पश्चिम बंगाल में ‘जात-पात’ की राजनीति की दस्तक

Updated at : 08 Apr 2019 7:31 AM (IST)
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पश्चिम बंगाल में ‘जात-पात’ की राजनीति की दस्तक

अजय विद्यार्थी कोलकाता : राजनीतिक हिंसा, वामपंथी और दक्षिणपंथी विचारधाराओं की लड़ाई का केंद्र बिंदु रहे ‘भद्रलोक’ की छविवाले पश्चिम बंगाल में अब ‘जात-पात’ की राजनीति की दस्तक महसूस की जाने लगी है. अल्पसंख्यक की राजनीति के लिए मशहूर बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के गढ़ में भाजपा ने घुसपैठ करने के लिए सात फीसदी अनुसूचित […]

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अजय विद्यार्थी
कोलकाता : राजनीतिक हिंसा, वामपंथी और दक्षिणपंथी विचारधाराओं की लड़ाई का केंद्र बिंदु रहे ‘भद्रलोक’ की छविवाले पश्चिम बंगाल में अब ‘जात-पात’ की राजनीति की दस्तक महसूस की जाने लगी है. अल्पसंख्यक की राजनीति के लिए मशहूर बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के गढ़ में भाजपा ने घुसपैठ करने के लिए सात फीसदी अनुसूचित जातियों, 22 फीसदी अनुसूचित जनजातियों के वोट बैंक में घुसपैठ के साथ-साथ आदिवासी (ओरांव, टिग्गा, तिर्के, टोटो), गोरखा, कामतापुरी, राजवंशी, मतुआ (नामशुद्र समुदाय), बांग्लादेश से बंगाल आये हिंदू शरणार्थियों और हिंदुत्व का सहारा लिया है.
गोरखा, राजवंशी, कामतापुरी, आदिवासी और दलित फैक्टर
उत्तर बंगाल की पांच सीटें दार्जिलिंग, कूचबिहार, अलीपुरदुआर, जुलपाईगुड़ी और रायगंज क्रमश: गोरखा, राजवंशी, कामतापुरी और आदिवासी बहुल हैं, जबकि दक्षिण बंगाल का झाड़ग्राम, मेदिनीपुर, पुरुलिया, बांकुड़ा और विष्णुपुर आदिवासी व दलित बहुल हैं.
विशेषज्ञों के मुताबिक आरएसएस ने आदिवासी और दलित इलाकों में काफी काम किया है. इसकी वजह से आरएसएस की शाखाओं की संख्या दुगनी हो गयी हैं.
गोरखाओं के समर्थन से भाजपा के उम्मीदवार एसएस अहलुवालिया दार्जिलिंग से विजयी हुए थे. दार्जिलिंग में 50 फीसदी से ज्यादा आबादी गोरखाओं की है. दार्जिलिंग में सुभाष घीसिंग और विमल गुरुंग के नेतृत्व में अलग गोरखालैंड की मांग राष्ट्रीय मुद्दा बन चुका है.
इस चुनाव में भी भाजपा ने गोरखा मूल के राजू सिंह बिष्ट को और तृणमूल ने गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के पूर्व विधायक अमर राय को अपना उम्मीदवार बनाया है. माना जाता है कि बिष्ट को फरार गोरखा नेता विमल गुरुंग का समर्थन हासिल है, जबकि गोरखा मुक्ति मोर्चा के विधायक अमर राय के साथ तृणमूल है.
उसी तरह राजनीतिक दलों ने राजवंशी बहुल जलपाईगुड़ी और अलीपुरद्वार सीट पर आदिवासी समुदाय से उम्मीदवारों को चुना है. अलीपुरद्वार से तृणमूल ने सांसद दशरथ तिर्के, भाजपा ने जॉन बारला और आरएसपी ने मिली उरांव को उम्मीदवार बनाया है. जलपाईगुड़ी से तृणमूल ने विजय चंद्र बर्मन, माकपा ने भागीरथ राय और भाजपा ने जयंत राय को उम्मीदवार बनाया है. कुछ यही हाल दक्षिण बंगाल के दलित बहुल सीटों का है.
16-18 लोस सीटों पर अल्पसंख्यकों का प्रभाव
अल्पसंख्यक वोट बैंक अब भी बंगाल की राजनीति पर हावी है. आखिर क्यों न हो? राज्य के कुल मतदाताओं में से करीब 30 फीसदी लोग अल्पसंख्यक हैं और वे राज्य की लगभग 16-18 लोकसभा सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाते हैं. उत्तर बंगाल में रायगंज, कूचबिहार, बालुरघाट, मालदा उत्तर, मालदा दक्षिण, मुर्शिदाबाद और दक्षिण बंगाल में डायमंड हार्बर, उलबेड़िया, हावड़ा, बीरभूम, कांथी, तमलुक, जयनगर जैसी संसदीय सीटों पर मुस्लिमों की आबादी अधिक है.
तृणमूल कांग्रेस का इन पर और इनका तृणमूल कांग्रेस पर भरोसा अटूट बना हुआ है. हालांकि वामपंथी और कांग्रेस भी इस वोटबैंक में घुसपैठ की लगातार कोशिश कर रहे हैं. लेकिन भाजपा की हिंदुत्व छवि इस वोटबैंक में उसकी घुसपैठ में बड़ी बाधा है. भाजपा ने इनके मुकाबले में आदिवासी, दलित, हिंदुत्व और तृणमूल विरोधी समुदाय में प्रभाव विस्तार का मार्ग चुना है और उनके सहारे लगातार अपने प्रभाव और वोट प्रतिशत में विस्तार कर रही है. हालांकि ममता ने ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ का रास्ता अपना कर इनके मुकाबला का रास्ता अपनाया है.
दक्षिण बंगाल की राजनीति में मतुआ फैक्टर
बंगाल के सीमावर्ती इलाकों में बांग्लादेशी शरणार्थियों के संगठन मतुआ महासंघ का आविर्भाव बंगाल की भद्रलोक की राजनीति में दलित और जात-पात की राजनीति की दस्तक मानी जाती है.
तृणमूल ने सबसे पहले मतुआ संप्रदाय के महत्व को पहचाना और मतुआ महासंघ की प्रधान दिवंगत वीणापाणि देवी (बड़ो मां) के पुत्र मंजुल कृष्ण ठाकुर को सांसद बनाया. लेकिन पिछले चुनाव में भाजपा ने मंजुल कृष्ण ठाकुर को अपने पाले में करने में सफलता प्राप्त की थी.
बड़ो मां के बड़े बेटे दिवंगत कपिल कृष्ण ठाकुर की पत्‍‌नी ममता बाला ठाकुर सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस की सांसद हैं, जबकि छोटे बेटे मंजुल कृष्ण ठाकुर व उनके पुत्र शांतनु ठाकुर को भाजपा ने अपने खेमे में किया है. हाल में ‘बड़ो मां’ के निधन के बाद तृणमूल और भाजपा की बीच खींचतान स्पष्ट हो गयी है.
इस लोकसभा चुनाव के पहले मतुआ संप्रदाय के कांग्रेस के विधायक दुलाल बर भाजपा में शामिल हो गये हैं. इस चुनाव में मतुआ संप्रदाय की बहुलता वाले बनगांव लोकसभा केंद्र से तृणमूल ने ममता बाला ठाकुर को उम्मीदवार बनाया है, तो भाजपा ने उनके ही भतीजे शांतनु ठाकुर को उतारा है.
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