सत्य और अहिंसा के मनोविज्ञान को बताता नाटक
Updated at : 15 Sep 2019 2:07 AM (IST)
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अमितेश रंगकर्म समीक्षक ललित सहगल द्वारा लिखित नाटक ‘हत्या एक आकार की’ अब मुश्किल से उपलब्ध है. एमके रैना ने इस नाटक को निर्देशित कर इसे पुनर्जीवित किया है. एमके रैना निर्देशित प्रस्तुति को देखने का मौका इलाहाबाद में मिला. नाटक गांधीजी के सिद्धांतों और कार्यकलाप की बुनियादी सच्चाई को उनके विरोधियों और हत्या करने […]
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अमितेश
रंगकर्म समीक्षक
ललित सहगल द्वारा लिखित नाटक ‘हत्या एक आकार की’ अब मुश्किल से उपलब्ध है. एमके रैना ने इस नाटक को निर्देशित कर इसे पुनर्जीवित किया है. एमके रैना निर्देशित प्रस्तुति को देखने का मौका इलाहाबाद में मिला. नाटक गांधीजी के सिद्धांतों और कार्यकलाप की बुनियादी सच्चाई को उनके विरोधियों और हत्या करने के मंसूबे रखनेवालों के तर्क के परिप्रेक्ष्य में सामने रखता है.
इस क्रम में गांधीजी की वैचारिक उज्ज्वलता, सत्य-अहिंसा के उनके विचारों के पीछे का मनोविज्ञान का तो पता चलता ही है, हत्यारों की मनःस्थिति का खुलासा भी होता है.
नाटक कोर्टरूम ड्रामा के शिल्प में है, जो तर्क-वितर्क से आगे बढ़ता है, घटनाएं कम है. चार व्यक्ति गांधीजी की हत्या की योजना बना चुके हैं और जब अभियान पर निकलने का वक्त आता है, तो उनमें से एक की अंतरात्मा उन्हें फिर से विचार करने को कहती है, उसको सहमत करने के लिए वे आपस में झूठे मुकदमे का खेल रचते हैं, जिसमें वकील-ए-सफाई अभियुक्त के रूप में गांधीजी का और तर्कों से वकील का पक्ष रखता है.
इस क्रम में गांधीजी के अपने समकालीन नेताओं विशेषकर भगत सिंह और सुभाष चंद्र बोस से उनके रिश्तों की सच्चाई का पता चलता है, जिसके संदर्भ में लोग अफवाहों पर अधिक और तथ्य पर कम भरोसा करते हैं.
साल 1968 में लिखे इस नाटक की प्रस्तुति हमारे समय के सवालों को ऐसे समेटती है, मानो गांधीजी के जन्म के डेढ़ सौवें साल में हम उन्हें फिर उन्हीं सवालों के कटघरे में खड़े कर रहे हैं, और सच से नावाकिफ ही रहना चाहते हैं.
नाटक में गांधीजी का तर्क रख रहा पात्र ठीक ही कहता है, ‘ये एक आकार की हत्या है’ जो बार-बार होती है. नाटक की संवाद प्रधान शैली में कथ्य को अभिनेताओं ने बखूबी उभारा है. हत्या के समर्थकों की उतावली और उन्हीं के एक साथी के विचलन और उसके वकील-ए-सफाई बनने से प्रस्तुति में द्वंद्व और तनाव निर्मित होता है.
प्रस्तुति की विशेषता यह है कि किसी ऐतिहासिक किरदार का नाम नहीं लिया जाता, लेकिन संबंधित घटनाओं से, जिनके माध्यम से आरोप लगाया जाता है, दर्शक वाकिफ होते जाते हैं. आरोप क्या हैं- अहिंसा, सत्याग्रह और सांप्रदायिक एकता. अंतत: नाटक गांधीजी के पक्ष में मजबूती से खड़ा होता है.
वकील-ए-सफाई और अभियुक्त के किरदार के दो शेड्स को राकेश कुमार सिंह गहराई से अपने अभिनय में उभारते हैं. भूपेश पंड्या के अभिनय से हास्य निर्मित होता है. विपिन अपने किरदार की उत्तेजना को और दुर्गेश शातिरपने को उभारते हैं. मंच परिकल्पना सादगी युक्त है और प्रकाश परिकल्पना से हिमांशु जोशी किरदारों की मानसिक अवस्था में परिवर्तन को उभारते हैं.
इस वर्ष गांधी जी के जन्म का डेढ़ सौवां साल मनाया जा रहा है, तो रंगमंच भी इसको अपनी तरह से मना रहा है. इसमें सबसे सक्रिय एमके रैना ही हैं, जिन्होंने विगत एक वर्षों में एक के बाद एक गांधी जी पर चार प्रस्तुतियां तैयार की हैं.
पहली प्रस्तुति उन्होंने तैयार की ‘स्टे येट अ व्हाइल’, जो गांधी और टैगौर के बीच हुए पत्राचारों पर आधारित है. नाटक सब्यसाची भट्टाचार्या द्वारा संपादित किताब ‘पोएट टू महात्मा’ पर आधारित है. ‘हत्या एक आकार की’ इस क्रम में की गयी दूसरी प्रस्तुति है. तीसरी प्रस्तुति है ‘बाबला और बापु’, यह गांधीजी के सचिव महादेव देसाई के बेटे नारायण देसाई की किताब पर आधारित है, इसमें गांधी और बच्चों के बीच के रिश्ते को उभारा गया है.
चौथी प्रस्तुति है ‘द ग्रेट ट्रायल’, यह गांधी पर 1922 में 124-ए के तहत चले देशद्रोह के मुकदमे पर आधारित है. इस मुकदमे में गांधीजी अपने उपर लगे आरोपों को स्वीकार कर लेते हैं और अदालत में एक बयान देते हैं, जिसकी प्रासंगिकता आज बढ़ गयी है. इन सभी प्रस्तुतियों का आलेख हाल में लिखा गया हुआ है जबकि ‘हत्या एक आकार की’ पूर्ण नाटक है.
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