जाति का कार्ड तो भाजपा ने खेला

Updated at : 05 Oct 2015 7:37 AM (IST)
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जाति का कार्ड तो भाजपा ने खेला

जदयू के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह चुनाव में महागंठबंधन के स्पष्ट बहुमत के प्रति आशान्वित हैं. उन्होंने कहा कि लालू व नीतीश के साथ आने से भाजपा का समीकरण गड़बड़ा गया है. प्रभात खबर की विशेष इंटरव्यू श्रृंखला में आज पढ़िए वशिष्ठ नारायण सिंह से मिथिलेश की बातचीत मौजूदा चुनावी परिदृश्य पक्ष में 2010 […]

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जदयू के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह चुनाव में महागंठबंधन के स्पष्ट बहुमत के प्रति आशान्वित हैं. उन्होंने कहा कि लालू व नीतीश के साथ आने से भाजपा का समीकरण गड़बड़ा गया है. प्रभात खबर की विशेष इंटरव्यू श्रृंखला में आज पढ़िए वशिष्ठ नारायण सिंह से मिथिलेश की बातचीत
मौजूदा चुनावी परिदृश्य पक्ष में
2010 के चुनाव में नीतीश कुमार को जो सफलता मिली थी, उससे कहीं ज्यादा इस बार महागंठबंधन के प्रति लहर दिख रही है. पहले व दूसरे चरण की 80 फीसदी से अधिक सीटों पर महागंठबंधन के उम्मीदवार जीतेंगे. चुनाव में तीन चीजें महत्वपूर्ण होती है. पहला, किस पार्टी या गंठबंधन को वोट करें. दूसरा, किस नेता को बेहतर माना जाये और तीसरा, शासन करने वाले का कार्यकाल कैसा रहा. इसके अलावा सामने खड़े नेता का मूल्यांकन भी नीति और कार्यक्र म के आधार पर लोग करते हैं. इन सभी मानकों पर नीतीश कुमार सौ फीसदी खरे उतरे हैं. न्याय के साथ विकास और समावेशी विकास ने एक-एक बिहारी के मन में यह भाव जगाया है कि नीतीश को वोट नहीं देंगे, तो किसे देंगे. पिछले तीन-चार माह में कमजोर तबके के हित में शुरू कार्यक्रमों की चर्चा है. युवाओं में इस सरकार को बनाये रखने की ललक जगी है. लड़कियों के लिए साइकिल और पोशाक योजना, छात्रवृत्ति का असर दिखा है. कानून व्यवस्था में सुधार आया है. नीतीश कुमार की साफ सुथरी इमेज और व्यक्तित्व थोड़ा और चमका है. दूसरी तरफ, नरेंद्र मोदी की घोषणाएं- बिहार को विशेष राज्य का दरजा, विशेष पैकेज और विशेष ध्यान का पालन किया नहीं किया गया. पीएम ने बांका के भाषण में बिहार को लेकर जो कुछ कहा, उसका निगेटिव असर पड़ रहा है.
क्या मुकाबला लालू व मोदी में
भाजपा गाली-गलौज की भाषा का प्रयोग कर रही है. नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में नीतीश कुमार के डीएनए पर सवाल उठा दिया. अभद्र टिप्पणी से भाजपा ने माहौल को गंदा कर दिया है. लालू प्रसाद ने तीखे शब्दों में और उसी की भाषा में भाजपा को जवाब दिया है, जिसकी उसे उम्मीद नहीं थी. इससे भाजपा में उद्विग्नता, बेचैनी, छटपटाहट और परेशानी है. इसलिए भाजपा लालू प्रसाद पर अधिक प्रहार कर रही है. बिहार के विकास और नीतीश के विकास मॉडल पर भाजपा को जवाब नहीं सूझ रहा. जाति का कार्ड खेलने की शुरूआत तो भाजपा ने की है. चुनाव के वक्त मोहन भागवत के बयान आये. भाजपा ने जातियों की मीटिंग की. जाति का सहारा लेकर चुनावी नैया पार लगाना चाहते थे. बिहार में लालू प्रसाद का बड़ा जनाधार है. जब नीतीश व लालू एक साथ हो गये तो भाजपा का सामाजिक समीकरण गड़बड़ा गया.
विकास की बात, जाति पर टिकट
हमलोग तो विकास की बात कर रहे हैं. भाजपा ने जातिगत आधार पर टिकट बांटा है. भाजपा को अपने वोट की बजाये प्रचार व साधन पर ज्यादा भरोसा है. लालू पर जंगल राज का आरोप इसी कारण मढ़ा जा रहा है. भाजपा ने बिहार के विकास और कानून व्यवस्स्था का सवाल बनाया. नीतीश कुमार ने इसका जवाब भाजपाशासित राज्यों में अपराध की घटनाओं से तुलना कर दिया है .
