7.1 C
Ranchi

लेटेस्ट वीडियो

ग्रीनलैंड की चाहत में किसी भी हद तक जा सकते हैं ट्रंप? इन 5 ऑप्शंस से उड़ी है डेनमार्क की नींद 

How US could seek to gain control over Greenland: अमेरिका ग्रीनलैंड को हासिल करने के लिए कई विकल्पों पर विचार कर सकता है. पहले बातचीत और खरीद का प्रस्ताव दिया गया, लेकिन डेनमार्क ने इसे खारिज कर दिया. इसके बाद सैन्य कार्रवाई की आशंका जताई गई, जिस पर डेनमार्क और यूरोप ने कड़ा विरोध किया. अब आर्थिक लालच और ग्रीनलैंड के नागरिकों को धन देने की बात सामने आई है. एक अन्य विकल्प ग्रीनलैंड की स्वतंत्रता के बाद अमेरिका के साथ “कॉम्पैक्ट ऑफ फ्री एसोसिएशन” जैसा समझौता हो सकता है, जिससे उसे रणनीतिक और सैन्य पहुंच मिले. इसके साथ ही वह जनमत संग्रह जैसा विकल्प भी आजमा सकता है.

How US could seek to gain control over Greenland: वेनेजुएला में सैन्य कार्रवाई करने वाले अमेरिका ने अब ग्रीनलैंड को लेने के लिए अपने इरादे पूरी तरह साफ कर दिए हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ग्रीनलैंड पर “कब्जा” करने को लेकर कई तरह के बयान दे चुके हैं. उनके साथ उनका प्रशासनिक तंत्र भी उसी भाषा में जवाब दे रहा है. इन टिप्पणियों के बाद डेनमार्क और ग्रीनलैंड के वॉशिंगटन स्थित प्रतिनिधियों ने अमेरिकी सत्ता तंत्र के साथ संपर्क तेज कर दिया है. ग्रीनलैंड, डेनमार्क का एक स्वायत्त क्षेत्र है. यह भौगोलिक रूप से आर्कटिक क्षेत्र में स्थित है और इसी वजह से अमेरिका की नजर में इसका विशेष महत्व रहा है. वह इसे सुरक्षा के लिहाज से जरूरी बता रहा है. ऐसे में अगर ट्रंप इसे लेना चाहें, तो उनके पास कौन-कौन से विकल्प हैं?

बातचीत से नहीं सुलझा मामला

आर्कटिक सर्कल के ऊपर स्थित विशाल ग्रीनलैंड का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा बर्फ से ढका है. इसकी आबादी करीब 57,000 मानी जाती है, इनमें अधिकांश लोग इनुइट समुदाय से आते हैं. इस 21 लाख 66 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले देश को लेने के लिए अमेरिका ने पहले बातचीत का विकल्प दिया. लेकिन इसे कहीं से भी खास तवज्जो नहीं दी गई. ऐसे में इस विकल्प पर बात नहीं बनी. ट्रंप ने सबसे पहले 2019 में इस द्वीप को खरीदने की योजना बनाई थी, लेकिन डेनमार्क ने इसे बकवास करार दिया. ट्रंप ने गुस्से में आकर डेनमार्क की यात्रा ही रद्द कर दी. अब 2026 में एकबार फिर उन्होंने ग्रीनलैंड लेने वाला कार्ड चल दिया है. 

