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शादीशुदा संबंधों में बलात्कार का सवाल, भारतीय समाज में कानूनी साक्षरता की बड़ी जरूरत

Updated at : 15 Oct 2017 8:27 AM (IST)
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शादीशुदा संबंधों में बलात्कार का सवाल, भारतीय समाज में कानूनी साक्षरता की बड़ी जरूरत

वर्तिका नंदा जेल सुधारक एवं मीडिया विश्लेषक अठारह साल से कम उम्र की पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाने को बलात्कार करार दिया गया है. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले में दो बातें बेहद महत्वपूर्ण हैं. एक तो इसमें यह कहा गया है कि महिला किसी की प्रॉपर्टी नहीं है, वह किसी की जागीर नहीं […]

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वर्तिका नंदा
जेल सुधारक
एवं मीडिया विश्लेषक
अठारह साल से कम उम्र की पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाने को बलात्कार करार दिया गया है. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले में दो बातें बेहद महत्वपूर्ण हैं. एक तो इसमें यह कहा गया है कि महिला किसी की प्रॉपर्टी नहीं है, वह किसी की जागीर नहीं है और दूसरी बात यह कि परंपरागत तौर पर हमारे समाज में अगर कोई मान्यता या चलन हो, तो उसको जारी रखा जाये, यह कतई जरूरी नहीं है.
इन दोनों बातों के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट का फैसला बेहद अहम है और एक आधुनिक फैसला है. हालांकि, जब भी कोई ऐसा फैसला आता है, तो हम यह सोचने लगते हैं कि इससे बहुत बड़ा बदलाव होनेवाला है. लेकिन, मसला यह है कि हम जिस सामाजिक ढांचे में रहते हैं, उसमें स्थितियां इतनी आसानी से और जल्दी से नहीं बदल सकतीं. हां, कुछ समय में बदलाव के संकेत जरूर दिख सकते हैं.
भारत का जो सामाजिक ढांचा है, वह काफी पेचीदा है. यहां बहुत से कानून बने, लेकिन हमारे सामाजिक ढांचे में उनका पूरा-पूरा पालन नहीं हुआ.
ऐसे में किसी अच्छे या सख्त कानून का बनना या कोई आधुनिक फैसला दिया जाना, या फिर उसमें लगातार सुधार होना, इन तीनों बातों में एक लंबा फासला होता है, जिसके चलते कानून अपने वजूद के धरातल पर नहीं उतर पाते. यह समाज हमारे समाज की पेचीदगियां हैं, जिसका आये दिन हम सामना करते हैं. ऐसी व्यवस्था में इस फैसले को पूरी तरह से उतार पाना इतना आसान होगा नहीं, क्योंकि शहरी इलाके में भले कम उम्र में लड़कियों की शादियां देखने को नहीं मिलतीं, लेकिन भारत में कहीं-कहीं कुछ ग्रामीण इलाकों में आज भी नाबालिग बच्चियों की शादियां कर दी जाती हैं.
इसे रोकने के लिए जब तक हमारा कानूनी प्रावधान सख्त नहीं होगा, और जब तक कानून की मदद लेनेवालों को नीची दृष्टि से देखा जाता रहेगा, तब तक ये पेचीदगियां समाज में बनी ही रहेंगी.
मैरिटल रेप को रजिस्टर करने के लिए या इसे लेकर पुलिस तक पहुंचने के लिए अभी हमारा समाज तैयार नहीं है. इसलिए सवाल उठता है कि इस फैसले का हमारे समाज में कितने लोग पालन कर पायेंगे?
मैरिटल रेप की शिकार होते हुए भी एक वयस्क शादीशुदा लड़की भी पुलिस के पास जाने से हिचकती है, तो फिर नाबालिग लड़कियों के मामले में तो यह और भी मुश्किल है.
हम जिस पारिवारिक व्यवस्था में रहते हैं, उसमें एक तो मैरिटल रेप को लेकर वैसी जागरूकता नहीं है और अगर कुछ है भी, तो संकोच के कारण यह मुश्किल है कि कोई औरत परिवार से निकलकर कानून के पास जाये. ग्रामीण क्षेत्र तो दूर, मैं यह भी नहीं समझती कि कोई शहरी महिला भी बड़ी आसानी से मैरिटल रेप का मामला थाने में जाकर दर्ज करायेगी.
