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हमें सदैव अपनी ओर आकर्षित करता है ईश्वर का गुरुत्वाकर्षण

Updated at : 15 Sep 2018 7:49 AM (IST)
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हमें सदैव अपनी ओर आकर्षित करता है ईश्वर का गुरुत्वाकर्षण

डॉ मयंक मुरारी चिंतक और लेखक mayank_murari@ushamartin.co.in धरती की अपनी एक छिपी ऊर्जा है, जो हरेक चीज को अपनी ओर खींचती है. इस गुप्त शक्ति को गुरुत्व बल कहा जाता है. वृक्ष से फल गिरे या बहुमंजिल से कोई वस्तु, वह नीचे आयेगी ही. कोई भी वस्तु को चुंबक नीचे खींच लाता है. ठीक इसी […]

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डॉ मयंक मुरारी
चिंतक और लेखक
mayank_murari@ushamartin.co.in
धरती की अपनी एक छिपी ऊर्जा है, जो हरेक चीज को अपनी ओर खींचती है. इस गुप्त शक्ति को गुरुत्व बल कहा जाता है. वृक्ष से फल गिरे या बहुमंजिल से कोई वस्तु, वह नीचे आयेगी ही. कोई भी वस्तु को चुंबक नीचे खींच लाता है. ठीक इसी प्रकार परमात्मा भी चीजों को अपनी ओर खींचते हैं.
उनके खींचने की शक्ति का नाम ग्रेस है. ग्रेस, जिसे हम प्रसाद कहें, अनुग्रह या आकर्षण. जब पौधों में फूल खिलते हैं, तो ऊपर यानी आकाश की ओर उठते हैं. मनुष्य में जब चेतना का विस्तार होता है और वह आनंद से भरता है, तो हल्का हो जाता है. जीव-जंतु और पक्षियों में चेतना विस्तार होता है और मानवों में भी. जब ऐसा होता है, तो जीवन ऊपर उठता है.
जब भी किसी चेतन सत्ता में आनंद की वर्षा होने लगती है, हृदय में उमंग होने लगता है, तो शरीर नर्तन करता है. तब वह फूल की तरह खिल कर आकाश की ओर उन्मुख हो जाता है. परमात्मा से मिलने की यह आतुरता है. जब हम जागृत होते हैं, चैतन्य की अवस्था को प्राप्त करते हैं, तो ईश्वर का प्रसाद मिलता है.
फूलों की पंखुड़ियों में रस, गंध, रंग और फल के रूप में मिठास एवं तृप्ति मिलती है, तो मनुष्य उसके अनुग्रह से ओत-प्रोत हो जाता है. दूसरी ओर जब जीर्ण होते हैं, मरते हैं या दुखी होते हैं, तो नीचे गिरते हैं, जमीन खींच कर हमें मिट्टी में सुला देती है. यहां ईश्वर के प्रेम का प्रसाद विभिन्न रूपों में देखने को मिलता है. वह कभी मुस्कुराते फूल, गंभीर पर्वत, ठांठे मारते सागर, प्रफुल्लित पवन, चंचल पक्षी एवं चेतना से परिपूर्ण मानव के माध्यम से प्रकट होता है.
फ्रांस की महान दार्शनिक सिमन वेल ने एक किताब लिखी है- ग्रेस एंड ग्रेविटी यानी प्रसाद और गुरुत्वाकर्षण. आध्यात्मिक पुस्तकों में इसे दुनिया की महान किताब में स्थान प्राप्त है. उनका कहना है कि जैसे जमीन चीजों को अपनी ओर खींचती है, ऐसे ही परमात्मा भी चीजों को अपनी तरफ खींचते हैं. ईश्वर सदैव हमें अपनी ओर आकर्षित करते हैं.
ईश्वर की स्वप्नशील चेतना पहले पत्थरों या निष्क्रिय खनिज में प्रकट होती है. फिर यह पेड़-पौधों में संवेदनशीलता के रूप में हरकत करने लगती है. इसके बाद पशु और पक्षियों के संवेदनशील जीवन के रूप में सामने आता है. मानव में उसी ईश्वर का प्रसाद जीवनशक्ति एवं चेतना तथा श्रेष्ठतम बौद्धिक शक्ति में व्यक्त होता है.
ईश्वर हमें अनुग्रहित करने के लिए नदी बनते हैं, ताकि उसके समीप आनेवालों को जल रूपी अमृत का पान करा सकें. कभी पर्वत बन जाते हैं, कभी प्रेम की विशालता लिये सागर बन जाते हैं. फिर उस ईश्वर का दैवीय प्रेम अनंत आत्माओं के हृदय में क्रियाशील होकर धड़कता रहता है.
ईश्वर का प्रसाद फूलों में सुगंध, पक्षियों में कलरव, दूसरे हदय को आलिंगन को बढ़ता है, तो अनुग्रह प्रकट होता है. वह प्रतिदिन भोजन में से मांस, रक्त, मज्ज, हड्डी और मस्तिष्क का निर्माण करता है. लेकिन हम समझते हैं कि भोजन के कारण ही हम जीवित हैं.
सृष्टि में आकर्षण का नियम अंतर्निहित हैं. जब दो वस्तुएं हिलने के लिए स्वतंत्र हों और वे एक-दूसरे की ओर खिंचे तो गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव दिखाई देता है. भौतिक विज्ञान बताता है कि गुरुत्वाकर्षण वह शक्ति है, जो दो भौतिक पिंडों के बीच होती है और जिसके कारण प्रत्येक पिंड दूसरे पिंड को एक-दूसरे की ओर खींचते हैं. यह नियम सार्वभौमिक है.
पृथ्वी, सूर्य तथा आकाश के सभी तारों एवं वस्तुओं में समान रूप से यह बल होता है, जिसके कारण आकाश के सूर्य, चंद्र, तारे और अन्य खगोलीय पिंड एक- दूसरे के इर्द-गिर्द चक्रीय रूप से घूमते रहते हैं और अपनी ओर दूसरे पिंड को खिंचते हैं.
ईश्वरीय गुरुत्वाकर्षण के नियम को समझें
गुरुत्वाकर्षण एक ओर का खिंचाव नहीं है, बल्कि दो वस्तुओं के बीच का खिंचाव है. गुरुत्वाकर्षण के नियम को ठीक से समझ लेते हैं, तभी ईश्वरीय खिंचाव के प्रसाद या आकर्षण को सही तरीके से समझ सकते हैं.
चांद और पृथ्वी के संदर्भ में पृथ्वी की शक्ति ज्यादा है, तो वह वस्तुओं को अपनी ओर ज्यादा तेजी से खींच पाती है बनिस्पत चांद के. ठीक इसी प्रकार ईश्वर अपनी अनंत चेतना के प्रसाद के माध्यम से अपनी ओर खींचते हैं. दूसरी ओर, माया यानी हमारी अज्ञानता दूसरी ओर खिंचती है.
मूढ़ता के कारण हम ईश्वरीय आकर्षण के विभिन्न केंद्रों की उपेक्षा करते हैं और अपने को नीचा गिराते हैं. हम अपनी इच्छाओं एवं ऐंद्रिक सुख के करण जन्म-मरण के अनंत चक्र में फंस जाते हैं. ईश्वर से दूर होते जाते हैं. जबकि वह लगातार अपने प्रसाद से हमें अनुग्रहित करता रहता है.
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