास केवल सड़कों तक सीमित नहीं है. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान कई देशों की सैन्य गाड़ियों में भी हेडलाइट्स को आंशिक रूप से ढंका जाता था. इसका उद्देश्य दुश्मन को वाहन की सही लोकेशन और दिशा का अंदाजा लगाने से रोकना था.

रात के समय सीमित रोशनी में वाहन चलाना सैन्य रणनीति का हिस्सा था. यही कारण है कि हेडलाइट को पूरी क्षमता से चमकने देने के बजाय उसकी रोशनी को नियंत्रित किया जाता था.

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भारतीय ट्रक ड्राइवरों का अनोखा जुगाड़

भारत में 1970 से 1990 के दशक के बीच यह चलन खास तौर पर ट्रक और बस चालकों के बीच काफी लोकप्रिय था. कई ड्राइवर अपने अनुभव के आधार पर हेडलाइट पर तिरछी काली पट्टी लगाते थे. उनका मानना था कि इससे सामने वाले वाहन चालक को कम ग्लेयर मिलता है और रात में दुर्घटना का खतरा घटता है.

दिलचस्प बात यह है कि यह किसी सरकारी नियम का हिस्सा नहीं था. यह पूरी तरह ड्राइवरों की अपनी समझ और व्यवहारिक अनुभव पर आधारित उपाय था.

क्या आज भी काली पट्टी लगाने की जरूरत है?

आधुनिक वाहनों में हेडलाइट तकनीक काफी विकसित हो चुकी है. अब लो बीम और हाई बीम अलग-अलग तरीके से काम करते हैं. प्रोजेक्टर, LED और मैट्रिक्स लाइटिंग सिस्टम रोशनी को अधिक सटीक दिशा में भेजते हैं. कई कारों में ऑटोमैटिक हाई-बीम कंट्रोल जैसी सुविधाएं भी मिलती हैं.

ऐसे में हेडलाइट पर काली पट्टी लगाने की जरूरत लगभग समाप्त हो चुकी है. विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसा करने से ड्राइवर की खुद की विजिबिलिटी कम हो सकती है और रात में सड़क स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देती.

तकनीक ने बदल दी पुरानी परंपरा

जिस समस्या को कभी ड्राइवर काली पट्टी लगाकर हल करने की कोशिश करते थे, आज उसे आधुनिक हेडलाइट सिस्टम तकनीकी रूप से संभाल लेते हैं. यही वजह है कि अब यह दृश्य बहुत कम देखने को मिलता है. हालांकि पुराने ट्रकों और बसों की तस्वीरों में दिखने वाली यह काली पट्टी आज भी ऑटोमोबाइल इतिहास का एक दिलचस्प हिस्सा मानी जाती है.

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राजीव कुमार हिंदी डिजिटल मीडिया के अनुभवी पत्रकार हैं और वर्तमान में प्रभातखबर.कॉम में सीनियर कंटेंट राइटर के तौर पर कार्यरत हैं. 15 वर्षों से अधिक के पत्रकारिता अनुभव के दौरान उन्होंने टेक्नोलॉजी और ऑटोमोबाइल सेक्टर की हजारों खबरों, एक्सप्लेनर, एनालिसिस और फीचर स्टोरीज पर काम किया है. सरल भाषा, गहरी रिसर्च और यूजर-फर्स्ट अप्रोच उनकी लेखन शैली की सबसे बड़ी पहचान है. राजीव की विशेषज्ञता स्मार्टफोन, गैजेट्स, एआई, मशीन लर्निंग, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT), साइबर सिक्योरिटी, टेलीकॉम, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स, ICE और हाइब्रिड कारों, ऑटोनोमस ड्राइविंग तथा डिजिटल ट्रेंड्स जैसे विषयों में रही है. वे लगातार बदलती टेक और ऑटो इंडस्ट्री पर नजर रखते हैं और रिपोर्ट्स, आधिकारिक डेटा, कंपनी अपडेट्स तथा एक्सपर्ट इनसाइट्स के आधार पर सटीक और भरोसेमंद जानकारी पाठकों तक पहुंचाते हैं. डिजिटल मीडिया में राजीव की खास पहचान SEO-ऑप्टिमाइज्ड और डेटा-ड्रिवेन कंटेंट के लिए भी रही है. गूगल डिस्कवर और यूजर एंगेजमेंट को ध्यान में रखते हुए वे ऐसे आर्टिकल्स तैयार करते हैं, जो न केवल जानकारीपूर्ण होते हैं, बल्कि पाठकों की जरूरत और सर्च ट्रेंड्स से भी मेल खाते हैं. टेक और ऑटो सेक्टर पर उनके रिव्यू, एक्सपर्ट इंटरव्यू, तुलना आधारित लेख और एक्सप्लेनर स्टोरीज को पाठकों द्वारा काफी पसंद किया जाता है. राजीव ने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत वर्ष 2011 में प्रभात खबर दैनिक से की थी. शुरुआती दौर में उन्होंने देश-विदेश, कारोबार, संपादकीय, साहित्य, मनोरंजन और फीचर लेखन जैसे विभिन्न बीट्स पर काम किया. इसके बाद डिजिटल प्लैटफॉर्म पर उन्होंने ग्राउंड रिपोर्टिंग, वैल्यू-ऐडेड स्टोरीज और ट्रेंड आधारित कंटेंट के जरिए अपनी अलग पहचान बनाई. जमशेदपुर में जन्मे राजीव ने प्रारंभिक शिक्षा सीबीएसई स्कूल से प्राप्त की. इसके बाद उन्होंने रांची यूनिवर्सिटी से बॉटनी ऑनर्स और भारतीय विद्या भवन, पुणे से हिंदी पत्रकारिता एवं जनसंचार में डिप्लोमा किया. पत्रकारिता के मूल सिद्धांत 5Ws+1H पर उनकी मजबूत पकड़ उन्हें खबरों की गहराई समझने और उन्हें आसान, स्पष्ट और प्रभावी भाषा में पाठकों तक पहुंचाने में मदद करती है. राजीव की सबसे बड़ी पहचान है, क्रेडिब्लिटी, क्लैरिटी और ऑडियंस-फर्स्ट अप्रोच. वे सिर्फ टेक ऐंड ऑटो को कवर नहीं करते, बल्कि उसे ऐसे पेश करते हैं कि हर व्यक्ति उसे समझ सके, उससे जुड़ सके और उससे फायदा उठा सके. जुड़िए rajeev.kumar@prabhatkhabar.in पर

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