बंगाली हिंदुओं के खिलाफ पाकिस्तानी अत्याचारों को नरसंहार घोषित किया जाए, US संसद में आया प्रस्ताव

Updated at : 22 Mar 2026 11:36 AM (IST)
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Pakistan atrocities 1971 against Bengali Hindus should be declared genocide Greg Landsman Resolution US Congress.

बांग्लादेश में 1971 में पाकिस्तानी कार्रवाई पर यूएस कांग्रेस में ग्रेग लैंड्समैन ने प्रस्ताव पेश किया.

Pakistan 1971 Genocide in Bangladesh: पाकिस्तान की ऐतिहासिक गुस्ताखियां अब उसका पीछा कर रही हैं. 1971 में उसने बांग्लादेश में अत्याचार का ऐसा तांडव मचाया था, जिसकी वजह से लगभग 30 लाख लोग मारे गए. इनमें हिदुओं को भी बड़ी संख्या में निशाना बनाया गया. अब अमेरकी कांग्रेस में इस पाकिस्तानी कार्रवाई को नरसंहार और युद्ध अपराध घोषित करने की मांग उठी है.

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Pakistan 1971 Genocide in Bangladesh: वाशिंगटन से आई खबर के मुताबिक, अमेरिकी सांसद ग्रेग लैंड्समैन ने प्रतिनिधि सभा में एक अहम प्रस्ताव पेश किया है. इस प्रस्ताव में मांग की गई है कि 25 मार्च 1971 को बंगाली हिंदुओं के खिलाफ पाकिस्तानी सेना और उसके सहयोगी संगठन जमात-ए-इस्लामी द्वारा किए गए अत्याचारों को ‘युद्ध अपराध और नरसंहार’ के रूप में मान्यता दी जाए. ओहायो से डेमोक्रेट सांसद लैंड्समैन द्वारा शुक्रवार को पेश किए गए इस प्रस्ताव को आगे की समीक्षा के लिए विदेश मामलों की समिति को भेज दिया गया है. यह प्रस्ताव 1971 की घटनाओं को आधिकारिक रूप से मान्यता दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है. 

प्रस्ताव में कहा गया है कि पाकिस्तानी सेना और उसके सहयोगी इस्लामी समूहों ने बिना धर्म या लिंग का भेद किए जातीय बंगालियों के खिलाफ बड़े पैमाने पर हत्याएं कीं, उनके नेताओं, बुद्धिजीवियों, पेशेवरों और छात्रों को निशाना बनाया और हजारों महिलाओं को यौन शोषण के लिए मजबूर किया. साथ ही, धार्मिक अल्पसंख्यक हिंदुओं को खास तौर पर टारगेट करते हुए उनके खिलाफ सामूहिक हत्याएं, बलात्कार, जबरन धर्मांतरण और विस्थापन जैसी घटनाओं को अंजाम दिया गया.

‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ और दमन अभियान का जिक्र

प्रस्ताव में कहा गया है कि 25 मार्च 1971 की रात पाकिस्तान सरकार ने शेख मुजीबुर रहमान को गिरफ्तार कर लिया था. इसके बाद पाकिस्तानी सेना ने पूर्वी पाकिस्तान में ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ नाम से एक व्यापक दमन अभियान शुरू किया. इस अभियान में जमात-ए-इस्लामी से प्रेरित उग्र समूहों के साथ मिलकर बड़े पैमाने पर नागरिकों की हत्याएं की गईं.

‘ब्लड टेलीग्राम’ का उल्लेख

प्रस्ताव में 28 मार्च 1971 को ढाका में अमेरिकी महावाणिज्य दूत आर्चर ब्लड द्वारा भेजे गए प्रसिद्ध ‘ब्लड टेलीग्राम’ का भी जिक्र किया गया है. इस टेलीग्राम में उन्होंने ‘चुनिंदा नरसंहार’ (Selective Genocide) शब्द का इस्तेमाल करते हुए बताया था कि पाकिस्तानी सेना के समर्थन से गैर-बंगाली मुस्लिम समूह गरीब बस्तियों पर हमले कर रहे थे और बंगालियों तथा हिंदुओं की हत्या कर रहे थे.

