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न कोई ऐसा युग था, न आयेगा, जब किताबें नहीं होंगी

Updated at : 16 Jun 2017 6:14 AM (IST)
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न कोई ऐसा युग था, न आयेगा, जब किताबें नहीं होंगी

मशहूर रंगकर्मी सफदर हाशमी की एक कविता है,’किताबें करती हैं बातें/बीते जमानों की/ दुनिया की/इंसानों की/आज की कल की/एक-एक पल की.’ कहते हैं, किताबें जीवन और दुनिया को जानने का बेहतरीन माध्यम हैं. हमारी सबसे अच्छी साथी हैं. हमारे समय के महत्वपूर्ण लेखक नरेंद्र कोहली से प्रीति सिंह परिहार की बातचीत किताबों से उनके रिश्ते […]

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मशहूर रंगकर्मी सफदर हाशमी की एक कविता है,’किताबें करती हैं बातें/बीते जमानों की/ दुनिया की/इंसानों की/आज की कल की/एक-एक पल की.’ कहते हैं, किताबें जीवन और दुनिया को जानने का बेहतरीन माध्यम हैं. हमारी सबसे अच्छी साथी हैं. हमारे समय के महत्वपूर्ण लेखक नरेंद्र कोहली से प्रीति सिंह परिहार की बातचीत किताबों से उनके रिश्ते के बारे में…
– किताबों की दुनिया से आपका रिश्ता कब और कैसे बना?
मुझे लगता है बहुत सारी चीजें जन्मजात होती हैं. आपके भीतर होती हैं. मैं जब तीसरी-चौथी कक्षा में था, यानी जब पढ़ने लायक हुआ, तो कहानियां पढ़ने लगा. मुझे कहानियां पढ़ना इतना अच्छा लगता था, कि जो भी पत्रिका मिल जाती थी, पढ़ लेता था. उस समय किताबें सस्ती हुआ करती थीं, पर हमारे पास पैसे नहीं होते थे. जो भी एक या दो आना होता था, मैं उससे छोटी-छोटी किताबें खरीद लेता था. मेरी मां का कहती थी, कि बाकि बच्चे आइसक्रीम,चनाजोरगरम खाते हैं, यह बच्चा किताबें इकट्ठी करता रहता है. बचपन से पढ़ने का शौक था, तभी से एक रिश्ता बना हुआ है किताबों से.
हम जमशेदपुर में रहते थे, वहां हमने घर में अपनी एक छोटी सी लाइब्रेरी भी खोली थी. शहर की जो बड़ी लाइब्रेरी थी, उसके सदस्य बने थे. मैं उर्दू में पढ़ता था, जो भी अंगरेजी आैर हिंदी से अनूदित किताबें मिलती थीं, पढ़ता था. स्कूल के दिनों में प्रेमचंद को खूब पढ़ा.
इसके बाद बांग्ला के बंकिम चंद्र, शरद चंद्र, रवींद्रनाथ, जिन्हें हिंदी का हर पाठक पढ़ता था, को पढ़ा. मैंने इन सबको उर्दू में पढ़ा. गोदान भी उर्दू में पढ़ा था, कॉलेज में आने के बाद हिंदी में भी पढ़ा. 9वीं के बाद अंगरेजी में किताबें पढ़ने की शुरुआत हुई.
– किताबों की क्या अहमियत है आपके लिए?
मैं समझता हूं कि न कोई ऐसा युग था, न कोई ऐसा युग आयेगा, जब किताबें नहीं हाेंगी, शब्द और साहित्य नहीं होगा. हां, अब वो किस रूप में होगा, किताबों या इ-बुक्स के रूप में होगा या किसी और रूप में, मैं यह नहीं कह सकता. क्योंकि, श्रुति परंपरा से जब किताब लिपिबद्ध होकर आयी, तब से उसके कई रूप बदले हैं.
– आपकी सबसे पंसदीदा किताबों केबारे में बताएं?
उपनिषद्, भगवतगीता, रामायण और महाभारत मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं. इसके अलावा मैं उपन्यास बहुत पढ़ता रहा हूं, प्रेमचंद को तो शुरू में ही बहुत पढ़ लिया था, आगे बढ़ा तो मुझे अमृत लाल नागर, हजारी प्रसाद द्विवेदी का लेखन बहुत पसंद आया. अमृत लाल नागर का ‘मानस का हंस’ अच्छा लगता है, तो हजारी प्रसाद द्विवेदी का ‘अनाम दास का पोथा’ भी बहुत प्रिय है. ऐसे और भी बहुत लोग, जैसे कृष्णा सोबती, अज्ञेय, निर्मल वर्मा का लेखन पसंद था. लेकिन, जब आप पढ़ते हुए आगे बढ़ते जाते हैं और परिपक्व होते जाते हैं, तो पसंद बदलती जाती है.
– आपके सबसे प्रिय लेखक कौन हैं ?
