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नीतीश कुमार बिहार में एक ब्रांड बन चुके हैं

Updated at : 09 Jun 2015 7:38 AM (IST)
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नीतीश कुमार बिहार में एक ब्रांड बन चुके हैं

नीरजा चौधरी, राजनीतिक विश्‍लेषक बिहार विधानसभा चुनाव के लिए जदयू और राजद के बीच गंठबंधन का परिणामों पर असर पड़ना तय है. इन दोनों दलों के साथ आने से वहां भाजपा और इस गंठबंधन के बीच मुकाबला कांटे का होना तय है, लेकिन इस गंठबंधन की संभावना अधिक होगी, क्योंकि उन्होंने मुख्यमंत्री के तौर पर […]

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नीरजा चौधरी, राजनीतिक विश्‍लेषक

बिहार विधानसभा चुनाव के लिए जदयू और राजद के बीच गंठबंधन का परिणामों पर असर पड़ना तय है. इन दोनों दलों के साथ आने से वहां भाजपा और इस गंठबंधन के बीच मुकाबला कांटे का होना तय है, लेकिन इस गंठबंधन की संभावना अधिक होगी, क्योंकि उन्होंने मुख्यमंत्री के तौर पर एक चेहरा भी पेश कर दिया है. भाजपा के पास नीतीश के कद का कोई नेता नहीं है और चुनाव में पार्टी शायद ही किसी को मुख्यमंत्री के तौर पर पेश करे. आजकल चुनाव व्यक्ति केंद्रित होते जा रहे हैं और इसका फायदा भी पार्टियों को मिला है. इसके अलावा अन्य कारण भी हैं.

लोकसभा चुनाव के दौरान मोदी की लहर के बावजूद भाजपा-लोजपा और रालोसपा को कुल 38.8 फीसदी के आसपास वोट मिले थे. उस समय जदयू और कांग्रेस-राजद अलग चुनाव लड़े थे, लेकिन अगर तीनों दलों को मिले वोट को जोड़ दिया जाये तो यह 45 फीसदी से अधिक होता है. खास बात यह थी कि उस समय राजद और जदयू अलग-अलग चुनाव लड़े थे. विपक्षी वोट में बिखराव के कारण भाजपा को काफी फायदा हुआ था. अब राजद-जदयू- कांग्रेस के साथ आने से अल्पसंख्यक वोटों में बिखराव की संभावना काफी कम हो गयी है.

इसके अलावा राजद और जदयू के समर्थक वोट भी हैं. चुनाव के दौरान हवा बनने पर अन्य समूह भी जुड़ जाते हैं. भाजपा के लिए दिक्कत यह है कि 2014 जैसी हवा उसके पक्ष में नहीं है. नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाने का भी फायदा गंठबंधन को होगा. नीतीश कुमार बिहार में एक ब्रांड बन चुके हैं. गवर्नेस को उनका रिकॉर्ड काफी अच्छा है. पिछले 10 साल में उन्होंने बिहार के विकास के लिए काफी काम किया है. लेकिन, एक बात साफ है कि नीतीश और लालू की छवि एक दूसरे से बिल्कुल अलग है. उन्होंने जंगलराज को मुद्दा बना कर ही लालू को बिहार की सत्ता से बेदखल किया था. दोनों के हाथ मिलाने से कुछ वोटर गंठबंधन से छिटक सकता है. लेकिन, नीतीश की कार्यशैली और गवर्नेस का रिकॉर्ड इसकी भरपायी कर सकता है. बिहार चुनाव में जातिगत समीकरणों का काफी महत्व रहता है.

दोनों नेताओं का आधार वर्ग भी इस गंठबंधन को स्वीकार कर लेगा. कुर्मी समुदाय इस बात से खुश होगा कि लालू से हाथ मिलाने के बाद भी वे ही मुख्यमंत्री के दावेदार हैं और यादव समुदाय भी चाहता है कि सत्ता में उसकी भागीदारी बने. यही नहीं, गंठबंधन में लालू प्रसाद को अधिक सीटें मिलेंगी और सरकार बनने पर उनकी भी चलेगी. भाजपा इस गंठबंधन को चुनौती देने के लिए मांझी को साथ लेने की कोशिश करेगी, ताकि महादलित वोट पार्टी की झोली में आये. यदि राजद-जदयू जमीनी स्तर पर समन्वय के साथ काम करेंगे, तो इनकी वापसी की संभावना अधिक लगती है. सामाजिक आधार के मामले में भी यह गंठबंधन भाजपा पर भारी पड़ता दिख रहा है. पिछले साल 10 सीटों पर हुए उपचुनाव के नतीजों ने इसकी पुष्टि कर दी थी. लोकसभा चुनाव के दौरान भी बिहार के कई मतदाताओं को कहना था कि दिल्ली में मोदी को वोट दे रहे हैं, लेकिन बिहार के लिए नीतीश कुमार को देंगे.

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