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जयप्रकाश नारायण जयंती : खुद मृत्यु शय्या पर थे मगर फिक्रमंद थे नेपाल के लिए

Updated at : 11 Oct 2018 5:58 AM (IST)
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जयप्रकाश नारायण जयंती : खुद मृत्यु शय्या पर थे मगर फिक्रमंद थे नेपाल के लिए

रवींद्र भारती नेपाली अखबारों से खबर आयी कि वीपी कोइराला ने जेल में भूख हड़ताल समाप्त कर दी है. मगर इस बीच काठमांडू से उन्हें एक तार मिला, जिसमें लिखा था कि अखबारों की खबर झूठी है. उनकी भूख हड़ताल जारी है. जेपी ने 28 मई, 1949 की शाम वक्तव्य जारी किया, यह गहरे दु:ख […]

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रवींद्र भारती
नेपाली अखबारों से खबर आयी कि वीपी कोइराला ने जेल में भूख हड़ताल समाप्त कर दी है. मगर इस बीच काठमांडू से उन्हें एक तार मिला, जिसमें लिखा था कि अखबारों की खबर झूठी है. उनकी भूख हड़ताल जारी है.
जेपी ने 28 मई, 1949 की शाम वक्तव्य जारी किया, यह गहरे दु:ख का विषय है कि नेपाल की एक जेल में एक मई से भूख हड़ताल कर रहे वीपी कोइराला के बारे में प्रेस में भ्रांतियां फैलायी गयी. जब सवाल एक व्यक्ति के जीवन का हो, वहां सूचना देने के विषय में अधिक सावधानी बरती जानी चाहिए. मैं यह स्पष्ट कहने की स्थिति में हूं कि कल तक उन्होंने अपनी भूख हड़ताल समाप्त नहीं की थी. मैं सभी संबंधित लोगों से अपील करता हूं कि इन झूठी खबरों से गुमराह न हो और कोइराला का जीवन बचाने के लिए हर संभव कोशिश करें.
अखबारों में प्रकाशित नेपाली शार्शे डाफेर (उप राजदूत) का बयान झूठ का पुलिंदा है. नेपाल में निर्लज्ज निरंकुशता है और राणाओं की लोगों पर अपनी शैतानी पकड़ ढीली करने की कोई मंशा नहीं है. कोइराला ने स्वतंत्रता और लोकतंत्र के सर्वोच्च सिद्धांतों के लिए अपना जीवन दांव पर लगा दिया है. स्वाधीनता प्रेमी सभी लोगों का यह कर्तव्य है कि वे उनकी सहायता के लिए जो संभव हो करें.
इस अपील का राणा सरकार पर कुछ खास असर नहीं हुआ. कोइराला की स्थिति दिनों-दिन बिगड़ने लगी. नेपाली राष्ट्रीय कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को कुछ सूझ नहीं रहा था. कोइराला परिवार की आंखों से नींद गायब थी. सुशीलाजी को ढांढ़स बंध रहे थे रामहरख कि उन्हें कुछ नहीं होगा. चलिए जेपी के पास, कोई-न-कोई रास्ता निकलेगा. मुझे पता है कि वे वीपी को बचाने के लिए कुछ बचाकर नहीं रखेंगे.
दिल्ली नहीं, पटना चलिए. यह सुनकर सुशीलाजी के भीतर थोड़ी आस बंधी और वे रामहरख के साथ जेपी से मिलने उनके निवास चरखा समिति, कदमकुआं, पटना आ गयी. वहां मालूम हुआ कि जेपी को सड़क दुर्घटना में काफी चोट आयी है. कई जगह फ्रैक्चर है. अस्पताल में भर्ती हैं. सुशीला ने यह सुनकर अपना सिर पकड़ लिया. विपत्ति पर विपत्ति. अब क्या होगा?
वह भागी हुई उन्हें देखने अस्पताल गयी. जेपी ने उन्हें देखते हुए बैठने का इशारा किया. वह सोचने लगी कि ऐसी स्थिति में जब वे अस्पताल के बिस्तर पर हैं, ऐसे में अपनी बातों को कहना क्या खुदगर्जी नहीं होगी?
जेपी तो मृत्यु शैय्या पर है. क्या ऐसे ही समय में आदमी असमंजस में पड़ जाता है कि वह दिल की सुने कि दिमाग की. आदमी का विवेक चुप रहता है सिर्फ शरीर को अपनी बात बोलने देता है. सुशीला जी ने जेपी से कहा कि मैं नहीं शरीर बोल रहा है. क्षमा चाहती हूं.
आप अस्पताल में ऐसी स्थिति में है. आपका हालचाल न पूछ कर मैं अपनी गरज को लेकर आपके सामने उपस्थित हूं कि उन्हें बचा लीजिए. वे भूख हड़ताल पर हैं और मृत्यु के काफी करीब जा चुके है. जेल से मुक्ति होने पर ही उनके जीवन की रक्षा हो सकेगी.
जेपी यह सुनकर भावुक हो गये. उनकी आंखें भर आयी. कहा, समझता हूं और उन्होंने अपने सहायक से कहकर देश के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को फोन लगाने को कहा. फोन लगा जेपी ने मर्मान्तक तरीके से पंडित जी को वीपी कोइराला की स्थिति का वर्णन किया.