सैन्य कार्रवाई का डर दिखाया

ट्रंप प्रशासन की ओर से फिर सैन्य कार्रवाई का शिगूफा छोड़ा गया. ग्रीनलैंड में डेनमार्क की सेना तैनात है. आर्कटिक जॉइंट फोर्स में कुल सैनिकों की संख्या मात्र 300 है, ऐसे में अमेरिका की एक बटालियन (800-900) ही काफी होंगे. यानी वेनेजुएला में किया गया ऑपरेशन, अगर ग्रीनलैंड में दोहरा दिया जाए, तो इस बार पूरे देश को कब्जाने के लिए काफी होगा. हालांकि ट्रंप प्रशासन की इस टिप्पणी और एडवेंचर पर डेनमार्क ने तो तीखी प्रतिक्रिया दी ही, यूरोप ने भी अपने पड़ोसी देश का ही साथ दिया. डेनमार्क ने 1952 के कानून की याद दिलाई कि अगर कोई भी आक्रामक शक्ति यहां दिखी तो तैनात सैनिक पहले गोली मारेंग और प्रश्न बाद में पूछेंगे. इससे पहले डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने हमले की स्थिति में NATO के अंत वाली चेतावनी भी दी थी. 

कैश लो और देश दो

डोनाल्ड ट्रंप आसानी से हार मानने वाले इंसान तो बिल्कुल नहीं लगते. इन दोनों पर बात नहीं बनी, तो प्रशासन की ओर से पैसे का लालच दिया गया. रॉयटर्स की एक खबर के मुताबिक व्हाइट हाउस ग्रीनलैंड के प्रत्येक नागिरक को 1 लाख डॉलर देने की योजना बना रहा है. इसके बदले ग्रीनलैंड में अमेरिका का कब्जा हो जाए. गुरुवार को प्रकाशित न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा था कि वह उस पुराने समझौते तक सीमित नहीं रहना चाहते, जिसके तहत अमेरिका को ग्रीनलैंड में सैन्य ठिकानों के इस्तेमाल की अनुमति मिलती है, बल्कि पूरे द्वीप का स्वामित्व चाहते हैं. उन्होंने तर्क दिया कि मालिकाना हक़ से वह फायदे मिलते हैं, जो किसी पट्टे या संधि से संभव नहीं हैं. गौरतलब है कि अमेरिका 1951 की एक संधि का हिस्सा है, जिसके तहत डेनमार्क और ग्रीनलैंड की सहमति से उसे वहां सैन्य अड्डे स्थापित करने के व्यापक अधिकार प्राप्त हैं.

ये विकल्प तो ऐसे हैं, जिन पर कुछ प्रगति हो चुकी है, इनके अलावा भी कुछ ऑप्शंस हैं, जिन पर अमेरिका काम कर सकता है. 

ग्रीनलैंड की स्वतंत्रता और फिर कॉम्पैक्ट ऑफ फ्री एसोसिएशन

अमेरिका इस मुद्दे पर इतना आगे बढ़ गया है कि डेनमार्क-ग्रीनलैंड को अपने दूतों को बातचीत के लिए भेजना पड़ रहा है. खैर इसी चर्चा के बीच तहत एक विकल्प “कॉम्पैक्ट ऑफ फ्री एसोसिएशन” का भी है. ऐसा समझौता अमेरिका ने कुछ प्रशांत द्वीपीय देशों के साथ किया हुआ है. ऐसे समझौतों में आमतौर पर अमेरिका सुरक्षा और सेवाएं प्रदान करता है, बदले में उसे रणनीतिक और सैन्य पहुंच मिलती है. हालांकि, ऐतिहासिक रूप से ऐसे समझौते केवल स्वतंत्र देशों के साथ ही हुए हैं, यानी ग्रीनलैंड को पहले डेनमार्क से अलग होना पड़ेगा.

अर्थव्यवस्था की बिगड़ती हालत और फिर जनमत

सैद्धांतिक रूप से वित्तीय प्रलोभनों का इस्तेमाल ग्रीनलैंड के लोगों को स्वतंत्रता के समर्थन में जनमत संग्रह के लिए प्रेरित करने या स्वतंत्रता के बाद ऐसे किसी समझौते के पक्ष में माहौल बनाने के लिए किया जा सकता है. सर्वेक्षण लगातार दिखाते हैं कि डेनमार्क से eventual (आखिरकार) स्वतंत्रता के पक्ष में समर्थन मजबूत है, लेकिन आर्थिक चिंताओं के चलते अब तक सांसद जनमत संग्रह कराने से बचते रहे हैं. सर्वे यह भी बताते हैं कि अधिकतर ग्रीनलैंडवासी अमेरिका का हिस्सा बनना नहीं चाहते, भले ही वे ज्यादा स्वायत्तता के पक्ष में हों.

