सर्दी की बूटियां गुड़पट्टी, चिक्की, गजक
Updated at : 17 Nov 2019 2:11 AM (IST)
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कभी चने की चिक्की, गुड़पट्टी, गजक की मिठास सर्दियों के आते ही हवा में फैलने लगती थी. हालांकि यह खुशबू तो आज भी आती है, लेकिन अब उसमें काफी फर्क आ गया है. आज के आधुनिक कारखाने में निर्मित गुड़पट्टी, चिक्की और गजक में आज मिट्टी की वह महक कहां, जो बचपन की याद ताजा […]
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कभी चने की चिक्की, गुड़पट्टी, गजक की मिठास सर्दियों के आते ही हवा में फैलने लगती थी. हालांकि यह खुशबू तो आज भी आती है, लेकिन अब उसमें काफी फर्क आ गया है. आज के आधुनिक कारखाने में निर्मित गुड़पट्टी, चिक्की और गजक में आज मिट्टी की वह महक कहां, जो बचपन की याद ताजा करा दे!
पुष्पेश पंत
दिल्ली के जानलेवा प्रदूषण से कुछ दिन की मुक्ति मिली भी नहीं कि एक छोटे से कस्बे में दो-चार दिन की यात्रा पर जाना हुआ. वहां गलियों में जाड़े की मेवा-मिठाई पहुंच चुकी है. अर्थात् गुड़पट्टी, चिक्की, गजक वगैरह ने अपनी दस्तक दे दी है. हालांकि, हमारी मनपसंद नन्हीं रेवड़ियां कहीं नजर नहीं आयीं. ठेलों और खोमचों पर नमक का लुत्फ देने को घरेलू आलू के चिप नजर आ रहे थे और ताजे भुनी मूंगफली भी. जब ग्राहक पहुंचते, तो इनके ढेर के बीच धरी कोयले वाली हांडी के पास वाली मूंगफली बटोर कर कागज के तिकोने में भर कर हाजिर की जा रही थीं.
यूं तो साथ में भुंजे चने भी रखे थे, पर इनके खरीदार बहुत कम थे. मसालेदार चपटे ‘चनाजोर’ सिर्फ बच्चों को ललचा रहे थे. देसी ‘पॉपकोर्न’ की बड़ी सी ढेरी थी, जिसका आकार कड़ाही में ताजा भुंजे मकई के दानों का आगमन घटने नहीं दे रहा था. पड़ोस में ही एक छोटे खोमचे पर काले तिल के गुड़ के पाक में बंधे लड्डू दिखलायी दे रहे थे, जिनका साथ रामदाने के लड्डू दे रहे थे.
जाड़ों के मौसम में गुड़ की मिठास सिर्फ जायका ही नहीं बदलती, बल्कि किफायती पुष्टिवर्धक तत्व भी सुलभ कराती है. ठंड बढ़ने के साथ हमारा शरीर अधिक कैलोरी खा-पचा सकता है. यह वैज्ञानिक जानकारी हमारे पुरखों को अनुभवसिद्ध आधार पर थी इसीलिए मूंगफली, गुड़, तिल आदि से बने लड्डू, चिक्की का ‘आविष्कार’ किया गया. शायद ही देश का कोई ऐसा हिस्सा हो जहां ऋतु परिवर्तन के अनुकूल खान-पान में भी बदलाव न आता हो.
पारंपरिक रसोई में काफी सारे व्यंजन पारिवारिक नुस्खों के अनुसार पकाये जाते थे. समय के साथ इस रिवाज का निर्वाह कठिन हो चला है. पर राह चलते, फुर्सत के दुर्लभ होते जा रहे लमहे गुजारते गुड़ पट्टी, चिक्की या गरमागरम मूंगफली के मजे लेना ही बचा है, जो यह जरूरत पूरी करता है.
मूंगफली को तो कहीं कहीं टाइम पास ही कहा जाता है- छीलते जाओ और खाते जाओ- दाना दाना गिनते-गिनते वाले अंदाज में. अभावग्रस्त ग्राहक इसे चीनिया बादाम पुकार अपना दिल बहलाते थे. हममें बहुतेरे इस बात से अनभिज्ञ हैं कि मूंगफली भूंजना भी एक कलाकारी है. कहीं इसे रेत में भूंजा जाता है, तो कहीं नमक में. इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि मूंगफली करारी तो हो पर जले नहीं. ताजा भुनी न हो तो सील कर सारा मजा खराब कर देती है.
कुछ लोग बहुत सारी फलियां छील कर दानों को हथेली से रगड़ कर छिलके उतार एक साथ खाना पसंद करते हैं, तो दूसरों का काम मसालेदार नमक के बिना अधूरा रहता है. इधर पापड़ के ऊपर कच्ची या उबली मूंगफली का चाटनुमा सलाद लोकप्रिय होने लगा है. वैसे उत्तर भारत में चलन भुंजी मूंगफली का ही अधिक है.
रही बात चिक्की की, तो उसका देहाती रूप भी शहरों में बदलने लगा है. इसे चीनी से बनाया जाने लगा है और मूंगफली की जगह बादाम तथा और मेवों को दी जाने लगी है यह उस सिंधी ‘माजून’ की नकल लगती है, जिसे गुजरे जमाने में दामाद के लिए तैयार किया जाता था. कभी चने की चिक्की भी बनती थी अब यह कम नजर आती है.
हल्दीराम जैसे उद्यमियों ने पैकेटबंद आधुनिक कारखाने में निर्मित नमकीन तली मूंगफली और भुने मसालेदार चनों को सदाबहार बना दिया है, पर इनमें मिट्टी की वह महक कहां, जो बचपन की याद ताजा करा दे!
रोचक तथ्य
जाड़ों के मौसम में गुड़ की मिठास सिर्फ जायका ही नहीं बदलती, बल्कि किफायती पुष्टिवर्धक तत्व भी सुलभ कराती है.
चिक्की का देहाती रूप शहरों में बदलने लगा है. इसे चीनी से बनाया जाने लगा है और मूंगफली की जगह बादाम तथा और मेवों को दी जाने लगी है. यह उस सिंधी ‘माजून’ की नकल लगती है, जिसे गुजरे जमाने में दामाद के लिए बनाया जाता था.
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