सुरक्षा परिषद ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के अधिकार को नजरंदाज किया : भारत

Published at :20 Mar 2015 5:43 PM (IST)
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सुरक्षा परिषद ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के अधिकार को नजरंदाज किया : भारत

संयुक्त राष्ट्र : भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के अधिकार को नजरंदाज करने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आलोचना करते हुए कहा है कि इस 15 सदस्यीय संस्था को अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को उत्पन्न खतरों के संबंध में अपनी क्षमता को बार-बार परिभाषित करने की कोशिश पर रोक लगानी चाहिए. संयुक्त राष्ट्र […]

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संयुक्त राष्ट्र : भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के अधिकार को नजरंदाज करने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आलोचना करते हुए कहा है कि इस 15 सदस्यीय संस्था को अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को उत्पन्न खतरों के संबंध में अपनी क्षमता को बार-बार परिभाषित करने की कोशिश पर रोक लगानी चाहिए.
संयुक्त राष्ट्र में भारतीय मिशन में प्रथम सचिव देवेश उत्तम ने कहा, पिछले कुछ साल से कई बार देखा गया है कि महासभा के विशेषाधिकार और शक्तियों को सुरक्षा परिषद ने नजरंदाज किया. महासभा की भूमिका और अधिकार पर कल तदर्थ कार्यकारी समूह की एक बैठक में उन्होंने कहा, परिषद को अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को खतरे के संबंध में व्यापक और अनुमोदक व्याख्याओं के जरिए अपनी क्षमता को परिभाषित करने के बार-बार के प्रयास पर रोक लगानी चाहिए.
इसके अलावा ऐसे मुद्दों पर भी जिनके बारे में स्पष्ट है कि वह महासभा या आर्थिक और सामाजिक परिषद के दायरे में आते हैं. उत्तम ने कहा कि भारत का मानना है कि 193 सदस्यीय महासभा में फिर से केवल तब जान फूंकी जा सकती है, जब संयुक्त राष्ट्र की मुख्य विचारात्मक, निर्णायक और प्रतिनिधि इकाई के तौर पर इसका पूरा सम्मान हो और यह समकालीन हकीकत से कदमताल करता हो.
उत्तम ने कहा, महासभा को वैश्विक एजेंडा तय करने में अगुवाई करनी चाहिए और अंतर-देशीय मुद्दों के समाधान को लेकर बहुआयामी रवैया निर्धारित करने में संयुक्त राष्ट्र की सर्वोच्चता बहाल करनी चाहिए.
उन्होंने कहा, खासकर, विकास संबंधी मामलों में संयुक्त राष्ट्र की सर्वोच्चता बहाल होनी चाहिए. उन्होंने संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र के हिसाब से महासभा और सुरक्षा परिषद के बीच संबंधित अधिकार को लेकर सम्मानजनक संबंध स्थापित करने की जरुरत पर भी बल दिया.
उत्तम ने कहा, महासभा मात्र अधिकार प्रदान करने वाले प्रावधानों से मजबूत नहीं होगी. सबसे महत्वपूर्ण यह है कि ठोस उपाय करने के लिए महासभा की भूमिका और उसके प्राधिकार को फिर से बहाल करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखानी होगी.
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