इनोवेशन में भारत की दस्तक : छोटी सी चिप करेगी बीमारियों की पहचान
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :07 Sep 2016 7:02 AM (IST)
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इनोवेशन में भारत की दस्तक – 6 : डायग्नोस्टिक-ऑन-अ-चिप तकनीक में धनंजय डेंडुकुरी ने पाया मुकाम ‘इनोवेशन में भारत की दस्तक’ शृंखला की छठी कड़ी में आज पढ़ें डायग्नोसटिक चिप के बारे में, जिसे धनंजय डेंडुकुरी ने तैयार किया है. यह चिप केवल कुछ मिनटों में कई सारी बीमारियों के टेस्ट कर देती है. आइआइटी […]
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इनोवेशन में भारत की दस्तक – 6 : डायग्नोस्टिक-ऑन-अ-चिप तकनीक में धनंजय डेंडुकुरी ने पाया मुकाम
‘इनोवेशन में भारत की दस्तक’ शृंखला की छठी कड़ी में आज पढ़ें डायग्नोसटिक चिप के बारे में, जिसे धनंजय डेंडुकुरी ने तैयार किया है. यह चिप केवल कुछ मिनटों में कई सारी बीमारियों के टेस्ट कर देती है. आइआइटी मद्रास से स्नातक और एमआइटी से पीएचडी कर चुके धनंजय की कंपनी अचिरा लैब्स में बने इस माइक्रोफ्लूइडिक प्रोडक्ट का नाम एसिक्स 100 है, जो थायरॉइड की गड़बड़ियों, डायबिटीज, फर्टिलिटी के अलावा कई तरह की संक्रामक बीमारियों के लक्षणों का तुरंत पता लगा सकता है. इस किफायती डायग्नोसिस ने प्रयोगशाला में भी अच्छे नतीजे हासिल किये हैं.
आइआइटी मद्रास में केमिकल इंजीनियरिंग के छात्र रहे धनंजय डेंडुकुरी को हमेशा से लगता था कि शरीर में बीमारियों की पहचान करने के लिए ढेर सारे टेस्ट करने के बजाय कोई ऐसा आसान तरीका हो, जिससे सारे टेस्ट एक साथ हो जाये, ताकि उसमें बहुत ज्यादा समय भी न लगे और सबसे जरूरी बात कि वह बहुत सस्ता हो. अगर ऐसी कोई टेक्नोलॉजी अस्तित्व में आती, तो हमारे देश के लाखों जरूरतमंद लोगों के लिए उपयोगी होती. लेकिन यह समस्या जीव विज्ञान के दायरे में आती थी और यह विषय धनंजय को बिल्कुल पसंद नहीं था.
लेकिन जब वह आइआइटी मद्रास से केमिकल इंजीनियरिंग में स्नातक की डिग्री लेने के बाद पीएचडी करने के लिए अमेरिका के मेसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआइटी) गये, तो वहां के नियम के अनुसार हर छात्र की तरह धनंजय को भी जीवविज्ञान की बुनियादी कक्षाओं में शामिल होना पड़ा. इस दौरान उन्होंने जाना कि जीव विज्ञान रटने की चीज नहीं है. यह तो सच में जीवन का विज्ञान है.
दरअसल जीव विज्ञान में कोई परिकल्पना या विचार लाया जाता है, उसका परीक्षण, विश्लेषण किया जाता है और नयी चीज बनायी जाती है. जीव विज्ञान के बारे में यह एहसास होते ही डायग्नोस्टिक जांच विकसित करने का धनंजय का जुनून जाग गया. पर वे चाहते थे कि इस खास तकनीक का विकास भारत में हो. साथ ही, वे यह भी दिखाना चाहते थे कि भारत में भी विश्वस्तरीय तकनीक विकसित की जा सकती है.
खुद को भारत में सुविधाजनक स्थिति में पानेवाले धनंजय को यहां रहकर काम करना ज्यादा अच्छा लगता था. 2008 में एमआइटी में पीएचडी पूरी हुई तो कुछ समय एक संगठन के साथ डायग्नोस्टिक-ऑन-अ-चिप तकनीक पर काम किया. भारत लौटने के बाद उनके दिमाग में बस एक चीज चल रही थी-पूरी पैथालॉजिकल लैब को समेट कर क्रेडिट कार्ड के आकार की छोटी सी चिप पर लाना.
इसी मकसद से उन्होंने बेंगलुरु में अचिरा लैब्स की स्थापना की और कुछ युवा तकनीकी पेशेवरों को अपने अभियान से जोड़ा और काम पर लग गये.
धनंजय और उनकी टीम के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि जो भी उपकरण बने, उसकी लागत बहुत कम हो. नतीजे भी तत्काल मिल जायें. इसके साथ ही जांच की प्रक्रिया की लागत भी न्यूनतम हो, तभी यह ज्यादा से ज्यादा जरूरतमंदों तक पहुंचेगी.
मकसद था – शरीर से निकली खून की एक बूंद से दर्जनभर जांच हो जाये. और यह सब 20 मिनट के अंदर हो जाये.
इन सारे लक्ष्यों का समाधान उन्हें केमिकल इंजीनियरिंग में नजर आया. उन्होंने पीएचडी में माइक्रो फ्लूइडिक्स की पढ़ाई की थी. इसके तहत सूक्ष्म सिस्टम, यानी बाल जितनी पतली नलियों में द्रव के प्रभाव को नियंत्रित किया जाता है. लगातार रिसर्च के बाद धनंजय और उनकी टीम ने पहला प्रोटोटाइप बनाया. उनके काम के नतीजे आने लगे और पेटेंट मिलने लगे, तो उन्हें एमआइटी ने 35 वर्ष से कम उम्रवाले दुनिया के शीर्ष आविष्कारकों में चुना.
इस माइक्रो फ्लूइडिक चिप पर बारीक नलियां बनी हैं, जिनमें रिएजेंट यानी जांच करने वाले केमिकल हैं. लैब टेक्नीशियन को सिर्फ इतना करना है कि खून के नमूने को इन बारीक नलियों से गुजारे.
धनंजय की इस महत्वाकांक्षी योजना पर 20 करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश कर दिया है. इसमें उन्हें नारायणमूर्ति के कैटारमन वेंचर्स, बायोटेक्नोलॉजी इंडस्ट्री रिसर्च असिस्टेंस काउंसिल, इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च जैसे प्रतिष्ठित नामों ने धनंजय के काम पर भरोसा जताया और उस पर अपने संसाधनों का निवेश किया.
कैटारमन वेंचर्स के इनवेस्टमेंट डायरेक्टर अभिषेक लक्ष्मीनारायणन कहते हैं, धनंजय की टीम के बनाये चिप पर किये गये 10 टेस्ट्स के नतीजे तो 20 मिनट से भी कम समय में आ जाते हैं. और इसके लिए जरूरत थी केवल एक बूंद खून की. एक्युरेसी की बात करें तो यह एलीजा और अन्य ऑटोमैटिक एनालाइजर्स से किसी भी मामले में कम नहीं है. रही बात खर्च की, तो यह सामान्य खर्च के मुकाबले केवल 10वां हिस्सा है.
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