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पुण्यतिथि पर विशेष : निर्मल महताे में नेतृत्व का था अदभुत गुण

By Prabhat Khabar Print Desk
Updated Date
निर्मल महताे में नेतृत्व का था अदभुत गुण
निर्मल महताे में नेतृत्व का था अदभुत गुण
प्रभात खबर

अनुज कुमार सिन्हा

निर्मल महताे झारखंड आंदाेलन का एक बड़ा नाम. एक ऐसा नाम जिसकी शहादत ने झारखंड काे ऐसा झकझाेरा, जिससे अलग झारखंड राज्य का मार्ग प्रशस्त हाे गया. जीवनकाल सिर्फ 37 साल का रहा. नेतृत्व का अदभुत गुण उनमें था. सिर्फ चार साल में वे झामुमाे के कार्यकर्ता से पार्टी के अध्यक्ष बन गये. उनके गुण काे शिबू साेरेन ने बहुत पहले (गुवा गाेलीकांड के ठीक बाद) पहचान लिया था. 1984 में जब हालात ऐेसे बने कि झामुमाे काे नया अध्यक्ष (विनाेद बिहारी महताे की जगह) तलाशना पड़ा ताे शिबू साेरेन स्वयं अध्यक्ष नहीं बन कर निर्मल महताे काे बना दिया.

8 अगस्त, 1987 काे जमशेदपुर में उनकी हत्या कर दी गयी लेकिन तब तक उन्हाेंने झामुमाे काे एक ताकतवर संगठन बना दिया था. 1986 में आजसू का गठन उन्हीं का सपना-विजन था. इसी आजसू ने झारखंड के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की. राजनीति से हट कर भी उनकी पहचान थी, सामाजिक कामाें की वजह से. उनमें नेतृत्व आैर सहयाेग करने का अदभुत गुण था. दिलेर थे. न ताे चाय पीते थे आैर न शराब-सिगरेट. नशा से दूर. शराब के खिलाफ खुद अभियान चलाते थे. अवैध शराब बनानेवालाें आैर इसका धंधा करनेवालाें काे उत्पाद विभाग के साथ मिल कर खुद पकड़वाते थे. उनकी दिलेरी-सहयाेग की अनेक घटनाएं चर्चित हैं.

अस्सी के दशक में जमशेदपुर में सूदखाेराें का आतंक था. टिस्काे के सफाईकर्मियाें काे ये सूदखाेर-पठान फंसाते थे आैर वेतन मिलने के दिन उनका पैसा छीन लेते थे. जानकारी मिलने पर निर्मल महताे अपनी टीम के साथ जा कर हाकी स्टिक से सूदखाेराें की पिटाई करते थे. उनकी टीम में तब हाड़ू महताे, घंसू महताे, रंजीत चटर्जी, विपुल मुखर्जी, आस्तिक, बाबूलाल साेय, अखिलेश्वर आैर निर्मल भट्टाचार्य जैसे युवा साथी हुआ करते थे.

जमशेदपुर में ब्राह्मण परिवार में एक लड़की की शादी हाे रही थी. बारात बंगाल से आयी थी. ऐन माैके पर लड़केवालाें ने साेने की चेन की मांग रख दी. नहीं मिलने पर शादी नहीं करने की धमकी दी. निर्मल महताे काे खबर मिली, वे पहुंचे. लड़की के पिता काे कहा-आप हां कह दीजिए. शादी नहीं रुकेगी. चेन मैं दूंगा. उन्हाेंने अपने गले से साेने की चेन निकाली (वे हमेशा साेने की चेन पहनते थे, जिसे उनकी मां ने उन्हें दिया था) आैर लड़केवालाें काे दे दिया. इसके बाद शादी हाे गयी. निर्मल महताे रात भर वहीं बैठे रहे. जब बारात विदा हाे गयी, तब गये. ऐसे थे निर्मल महताे.

अक्तूबर 1982 में तिरूलडीह में पुलिस फायरिंग में अजय महताे, धनंजय महताे नामक छात्र मारे गये थे. पाेस्टमार्टम जमशेदपुर में हुआ था. पुलिस का आतंक इतना था कि गांव खाली हाे गया था. काेई शवाें काे लेकर इन छात्राें के गांव नहीं जाना चाहता था. शव एमजीएम में पड़ा था. इसकी जानकारी निर्मल महताे काे मिली. उन्हाेंने साथियाें काे बुलाया आैर कहा कि पुलिस का डर मन से निकाल दाे. हम शव लेकर खुद जायेंगे. उन्हाेंने ट्रक मंगाया आैर दाेनाें छात्राें के शवाें काे खुद लेकर उनके गांव गये.

इतना ही नहीं, एक छात्र का अंतिम संस्कार खुद किया. इसके बाद से ही ईचागढ़ इलाके में लाेग उन्हें मसीहा के ताैर पर देखने लगे. गरीब मरीज काे गांव से उठा कर एमजीएम लाना आैर उनका इलाज करना आम बात थी. निर्मल महताे के ये खास गुण थे. ऐसे निर्मल महताे की जब हत्या हुई ताे राे पड़ा था पूरा झारखंड.

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