देशों के बीच चल रही बातचीत

डेनमार्क के राजदूत जेस्पर मोलर सोरेन्सन और वॉशिंगटन में ग्रीनलैंड के शीर्ष प्रतिनिधि जैकब इस्बोसेथसेन ने गुरुवार को व्हाइट हाउस की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के अधिकारियों से मुलाकात की. डेनिश सरकार के अधिकारियों ने गोपनीयता की शर्त पर बताया कि इस बैठक में ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड को, संभवतः सैन्य ताकत के इस्तेमाल से, अपने नियंत्रण में लेने के नए संकेतों पर चर्चा हुई. हालांकि, व्हाइट हाउस ने इस मुलाकात को लेकर पूछे गए सवालों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी.

रुबियो ने होले से रखा हाथ, वेंस ने जोर से दबाया

इसके साथ ही, दोनों दूत इस सप्ताह अमेरिकी सांसदों से भी कई दौर की बातचीत कर चुके हैं. इन बैठकों का मकसद ट्रंप पर दबाव बनाने के लिए समर्थन जुटाना है, ताकि वह अपने रुख पर पुनर्विचार करें. इस बीच, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के अगले सप्ताह डेनमार्क के अधिकारियों से मुलाकात करने की संभावना जताई जा रही है. डेनमार्क के अधिकारी विदेश मंत्री रुबियो के साथ होने वाली बातचीत को सकारात्मक मान रहे हैं. डेनमार्क के रक्षा मंत्री ट्रोल्स लुंड पॉल्सन ने कहा कि यही वह संवाद है जिसकी जरूरत है और जिसे डेनिश सरकार ने ग्रीनलैंड सरकार के साथ मिलकर आगे बढ़ाया है.

वहीं इस मुद्दे पर उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी यूरोपीय नेताओं को ट्रंप के बयानों को गंभीरता से लेने की सलाह दी. उन्होंने इसे सुरक्षा से जुड़ा मामला बताते हुए कहा कि अगर यूरोप ग्रीनलैंड की सुरक्षा को पर्याप्त महत्व नहीं देता, तो अमेरिका को हस्तक्षेप करना पड़ सकता है.

ये भी पढ़ें:-

रजा पहलवी कौन हैं? 13 साल की उम्र में पायलट बनने वाला प्रिंस, जिसके कहने पर ईरान में विद्रोह, हिला ‘मुल्ला शासन’

57 हजारी की आबादी में सबको 1 लाख डॉलर… ग्रीनलैंड लेने के लिए ट्रंप का प्लान; अमेरिका लगाएगा दाम 

मैंने मीटिंग सेट की, लेकिन मोदी ने… IND-US ट्रेड डील क्यों नहीं हो रही? अमेरिकी कॉमर्स मंत्री ने बताया कारण

Anant Narayan Shukla
Anant Narayan Shukla
इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट. करियर की शुरुआत प्रभात खबर के लिए खेल पत्रकारिता से की और एक साल तक कवर किया. इतिहास, राजनीति और विज्ञान में गहरी रुचि ने इंटरनेशनल घटनाक्रम में दिलचस्पी जगाई. अब हर पल बदलते ग्लोबल जियोपोलिटिक्स की खबरों के लिए प्रभात खबर के लिए अपनी सेवाएं दे रहे हैं.

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

संबंधित ख़बरें

Trending News

जरूर पढ़ें

वायरल खबरें

ऐप पर पढें
होम आप का शहर
News Snap News Reel