यहां कई सवाल उठते हैं और इन सवालों का जवाब तलाशकर ही कानूनों को मजबूत किया जा सकता है. दरअसल, ऐसे मसलों को लेकर हमारे यहां कानूनी साक्षरता उतनी मजबूत नहीं है और न तो पुलिस की ट्रेनिंग ही है.
मसलन, ऐसे कानून को सही-सही लागू करने को लेकर मैरिटल रेप की प्राथमिकी दर्ज करने के लिए थाने में बैठा व्यक्ति क्या मानसिक तौर पर सक्षम और तैयार है? और क्या प्राथमिकी दर्ज करानेवाली उस महिला को हमारा समाज स्वीकार कर लेगा? और असल लड़ाई तो यही है कि न सिर्फ अच्छे कानून बनें, बल्कि उनका पालन भी हो.
लेकिन, सवाल बड़ा है कि इसके लिए कानूनी साक्षरता, पारिवारिक साक्षरता और सामाजिक साक्षरता है कहां? ऐसे में, मेरा तो यही मानना है कि स्कूल और कॉलेज स्तर पर कानूनी साक्षरता को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, ताकि बच्चे अपने कानूनी हक को समझ सकें. क्योंकि यही बच्चे एक दिन वयस्क होंगे. जागरूकता बहुत जरूरी है, और इसकी शुरुआत बच्चों-किशोरों से ही शुरू होनी चाहिए, नहीं तो अच्छे से अच्छा फैसला या कानून भी एक मजाक बनकर रह जायेगा. और ऐसा होना उस कानून के टिके रहने के लिए ठीक नहीं होगा.
जब भी महिलाओं को लेकर कोई कानून आता है, तो यह कहा जाता है कि इससे महिला सशक्तीकरण होगा. यह सुनने में अच्छा भी लगता है.
हालांकि, आज के समय में महिला ‘सशक्कीरण’ एक सुंदर मुहावरा बनकर रह गया है, क्योंकि महिला अधिकारों और उनके सशक्तीकरण के लिए आज हमारे पास जितने भी कानून हैं, उन पर बहस कम होती है, बल्कि उनके दुरुपयोग पर ज्यादा चर्चा होती है, जबकि सच तो यह है कि पूरी दुनिया में कोई भी ऐसा कानून नहीं है, जिसका दुरुपयोग किया ही नहीं गया हो.
हम आज तक महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था तो कर नहीं पाये हैं, ऐसे में यह कहना मुश्किल होगा कि कुछ कानूनों से महिला सशक्तीकरण होगा. फिर भी मैं कहूंगी कि सुप्रीम कोर्ट का यह एक अच्छा फैसला है और इसका असर महिलाओं और पुरुषों, दोनों पर होगा. जब हमारे देश में 18 साल के पहले लड़के-लड़कियों की शादी ही नहीं होगी, तो यह कई स्तरों पर फायदेमंद साबित होगा.
शादीशुदा संबंधों में बलात्कार का सवाल
फिलहाल सर्वोच्च न्यायालय ने शादीशुदा रिश्तों में बलात्कार के मसले पर विचार नहीं किया है. लेकिन इस फैसले का असर दिल्ली उच्च न्यायालय में चल रही सुनवाई पर जरूर पड़ेगा तथा अधिकारों के लिए उठनेवाली आवाजें भी इस मुद्दे पर दबाव बढ़ायेंगी.
अनेक देशों में मैरिटल रेप को अपराध घोषित किया जा चुका है. सबसे पहले पोलैंड में 1932 में ऐसा कानून लाया गया था. इनमें दक्षिण अफ्रीका, आयरलैंड, कनाडा, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, मलेशिया, घाना और इजरायल शामिल हैं. स्कैंडिवेनियाई देशों और पूर्व सोवियत गणराज्यों में बहुत पहले ही इस कानून को लाया जा चुका है.
लेकिन, भारत में इस बारे में स्थिति स्पष्ट नहीं है और पत्नी के साथ संबंध को बलात्कार नहीं माना जाता है. वर्ष 2012 के निर्भया मामले के बाद गठित जस्टिस वर्मा कमेटी ने अपनी
रिपोर्ट में मैरिटल रेप को परिभाषित करने का सुझाव दिया था. नेपाल में यह कानून 2002 में आया. वर्ष 2011 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी एक रिपोर्ट में बताया गया है कि 179 देशों में से 52 ने अपने कानूनों को संशोधित कर मैरिटल रेप को अपराध की श्रेणी में रखा है.
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