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राष्ट्रीय पुनर्जागरण का माध्यम है योग

Updated at : 21 Jun 2017 9:44 AM (IST)
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राष्ट्रीय पुनर्जागरण का माध्यम है योग

स्वामी निरंजनानंद परमाचार्य, बिहार योग विद्यालय, मुंगेर योग हमारे देश की संस्कृति है, लेकिन हमारा राष्ट्र एक-विचारधारावाला समाज नहीं, बल्कि बहु-विचारधारावाला समाज है़ भारत में जहां अनेक धर्म और दर्शन हैं, वहीं योग अपनी संस्कृति रखते हुए भी आम जीवन में सरलता से प्रवेश नहीं किया. यही कारण है कि गुरुदेव स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने […]

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स्वामी निरंजनानंद
परमाचार्य, बिहार योग विद्यालय, मुंगेर
योग हमारे देश की संस्कृति है, लेकिन हमारा राष्ट्र एक-विचारधारावाला समाज नहीं, बल्कि बहु-विचारधारावाला समाज है़ भारत में जहां अनेक धर्म और दर्शन हैं, वहीं योग अपनी संस्कृति रखते हुए भी आम जीवन में सरलता से प्रवेश नहीं किया. यही कारण है कि गुरुदेव स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने सर्वप्रथम योग का प्रचार सात समंदर पार किया, ताकि योग को एक जीवन पद्धति तथा एक विज्ञान के रूप में स्थापित किया जा सके.
आज योग के क्षेत्र में जो भी प्रगति हुई है, उसका श्रेय पाश्चात्य संस्कृति और सभ्यता को है़, क्योंकि उन्होंने इसका वैज्ञानिक परीक्षण किया़ इसकी व्यावहारिकता, वैज्ञानिकता और उपयोगिता को जान कर अपने सामाजिक तंत्रों में लागू किया और शिक्षा के क्षेत्र में भी योग को स्वीकार किया गया. योग आज राष्ट्रीय पुनर्जागरण का माध्यम है.
योग शिक्षा का श्रेय बिहार योग विद्यालय को
शिक्षाविदों का मानना है कि आधुनिक शिक्षा प्रणाली में हम अपनी बुद्धि और मस्तिष्क का विकास करते हैं, लेकिन भावना, संवेदनशीलता और व्यावहारिकता का विकास इस बौद्धिक शिक्षा से संभव नहीं है़
भावनात्मक विकास, संवेदनशीलता, व्यावहारिकता व आत्मानुशासन की शिक्षा की प्राप्ति इस परिवेश में कैसे हो पायेगी, इसका समाधान उन्होंने योग में पाया़ आज विश्व तथा हमारे समाज में कोई समस्या है, तो सिर्फ यह कि व्यक्ति को संयमी और आत्मानुशासित कैसे बनाया जाये़ अगर शिक्षा यह कार्य कर सकती, तो शायद योग की आवश्यकता ही नहीं होती, क्योंकि शिक्षा का प्रयोजन सिर्फ बौद्धिक विकास ही नहीं, बल्कि व्यक्तित्व के सभी पक्षों को रचनात्मक और सकारात्मक बनाना तथा प्रतिभा व मानवीय गुणों का विकास है़ तभी शिक्षा मानव जीवन का एक अभिन्न अंग बन सकती है़
पाश्चात्य शिक्षाविदों ने इस बात का अनुभव किया कि वर्तमान शिक्षा पद्धति को हम वैज्ञानिक बना सकते हैं, किंतु इससे एक मानव व्यक्तित्व का निर्माण नहीं कर सकते़ 23 वर्षों की खोज के बाद जब उन्हें विश्वास हो गया कि योग व्यक्तित्व के उत्थान के लिए उपयोगी, आवश्यक तथा अनिवार्य है, तब यूनेस्को के माध्यम से 17 देशों में योग की शिक्षा को लागू किया गया. इसका श्रेय बिहार योग विद्यालय को जाता है़
योग केवल शारीरिक क्रियाओं या ध्यान के अभ्यासों तक सीमित नहीं है़ वे तो योग को सिद्ध करने के साधन हैं, योग नहीं. आसन, प्राणायाम, जप या ध्यान योग के छोटे से अंग हैं.
यहां तक कि क्रिया योग व कुण्डलिनी योग भी योग के छोटे से भाग हैं. इनसे योग की वास्तविक व्याख्या नहीं की जा सकती, क्योंकि योग साधना नहीं, बल्कि यह जीवन की एक अवस्था है़ मन की, चेतना की, ऊर्जा की एक अवस्था है, जिसको हम साधना के माध्यम से प्राप्त करते हैं.
योग में जिस बात पर जोर दिया जाता है, वह है दृष्टिकोण, विचार और व्यवहार परिवर्तन. परिवर्तन तभी संभव है, जब हम अपने जीवन की वास्तविकता तथा व्यावहारिकता को समझ सकें. परिवर्तन का अर्थ होता है कि हम उचित-अनुचित के भेद को समझें. यह तभी संभव है, जब मनुष्य की सजगता इस प्रकार जाग्रत हो कि वह अपने दैनिक जीवन के व्यवहार और विचार को उचित-अनुचित, न्याय-अन्याय और धर्म-अधर्म के मापदंड से नाप सके. योग का सबसे अमूल्य योगदान है कि हर मनुष्य को जीवन में सामर्थ्य, शक्ति और प्रतिभा के प्रति सजग बनाये. जब हम आशंकाओं से घिरे रहते हैं, कमजोरियों से प्रभावित रहते हैं, तब योग हमारे जीवन में आ कर हमें अपनी शक्ति का आभास दिलाता है.
एक तरह से कहिए कि हमें हनुमान बनाता है़ पहले तो हनुमान जी को भी अपनी शक्ति का अंदाजा नहीं था़ जब सागर के तट पर सब बानर बैठ कर विचार कर रहे थे कि समुद्र को कौन पार करेगा़, तब जाम्बवंत ने हनुमान को उनकी शक्ति का बोध दिलाया और हनुमान ने समुद्र पार किया़
बच्चे योग विद्या के वाहक
जब हम योग को एक साधना के रूप में नहीं, बल्कि जीवन के अंग के रूप में देखते हैं, तब इसे कहते हैं योग को आत्मसात करना़ इस योग विद्या को आत्मसात करने का कार्यक्रम बच्चों से प्रारंभ हुआ.
वर्ष 1995 में मुंगेर के पांच बच्चों से प्रारंभ बाल योग मित्र मंडल आज घर-घर पहुंच चुका है. बाल योग मित्र मंडल का जो नारा है, वह इनकी छाती में हमेशा लगा रहता है- संस्कार, स्वावलंबन और राष्ट्र-संस्कृति प्रेम़ एक बालक, युवक या व्यक्ति के जीवन में इन तीनों की ही आवश्यकता है़
पहले कहते थे कि संस्कार घर से मिलता है, लेकिन इस आधुनिक युग में संस्कार मिलने का क्षेत्र बहुत सीमित हो गया है़ लोग सोचते हैं कि धर्म में संस्कार मिलता है, किंतु धर्म में भी संस्कार नहीं मिलता़ संस्कार मनुष्य तभी प्राप्त करता है, जब उसका मन एकाग्र, शांत और संयमी रहता है़
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