लालू ने विकास से वंचित लोगों को जोड़ने की जोरदार पहल की है. इसी बेचैनी में भाजपा लालू पर तरह-तरह के आरोप लगा रही. नीतीश कुमार के नेतृत्व में सीमित साधनों के बल पर संगठित तरीके से प्रचार चलाया जा रहा है. जदयू, राजद व कांग्रेस के साथ आने से भाजपा को लगा कि उसका बड़ा मुद्दा फेल हो गया. इसलिए मुददों को भटकाने वाले सवाल उठाये जा रहे हैं.
लालू व नीतीश की बात में फर्क
आरक्षण बरकरार रखने के मसले पर नीतीश कुमार भी लालू प्रसाद की बातों से फर्कनहीं रखते. नीतीश कुमार ने भी उन बातों का ही जिक्र किया है. नीतीश कुमार की जिम्मेवारी बड़ी है. उन्हें अपने दस साल के काम का लेखा जोखा जनता की अदालत में देना है और वह दे रहे हैं. विकास को लेकर बिहार में जगी भूख को नीतीश और आगे बढ़ा रहे हैं. कोई भी राजनीतिक पार्टी आरक्षण को खत्म करने का प्रयास नहीं कर सकती. मोहन भागवत ने इसकी चर्चा की. जब सभी पार्टियों की एक राय है कि इस संवैधानिक व्यवस्था को कायम रखा जाये, तो भाजपा कैसे इसे खत्म कर सकेगी. भाजपा चुनाव के समय यह मुद्दा उठा कर वोट की राजनीति करना चाह रही है.
ओवैसी व थर्ड फ्रंट का असर
चुनावी लड़ाई तो महागंठबंधन और एनडीए के बीच है. जब दो गंठबंधनों के बीच लड़ाई की बयार बहेगी, तो छोटी पार्टियों की ओर मतदाता मुखातिब नहीं होंगे. छोटी पार्टियों से अलग-अलग जगहों पर उम्मीदवारों को थोड़ा नुकसान उठाना पड़ता है. इस बार यह नुकसान भाजपा को भी उठाना पड़ रहा है. वैसे बिहार में छोटी पार्टियों का अस्तित्व कभी नहीं रहा. बिहार में लड़ाई वहां से शुरू होगी जहां बिहार पहुंच चुका है. विकास की बड़ी लकीर खीचने का जो माद्दा रखता है, वहीं जवाब दे पायेगा.
एनडीए से मुकाबला किस तरह
साधन और धन के बल पर भाजपा जीतना चाहती है. केंद्र के मंत्रियों के लिए राजधानी दिल्ली नहीं, बल्कि पटना बन गयी है. आरएसएस की बड़ी टीम यहां जमी है. लेकिन हमें कार्यकर्ताओं पर भरोसा है. हम अपने लोगों की ताकत से उन्हें जवाब देंगे.
राजनीति में परिवारवाद
परिवारवाद केवल बिहार में ही नहीं, पूरे देश में है. भाजपा में सबसे ज्यादा है. शिवराज सिंह चौहान की पत्नी चुनाव लड़ती हैं. परिवारवाद पर दोहरा मापदंड नहीं चलेगा. वैसे राजनीति में यह चिंता का विषय है, लेकिन यदि परिवार में कोई राजनीति में सक्रिय है , तो उनको उतरना ही चाहिए. परिवारवाद को आज के माहौल में रोका नहीं जा सकता. इसके बावजूद जिन लोगों ने पार्टी के लिए खून पसीना बहाया है, उन्हें प्रश्रय तो मिलना ही चाहिए. लालू प्रसाद के लड़के काबिल और सक्रिय हैं. भाजपा को देखना चाहिए उसने अपने यहां कितने को प्रोजेक्ट किया है.
जंगल राज और लालू प्रसाद
कानून का राज चला है और चलेगा. नीतीश कुमार ने बार-बार इसे दोहराया है. भाजपा लोगों को बरगलाना चाहती है. उसका मंसूबा धवस्त होगा. इस बार भारत की राजनीति आमने- सामने है. नरेंद्र मोदी ने उधर से मोरचा संभाल रखा है. लेकिन, भाजपा का पराभव यहीं से जोरदार तरीके से होगा.
महागंठबंधन जीतेगा, क्योंकि..
1. महागंठबंधन में जनाधार वाली पार्टियां.
2. नीतीश कुमार की साफ सुथरी छवि .
3. भाजपा की वादाखिलाफी का जनता जवाब देगी.
4. एक मजबूत धारा गरीबों के साथ, दूसरी धारा संपन्न लोगों की.
5. बिहार में भाजपा हारेगी, तो देश भर के पिछड़े-गरीबों को राजनीति का आधार मिलेगा.
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