किसी एक का नाम लेना मुश्किल है, जो आदमी ज्यादा पढ़ेगा, वो किसी एक का नाम नहीं देगा, जो बहुत कम पढ़ेगा, सीमित पढ़ेगा, वो नाम देगा. मैंने तो पांच-छह नामाें का जिक्र कर दिया, लेकिन बहुत नाम छूट गये. मुझे टाॅलस्टाॅय, पुश्किन, दोस्तोयेव्स्की भी पसंद हैं. इसलिए किसी एक का नाम लेना मुश्किल है.
– ऐसी किताबें, जो हर भारतीय को पढ़नी चाहिए?
मैं फिर से उपनिषद्, भगवतगीता, रामायण और महाभारत का नाम लूंगा. आप एकदम नये पाठक हैं, तो पंचतंत्र की कहानियों से शुरुआत करें. प्रेमचंद को पढ़ें. परिपक्व पाठकों को भगवतगीता एवं तुलसीदास को जरूर पढ़ना चाहिए. मैं जब 12वीं में था, तो उर्दू में ही अधिक पढ़ता था, पर हमेशा से सोचता था कि भगवतगीता में ऐसा क्या है, जो इसे हर कोई पढ़ता है. मुझे भी इसे पढ़ना चाहिए. ऐसा ही भाव मेरे मन में निराला की ‘राम की शक्ति पूजा’ और प्रसाद के लेखन को लेकर भी था. मैंने इनको पढ़ा, तो मुझे इन्हें पढ़ने में आनंद आने लगा. कालिदास के नाटक पढ़ने का भी एक सुख है. बाणभट्ट को पढ़ कर समझ आया कि गद्य को भी काव्य क्यों कहा जाता है.
– ऐसी किताबें जो अभी तक पढ़ी जानी बाकी हैं?
ऐसी किताबें हैं बहुत, लेकिन अब मैं जिस उम्र में आ गया हूं, उसमें आंखे भी परेशान करती हैं. वो समय बीत गया है कि आप किताब लेकर बैठे और पढ़ कर ही उठे. अब मैं अगर चाहूं कि एक बार फिर से रवींद्रनाथ ठाकुर की सारी रचनाएं पढ़ जाऊं, तो मुश्किल होगा. मुझे ‘अष्टावक्र संहिता’ बहुत पसंद है, उसकाे दो बार मैंने पढ़ा है, पर फिर से पढ़ना चाहता हूं. लेकिन, अब समय बहुत कम है, क्षमता कम है, ऐसे में कुछ न कुछ रह ही जायेगा.
– हाल के समय में पढ़ी गयी किताब, जो पसंद आयी?
इस समय मैं अमीश त्रिपाठी की सीता पढ़ रहा हूं. मैं यह नहीं कह सकता कि बहुत पसंद आ रही है. कुछ चीजें बहुत अच्छी हैं, लेकिन कुछ चीजों पर मेरा बहुत मतभेद है.
– युवा लेखकों में आपको किसका लेखन पसंद है?
मैं किसी का नाम नहीं लूंगा, एक नाम लिया तो पांच अन्य नाम छूट जायेंगे. इससे लोगों को बहुत कष्ट होगा.
– ऐसी कोई किताब, जिसकी उतनी चर्चा हिंदी साहित्य में नहीं हुई, जितनी होनी चाहिए थी?
क्षमा कौल का उपन्यास है कश्मीर पर ‘दर्दपुर’. मेरे हिसाब से यह बहुत बेबाकी और साहस के साथ लिखा गया एक बेहतरीन उपन्यास है. लेकिन, इस किताब पर ज्यादा चर्चा नहीं हुई. किसी ने इस पर नहीं लिखा, सब चुप हाे गये. छिपा गये या डर गये. लेकिन क्षमा ने बहुत साहस, खुलेपन एवं विस्तार से यह उपन्यास लिखा है. मुझे लगता है कि यह किताब ज्ञानपीठ ने छाप तो दी, लेकिन पता नहीं क्या हुआ कि फिर इसे दबा दिया. इसकी कोई चर्चा कहीं नही हुई. अभी इस उपन्यास का गुजरातीमें अनुवाद आया है और गुजरात साहित्य अकादमी ने इसे पुरस्कृत भी किया है. ऐसी किताबें और भी होंगी, लेकिन मेरे ध्यान में यही है.
– इन दिनों क्या लिख रहे हैं?
स्वामी विवेकानंद की जीवनी का आठवां और नौवां खंड लिखना है. कुछ काम हुआ है, पर बहुत बाकी है. अभी प्रवाह नहीं मिल रहा है. अमेरिका जाकर रहनेवाले भारतीयों पर एक उपन्यास लिखने का मन है.
मेरे दो-तीन चक्कर अमेरिका के लगे, तो मन में यह ख्याल अाया कि वहां जो भारतीय बसे हैं, वो भारत को इतनी गालियां देते हैं, तो क्यों देते हैं. इसमें उनका कितना दोष है दूसरों का कितना दोष है. जिस देश को वो छोड़ कर चले गये हैं, उसकी बातों में बिना जाने वह टांग क्यों अड़ाते हैं? अभी किशाेरों के लिए एक उपन्यास लिख कर दिया है राजपाल एंड संस को, वो जल्द ही आयेगा.
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