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अन्न दाता और हम

Updated at : 25 Apr 2015 8:21 AM (IST)
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अन्न दाता और हम

हिमांशु शेखर दिल्ली के जंतर मंतर पर दिन दहाड़े सरेआम एक किसान द्वारा आत्महत्या करना सिर्फ एक घटना मात्र नहीं है.कृषि प्रधान देश में लोकतंत्र के मंदिर, संसद भवन से कुछ ही दूरी पर एक किसान द्वारा पेड़ पर गले में फंदा लगा कर आत्महत्या किये जाने के बाद टीवी चैनलों पर चल रही बहस […]

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हिमांशु शेखर
दिल्ली के जंतर मंतर पर दिन दहाड़े सरेआम एक किसान द्वारा आत्महत्या करना सिर्फ एक घटना मात्र नहीं है.कृषि प्रधान देश में लोकतंत्र के मंदिर, संसद भवन से कुछ ही दूरी पर एक किसान द्वारा पेड़ पर गले में फंदा लगा कर आत्महत्या किये जाने के बाद टीवी चैनलों पर चल रही बहस के बजाय हमें अपनी व्य्वस्था का अवलोकन करना चाहिए.
आजादी के छ: दशक बाद भी अगर लोकतांत्रिक देश में किसान अपनी जान दे रहे हैं और हम एक दूसरों पर आरोप प्रत्यारोप कर अपनी जिम्मेवारी का इतिश्री समझ रहे हैं, तो हम किसान गजेंद्र के बलिदान से सबक लेना नहीं चाह रहे.
किसी व्यक्ति, समाज या व्यवस्था में तब तक सुधार नहीं हो सकता, जब तक हम अपनी गलतियों पर आत्म चिंतन और मंथन नहीं करते. अन्नदाता अगर अपनी जान देने पर उतारू हो गए हैं, तो इसका मतलब है कि हमारी बुनियाद में ही कहीं न कहीं कमी रह गयी है. इन कमियों को दूर कर किसानों की दशा सुधारने एवं उन्हें यह विश्वास दिलाने की दिशा में ठोस कदम उठाना पड़ेगा कि किसान सिर्फ भगवान भरोसे नहीं बल्कि सरकार के भरोसे हैं. किसानों की आत्म हत्या का यह पहला मामला नहीं है लेकिन यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के गाल पर तमाचा है.
इस घटना में न सिर्फ एक किसान की जान गयी है बल्कि किसानों के प्रति व्यवस्था की सोच ने दम तोड़ा है. हमें सोच को नए सिरे से स्थापित करना होगा. किसानों को सिर्फ राजनीति का मुद्दा बनाने से उनका कल्याणनहीं होगा.
किसानों के कल्याण के लिए दलगत भावना से उठ कर एक सार्थक पहल करनी होगी. भूमिपुत्र व अन्नदाता किसान अगर खुद को इस देश में बेसहारा समझने लगे फिर हमें अपने सोच और व्यवस्था पर चिंतन कर सुधार लाने के लिए बिना समय गंवाये प्रयास शुरू करना चाहिए . इस मुद्दे पर राजनीति करने वालों से मेरा विनम्र आग्रह है कि बहुत देर हो चुकी है. अब और देर न करें. किसानों का विश्वास जीतने के लिए उनकी दशा सुधारें. किसी और किसान को गजेन्द्र जैसा कदम उठाने न दें.
किसानों की आत्महत्या जैसी खबर सभ्य समाज की संवेदनशीलता की परीक्षा लेने जैसा है. जो हमें अन्न देता है उसे अगर हम जीने की वजह न दे पा रहे हैं, फिर क्या हमें यह कहने का अधिकार है कि हमने आजादी के छ: दशक बाद प्रगति का वो मुकाम हासिल कर लिया है, जिस पर हम गर्वकर पायें.
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