क्यों चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की यादों में बस गया है भारत?

Published at :04 Feb 2015 3:10 PM (IST)
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क्यों चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की यादों में बस गया है भारत?

विष्णुगुप्त चीन के राष्ट्रपति आमतौर पर अपने देश में आने वाले दूसरे देश के विदेश मंत्रियों से रणनीति वार्ताएं नहीं करते. सामान्यत: विदेश मंत्रियों की वार्ता व बैठकें उनके चीनी समकक्ष के साथ होती है. लेकिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने प्रोटोकॉल तोड़ कर भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से पूरी गर्मजोशी से […]

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विष्णुगुप्त

चीन के राष्ट्रपति आमतौर पर अपने देश में आने वाले दूसरे देश के विदेश मंत्रियों से रणनीति वार्ताएं नहीं करते. सामान्यत: विदेश मंत्रियों की वार्ता व बैठकें उनके चीनी समकक्ष के साथ होती है. लेकिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने प्रोटोकॉल तोड़ कर भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से पूरी गर्मजोशी से मुलाकात की. इस मुलाकात में चीनी राष्ट्रपति ने कहा कि पिछले साल सितंबर में उनका भारत दौरा उनकी यादों में बस है, उन्होंने अपने भारत दौरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह राज्य गुजरात में गुजारे पल को खास तौर पर याद किया और सुषमा से कहा कि आप अपने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मेरी शुभकामनाएं कहेंगे. सुषमा ने भी पूरी गर्मजोशी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से उन्हें चीनी नववर्ष की शुभकामनाएं दी.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन को भेजे अपने वीडियो संदेश में दोनों देशों के बीच हजारों साल के अटूट रिश्तों का हवाला दिया. इससे पहले भी चीन को शांति का संदेश देने के लिए मोदी जिनपिंग को अहमदाबाद में गांधी जी के साबरमती आश्रम का भ्रमण करा चुके हैं. चीन और भारत के बीच शांति, हजारों साल के संबंधों, सांस्कृतिक साङोदारी और एक-दूसरे की संस्कृति और सद्भाव के आधार पर कूटनीति शुरू हुई है, जो सराहनीय है. एक औसत भारतीय मानस 1962 के चीनी हमले के कारण हमेशा चीन केप्रति शंकालु ही रहता है. चीन अब भी भारतीय जनमानस के दिलों में रूस, जापान या अमेरिका की तरह गहरे नहीं उतर पाता.
नरेंद्र मोदी की दिल का रिश्ता वाली विदेश नीति
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पड़ोसी देशों के साथ आपसी संबंधों को एक नया आयाम देने की कोशिश की है, जो चीन के लिए चिंता की बड़ी वजह है. चीन न सिर्फ पाकिस्तान जैसे भारत के चीर ईष्यालु पड़ोसी को लुभाने की कोशिश में लगा रहा है, बल्कि नेपाल, म्यांमार, श्रीलंका व बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों में भी वह अपनी सक्रियता बढ़ाता रहा है. खास कर आधारभूत संरचना के निर्माण में उसने नेपाल व श्रीलंका जैसे देशों में बड़ा हस्तक्षेप किया. श्रीलंका में सत्ता परिवर्तन हो चुका है और वहां चीन की तरफ झुकाव रखने वाली सरकार की जगह मैत्रिपाला सिरीसेना के नेतृत्व में भारत की ओर झुकाव रखने वाली सरकार बन चुकी है. इसी तरह पिछले साल सार्क सम्मेलन में नेपाल के प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला ने प्रोटोकॉल तोड़ कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वागत कर यह संकेत दे दिया कि उनके मन में क्या है? पड़ोसी देशियों की बदली मन:स्थिति भी चीन के लिए चिंता का विषय है. ऐसे में चीन भी भारत के साथ मन का रिश्ता जोड़ने की कवायद कर रहा है. संभावना है कि चीनी राष्ट्रपति शी प्रधानमंत्री मोदी को अपने पैतृक प्रांत शंघाई तथा ऐतिहासिक शहर चियान ले जायेंगे, जिसके भारत के साथ प्राचीन बौद्ध संबंध हैं.