अमेरिकी चुप्पी पर उठाए गए सवाल

लैंड्समैन ने यह भी बताया कि 6 अप्रैल 1971 को आर्चर ब्लड ने अमेरिकी सरकार की चुप्पी पर आपत्ति जताते हुए एक और संदेश भेजा था, जिस पर ढाका वाणिज्य दूतावास के 20 अधिकारियों ने हस्ताक्षर किए थे. इस संदेश को बाद में ‘ब्लड टेलीग्राम’ के नाम से जाना गया, जिसमें कहा गया था कि नरसंहार जैसे हालात होने के बावजूद इसे एक संप्रभु देश का आंतरिक मामला मानकर हस्तक्षेप नहीं किया गया.

पाकिस्तान सेना का ऑपरेशन सर्चलाइट- नरसंहार का सबूत

25 मार्च 1971 की रात शुरू हुआ ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ पाकिस्तानी सेना की एक सुनियोजित सैन्य कार्रवाई थी, जिसका उद्देश्य पूर्वी पाकिस्तान में उभर रहे बंगाली राष्ट्रवादी आंदोलन को कुचलना था. यह अभियान उस समय शुरू किया गया जब दिसंबर 1970 के चुनाव में शेख मुजीबुर रहमान और उनकी पार्टी की भारी जीत को सत्ता में बैठे सैन्य नेतृत्व ने मानने से इनकार कर दिया. जनरल याह्या खान के नेतृत्व में बनाई गई इस योजना के तहत रातों-रात ढाका समेत कई शहरों में हमला शुरू किया गया, जो आगे चलकर पूरे क्षेत्र में हिंसा के बड़े अभियान में बदल गया.

ढाका में 25-26 मार्च 1971 की दरम्यानी रात सबसे पहले हमले हुए, जहां विश्वविद्यालय, छात्रावास, हिंदू बहुल इलाके और बुद्धिजीवियों के घर निशाने पर रहे. सुबह करीब 03:40 बजे ढाका विश्वविद्यालय पर हमला किया गया, जिसमें छात्रों और शिक्षकों की हत्या कर दी गई. इसके बाद यह अभियान चटगांव, राजशाही, खुलना और जेस्सोर तक फैल गया. यह सिर्फ सैन्य कार्रवाई नहीं रही, बल्कि महीनों तक चलने वाला दमन अभियान बन गया, जो अंततः 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी सेना द्वारा भारतीय और बांग्लादेशी सेनाओं के सामने आत्मसमर्पण तक जारी रहा. 

इस दौरान जमात-ए-इस्लामी से जुड़े रजाकार, अल-बद्र और अल-शम्स जैसे समूहों ने भी नागरिकों की पहचान कर उन्हें निशाना बनाने में अहम भूमिका निभाई. पूरे संघर्ष में मौतों के आंकड़े विवादित रहे. बांग्लादेश जहां करीब 30 लाख लोगों के मारे जाने की बात कहता है, वहीं अन्य आकलन इससे कम बताते हैं. हालांकि, इसमें कोई विवाद नहीं कि लाखों लोग मारे गए और करीब एक करोड़ लोग भारत में शरण लेने को मजबूर हुए.

अत्याचारों की निंदा की अपील

ग्रेग लैंड्समैन के प्रस्ताव में अमेरिकी प्रतिनिधि सभा से अपील की गई है कि वह 25 मार्च 1971 को बांग्लादेश के लोगों के खिलाफ पाकिस्तानी सशस्त्र बलों द्वारा किए गए अत्याचारों की कड़ी निंदा करे. इसमें कहा गया है कि पाकिस्तानी सेना और उसके सहयोगियों ने बिना धर्म और लिंग का भेद किए जातीय बंगालियों की हत्या की और नेताओं, बुद्धिजीवियों, पेशेवरों तथा छात्रों को निशाना बनाया.

