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खेल के खुदा की आत्मस्वीकृतियां

Updated at : 01 Sep 2019 2:57 AM (IST)
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खेल के खुदा की आत्मस्वीकृतियां

अजित राय वरिष्ठ फिल्म समीक्षक खे ल की जीवित हस्तियों पर फिल्म बनाना बहुत जोखिम भरा काम है, तब जब उनके करोड़ों चाहनेवाले मौजूद हों और भले ही उन्होंने खेलना बंद कर दिया हो. हिंदी में ऐसी फिल्मों की कमी नहीं है, जो नकली महानताओं और इमोशनल मेलोड्रामा से भरी हुई हैं. इन फिल्मों में […]

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अजित राय

वरिष्ठ फिल्म समीक्षक
खे ल की जीवित हस्तियों पर फिल्म बनाना बहुत जोखिम भरा काम है, तब जब उनके करोड़ों चाहनेवाले मौजूद हों और भले ही उन्होंने खेलना बंद कर दिया हो. हिंदी में ऐसी फिल्मों की कमी नहीं है, जो नकली महानताओं और इमोशनल मेलोड्रामा से भरी हुई हैं. इन फिल्मों में असली नायकों के जटिल जीवन का आभास-मात्र ही मिल पाता है. इधर की कुछ फिल्मों के नाम गिनाये जा सकते हैं, मसलन ‘चक दे इंडिया’, ‘दंगल’, ‘सुलतान’, ‘मैरी कॉम’, ‘एमएस धोनी’, ‘लाहौर’, ‘पटियाला हाउस’, ‘अव्वल नंबर’ आदि.
भारतीय मूल के ब्रिटिश फिल्मकार आसिफ कपाड़िया ने अर्जेंटीना के विश्व प्रसिद्ध फुटबॉल खिलाड़ी डिएगो माराडोना पर इसी नाम से दो घंटे की फीचर डाॅक्यूमेंट्री फिल्म बनायी है. इस फिल्म का मुख्य आधार वे 1,500 वीडियो फुटेज हैं, जिन्हें माराडोना के मैनेजर ने शूट कराया था, लेकिन इसमें खुद माराडोना की कमेंट्री और स्वीकारोक्तियां भी कम दिलचस्प नहीं है.
अर्जेंटीना की राजधानी ब्यूनस आयर्स की झोपड़पट्टी में जन्मा एक मजदूर पिता की पांचवीं संतान देखते-देखते दुनिया का सबसे महंगा और सबसे अमीर फुटबॉल खिलाड़ी बन जाता है. इसके साथ ही यह फिल्म तेजी से उसके पतन के बारे में भी बताती है. एक महानायक की जिंदगी के अंधेरे कोनों में औरतखोरी, नशाखोरी और धोखेबाजी के किस्से भी हैं.
खचाखच भरे स्टेडियम में दनादन गोल दागने से अचंभित होकर जनता उसे खेल का खुदा बनाती है, पर असफल होने पर वही जनता उसे जमीन पर पटक देती है. बेइंतहा प्रसिद्धि के इस खेल में पलक झपकते मीडिया एक नायक को खलनायक बना देता है.
फिल्म की शुरुआत 6 जुलाई, 1984 से होती है, जब विश्व में सबसे ऊंची कीमत पर माराडोना इटली के नेपल्स में खेलने के लिए आते हैं. वहां सैन पाओलो स्टेडियम में 85 हजार लोग दुनिया के सबसे बड़े खिलाड़ी के स्वागत में जमा हैं. इटली की ओर से मैक्सिको के फीफा वर्ल्ड कप (1986) में उनका जादू सिर चढ़कर बोला.
नेपल्स में जहां उन पर माफिया सरगनाओं से दोस्ती, नशीली दवाओं और औरतखोरी के आरोप लगे, वहीं एक महिला ने दावा किया कि उसने माराडोना के बच्चे को जन्म दिया है, जिसे माराडोना लगातार नकारते रहे. इसी स्टेडियम में अर्जेंटीना की ओर से 1990 फीफा वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल में उन्होंने इटली को हराया भी.
फुटबॉल का खेल कई बार युद्ध में बदल जाता है. खेल में हिंसा और मीडिया की राजनीति इसे और खतरनाक बना देती है. इस फिल्म की खूबसूरती है कि वह तथ्यों को हमारे सामने जस का तस रख देती है. सभी दृश्य वास्तविक हैं और कई बार तो लगता है कि हम सच में फुटबॉल का मैच देख रहे हैं.
आसिफ कपाड़िया की पिछली बायोपिक ब्रिटेन की पाॅप सिंगर ऐमी पर थी, जो निराशा और नशे के कारण असमय ही चल बसी. डिएगो माराडोना अभी जीवित हैं, इसलिए फिल्मकार को कलात्मक छूट लेने की आजादी नहीं है. फिल्म एक महानायक और एक साधारण इंसान को साथ लेकर चलती है. इन दोनों का संतुलन ही फिल्म को महत्वपूर्ण बनाता है.
इस फिल्म में सबसे विश्वसनीय बात है इसका तथ्यपूर्ण होना. भारतीय फिल्मों में हम जहां अपने नायक को ईश्वर बना देते हैं, वहीं यूरोपीय फिल्मों में उसे साधारण व्यक्ति के रूप में देखा जाता है. हम आज तक एक ‘गांधी’ (रिचर्ड एटनबरो) जैसी फिल्म नहीं बना पाये. आसिफ कपाड़िया ने फिल्म ‘डिएगो माराडोना’ में वह कर दिखाया है, जो हर फिल्मकार का सपना होता है.
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