सुषमा का चीन दौरा
विदेश मंत्री सुषमा का चीन दौरा काफी कामयाब माना जाता है. चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने उनका गेट्र पिपुल हॉल में स्वागत किया. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से शी ने कहा, ‘‘ मेरा चीन भारत संबंधों में पूर्ण भरोसा है और मेरा मानना है कि इस नए साल में इन द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने में नयी प्रगति हासिल होगी.’’ सुषमा ने वहां रूस, भारत और चीन (रिक) की बैठक में भाग लिया, जिसमें तीनों देशों ने साझा तौर पर आतंकवाद से लड़ने पर व्यापक सहमति बनी. सुषमा ने अपने चीनी समकक्ष वांग यी के साथ अहम मुद्दों पर चर्चा के साथ यह स्पष्ट कर दिया कि सीमा पर शांति और समरसता जरूरी है. उन्होंने चीन के 2000 किमी लंबे सीमा विवाद को खारिज करते हुए इसे 4000 किमी लंबा बताया और कहा वे प्रधानमंत्री के दौरे से पूर्व इसके लिए जमीन तैयार करने आयी हैं. इस दौरान रूस और चीन संयुक्त राष्ट्र में भारत की बड़ी भूमिका की आकांक्षाओं का समर्थन तो किया ही, इसके साथ ही 21 सदस्यीय एशिया प्रशांत आर्थिक सहयोग (एपेक) और शंघाई सहयोग संगठन में भी उसे शामिल करने का समर्थन किया. सुषमा के इस दौरे के बाद भारत और चीन सीमा विवाद को सुलझाने के लिए 18वें दौर की वार्ता करेंगे. राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल दिल्ली में होने वाली इस वार्ता में भारतीय प्रतिनिधिमंडल की अगुवाई करेंगी.
चीनी मीडिया व विद्वानों की अपनी सरकार को नसीहत
यूं तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मई में चीन के दौरे पर जायेंगे. लेकिन, उनकी प्रस्तावित चीन यात्र इससे पहले ही वहां की मीडिया की सुर्खियां बन गयी है. चीनी मीडिया को उभरते भारत का अहसास है, इसलिए उसने अपनी सरकार को आगाह किया है कि दक्षिण एशिया में भारत के प्रभाव को देखते हुए उसकी शंकाओं का निवारण करें. बीजिंग विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर चेन फेंग्जुन ने चीन के वृहत सिल्क रोड और मरीटाइम सिल्क रोड परियोजनाओं पर भारत की चिंताओं के संदर्भ में कहा, ‘‘भारत को अभी भी चीन की ‘वन बेल्ट, वन रोड’ वाली पहल को लेकर चिंताएं हैं.’’ मालूम हो इन परियोजनाओं के लिए राष्ट्रपति शी ने 40 अरब डॉलर का आवंटन किया है. चेन ने कहा, ‘‘दक्षिण एशिया में खासतौर पर श्रीलंका और बांग्लादेश जैसे देशों में भारत के व्यापक प्रभाव को देखते हुए चीन के लिए यह समझदारी होगी कि वह मोदी की यात्र के दौरान इन संशयों का निवारण करे और भारत को दर्शाए कि यह पहल वास्तव में दोनों के लाभ के लिए है.’’ शंघाई एकेडमी ऑफ सोशल साइंसेज के अंतरराष्ट्रीय संबंधों के एक शोधार्थी ने लिखा कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्र से आपसी विश्वास में गहराई आ सकती है. इस दौरे में निवेश के अवसर ढूंढने के साथ सीमा से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा होगी. वहां के एक रिसर्च स्कॉलर वांग देहुआ ने लिखा कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी कूटनीतिक शैली के कारण दुनिया की सभी बड़ी ताकतों के साथ संबंध बनाना चाहते हैं और यह धारणा कि वे अमेरिका की ओर झुक रहे हैं सही नहीं है. वहीं, सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ ने कहा है कि भारत का कूटनीतिक संतुलन वैश्विक शांति के अनुकूल है.