महिलाओं पर अत्याचार और हिंदुओं को निशाना

प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि हजारों महिलाओं को यौन दासता के लिए मजबूर किया गया. साथ ही, धार्मिक अल्पसंख्यक हिंदुओं को विशेष रूप से निशाना बनाया गया, जिनके खिलाफ सामूहिक हत्याएं, बलात्कार, जबरन धर्मांतरण और जबरन विस्थापन जैसी घटनाएं हुईं.

भारतीय अमेरिकी लोगों के साथ ग्रेग लैंड्समैन. फोटो- एक्स.

राष्ट्रपति से आधिकारिक मान्यता की मांग

प्रस्ताव में यह स्पष्ट किया गया है कि किसी भी जातीय या धार्मिक समुदाय को उसके सदस्यों के अपराधों के लिए सामूहिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए. साथ ही, अमेरिकी राष्ट्रपति से आग्रह किया गया है कि वे 1971 में पाकिस्तानी सशस्त्र बलों और जमात-ए-इस्लामी द्वारा किए गए इन अत्याचारों को मानवता के खिलाफ अपराध, युद्ध अपराध और नरसंहार के रूप में आधिकारिक मान्यता दें.

अगर अमेरिकी संसद इस प्रस्ताव को मंजूरी दे देती है और 1971 में बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ पाकिस्तानी सेना व जमात-ए-इस्लामी द्वारा किए गए अत्याचारों को नरसंहार के रूप में मान्यता मिल जाती है, तो पाकिस्तान पर वैश्विक स्तर पर दबाव काफी बढ़ सकता है. इसके बाद अन्य देश और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भी इसी तरह के कदम उठाने की दिशा में आगे बढ़ सकती हैं. साथ ही, अमेरिका कुछ खास व्यक्तियों या संगठनों के खिलाफ टारगेटेड प्रतिबंध (सैंक्शन) लगाने पर भी विचार कर सकता है.

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कौन हैं ग्रेग लैंड्समैन?

ग्रेग लैंड्समैन अमेरिकी प्रतिनिधि सभा के डेमोक्रेटिक सांसद हैं, जो ओहायो के पहले कांग्रेस जिले का प्रतिनिधित्व करते हैं. नवंबर 2022 में उन्होंने रिपब्लिकन स्टीव चाबोट को हराकर पहली बार चुनाव जीता और राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आए. कांग्रेस पहुंचने से पहले वे सिनसिनाटी नगर परिषद में सक्रिय रहे, जहां उन्होंने शिक्षा, बाल गरीबी और सामाजिक समानता जैसे मुद्दों पर काम किया.

सिनसिनाटी में जन्मे और पले-बढ़े लैंड्समैन एक ऐसे परिवार से आते हैं, जिसकी सार्वजनिक सेवा में गहरी भागीदारी रही है. वे यहूदी समुदाय से संबंध रखते हैं और वर्तमान में हाउस कमेटी ऑन एजुकेशन एंड द वर्कफोर्स के सदस्य हैं. सांसद बनने के बाद से ही वे मानवाधिकार से जुड़े मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखते रहे हैं.

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Anant Narayan Shukla

लेखक के बारे में

By Anant Narayan Shukla

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट. करियर की शुरुआत प्रभात खबर के लिए खेल पत्रकारिता से की और एक साल तक कवर किया. इतिहास, राजनीति और विज्ञान में गहरी रुचि ने इंटरनेशनल घटनाक्रम में दिलचस्पी जगाई. अब हर पल बदलते ग्लोबल जियोपोलिटिक्स की खबरों के लिए प्रभात खबर के लिए अपनी सेवाएं दे रहे हैं.

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