कहा कि वे राणा सरकार पर दबाव बनाएं नहीं तो हम कोइराला को खो देंगे. कहना न होगा कि पंडित जी ने तुरंत श्री 3 राणा सरकार से वीपी को लेकर गंभीर स्वर में बात की. परिणाम यह हुआ कि दूसरे दिन वीपी कोइराला जेल से रिहा कर दिये गये.
जब ज्योति बसु भी शामिल हुए थे जेपी के महाजुलूस में
डॉ सजल बसु
पांच जून, 1975 को जनसंघर्ष समिति के बैनर तले कोलकाता आयोजित महाजुलूस में जेपी शामिल हुए थे. दिलचस्प बात है कि इस जुलूस में अन्य नेताओं के साथ वामपंथी राजनेता ज्योति बसु भी शामिल हुए थे, जो उस वक्त नेता प्रतिपक्ष थे.
हालांकि बाद में आंदोलन में जनसंघ के शामिल होने के कारण वामपंथी पार्टियों ने जेपी आंदोलन से खुद को अलग कर लिया. आपातकाल की घोषणा के बाद मेरे सहित कई नेताओं को पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था. इमरजेंसी के दौरान पुलिस ने केवल एक ही वामपंथी नेता को गिरफ्तार किया था.
वह थे ज्योतिर्मय बसु. उन्हें जेपी के साथ संबंध रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. जेपी आंदोलन एक संपूर्ण आंदोलन था और पद, सत्ता, भ्रष्टाचार, जात-पात, भेद-भाव और छुआ छूत के खिलाफ था. आज सत्ता व विपक्ष में जेपी आंदोलन से निकले कई नेता राजनीति के शीर्ष पर हैं, लेकिन शायद ही कोई जेपी के आदर्शों का अनुसरण कर रहा है.
जेपी आंदोलनकारी, लेखक, कोलकाता
संपूर्ण क्रांति से ही ऊर्जा लेते रहे हैं बाद के तमाम आंदोलन
डॉ उमाशंकर पांडेय
सन 1971 में समाज को एक ऐसे प्लेटफार्म की तलाश थी, जो जन मुद्दों व जन आकांक्षाओं को नेतृत्व दे सके. उसी समय जेपी ने संपूर्ण क्रांति का आह्वान कर जनहित के मुद्दों पर देश की जनता को एकजुट किया था. भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे का आंदोलन हो या दिल्ली की सड़कों पर किसान आंदोलन या फिर अन्य कोई सामाजिक या सुधारवादी आंदोलन हो या फिर युवाओं का आंदोलन हो, उनकी रूह जेपी आंदोलन में ही छिपी हुई है.
आंदोलन के स्वरूप, स्थान, समय और परिपेक्ष्य अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन आत्मा जेपी के संपूर्ण क्रांति में ही छिपी है, जिसमें लोगों ने जेपी के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठायी थी और जात-पात, तिलक, दहेज और भेद-भाव छोड़ने का संकल्प लेते हुए अपने जनेऊ तोड़ दिये थे और नारा दिया था : जात-पात तोड़ दो, तिलक-दहेज छोड़ दो/ समाज के प्रवाह को नयी दिशा में मोड़ दो.
विभागाध्यक्ष, पत्रकारिता व जनसंचार विभाग, सुरेंद्रनाथ कॉलेज फॉर वूमेंस, कोलकाता
राजनीति का ताना-बाना ही बदल दिया जेपी आंदोलन ने
अरविंद अंजुम
74 के आंदोलन में कई प्रकार के समूह और हितधारक शामिल थे. इनमें से अधिकांश का उद्देश्य सत्ता प्राप्ति था मगर समग्र बदलाव की इच्छा रखनेवाले युवा भी बड़ी संख्या में शामिल थे. राजनैतिक महत्वाकांक्षी जमात को अपना अभीष्ट मिल गया.
भले नीतियों व कार्यक्रमों में कोई मौलिक परिवर्तन नहीं हुआ पर हिंदी पट्टी की राजनीति का सामाजिक ताना-बाना बदल गया. संपूर्ण क्रांति आंदोलन का परिणाम एकांगी नही, मिश्रित है. अब जनता अपनी समस्याओं की मुक्ति के लिए दलों के दायरे से परे जाकर प्रयास करने लगी और उन्हें ऐसा करने का वैचारिक आधार 74 आंदोलन ने दिया था.
1974 के बाद मानवाधिकार, पर्यावरण, विस्थापन, पुनर्वास, स्त्री समानता, सामाजिक न्याय आदि जन मुद्दों पर आंदोलनों का व्यापक उभार आया. भारतीय समाज का हर परत स्पंदित व सक्रिय हो गया जो आज भी जारी है. संपूर्ण क्रांति किसी तारीख में सीमित घटना नहीं बल्कि अविरल प्रवाह है. सतत, निरंतर और गतिशील.
संपूर्ण क्रांति के सेनानी, सामाजिक कार्यकर्ता, जमशेदपुर
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