भारत-अमेरिका और जापान के रिश्ते
चीन की चिंता भारत-अमेरिका-जापान की आपसी निकटता से भी जुड़ी है. उसे लगता है कि ये तीनों राष्ट्र वैश्विक स्तर पर एक मजबूत तिकड़ी बना सकते हैं. चीन और जापान का वैमनस्य जगजाहिर है. जापान चीन की दुखती रग को दबाने के लिए भारत के साथ हर स्तर पर सहयोग करने को तैयार है. कुछ माह पूर्व जब अरुणाचल प्रदेश में चीन सीमा पर भारत सरकार के सड़क बनाने की महत्वाकांक्षी परियोजना को जापान ने सहयोग का वादा किया, तब इस पर चीन की ओर से तीखी प्रतिक्रिया आयी और उसने कहा कि भारत जापान के झांसे में नहीं आयेगा. अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के भारत दौरे को लेकर भी चीन और पाकिस्तान की चिंताएं उभर कर सामने आयीं. ओबामा ने स्वदेश वापसी के बाद सीएनएन को दिये अपने इंटरव्यू में भी साफ किया कि भारत से उसकी निकटता का कारण उसका लोकतंत्र होना है. ओबामा के इस बयान के दूसरे पक्ष को आप इस रूप में समक्ष सकते हैं कि चीन एक लोकतांत्रिक नहीं, कम्युनिस्ट राष्ट्र है. हालांकि भारत के साथ-साथ ओबामा ने भी यह साफ कर दिया कि इन दोनों के बेहतर आपसी रिश्ते चीन के खिलाफ गंठजोड़ नहीं है.
चीन की सुस्त होती अर्थव्यवस्था
1978 की तुलना में 2012 में चीन की अर्थव्यवस्था 142 गुणा बड़ी हो गयी. वह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गयी. पर, अब उसकी आर्थिक रफ्तार में एक थकान है. 2007-08 के बाद उसकी विकास दर में गिरावट देखने को मिल रही है. जनवरी के दूसरे पखवाड़े में उसका शेयर बाजार ऐतिहासिक रूप से 26 साल में सबसे ज्यादा गिरा. 2014 में चीन के जीडीपी की विकास दर 24 साल में सबसे कम 7.5 प्रतिशत पर पहुंच गयी है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रकोष ने 2015 के इसकी अनुमानित विकास दर में कटौती कर इसे 6.8 प्रतिशत पर कर दिया है. जनवरी में कमजोर मांग के कारण उसके विनिर्माण सेक्टर में गिरावट देखी गयी. वैश्विक बाजार की गिरावट व अपस्फीति बहुत हद तक चीन के विनिर्माण सेक्टर पर निर्भर कर गयी है. चीन के लिए अपनी अर्थव्यवस्था की यह सुस्त चाल चिंता की वजह है. उसे अपने विनिर्माण सेक्टर को बढ़ावा देने के लिए व्यापक व्यापार साझीदार की जरूरत है. ऐसे में वह भारत सहित दुनिया के हर प्रमुख अर्थव्यवस्था और बड़े बाजार से बेहतर संबंध चाहेगा. शायद बदलती दुनिया में इन्हीं अहम कारणों व परिस्थितियों से चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के दिल में उनका भारत दौरा बस गया है, ताकि उसके राष्ट्रपति अपनी रणनीतिक महत्वाकांक्षा साधने के लिए भले पाकिस्तान की सैनिक परेड में शामिल हो कर उसे तुष्ट करें, लेकिन अपने पड़ोस के एक गंभीर, बड़ी अर्थव्यवस्था व सबसे बड़े व सबसे मजबूत लोकतंत्र के साथ कदम से कदम मिला कर 21वीं सदी में अपने कदम बढ़ा सके.
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