बढ़ती उम्र में भी बनी रहेगी आंखों की दृष्टि

आंखों की गिनती संवेदनशील अंगों में होती हैं, इसलिए उसे सहेजना बहुत जरूरी होता है. लेकिन वृद्धावस्था की ओर बढ़ते हुए आंखों में कई प्रकार की दिक्कतें आने लगती हैं. मगर अब वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने मिल कर एक ऐसी तकनीक का इजाद किया है, जो आंखों की दृष्टि को बेहतर करने में मदद करती […]
आंखों की गिनती संवेदनशील अंगों में होती हैं, इसलिए उसे सहेजना बहुत जरूरी होता है. लेकिन वृद्धावस्था की ओर बढ़ते हुए आंखों में कई प्रकार की दिक्कतें आने लगती हैं. मगर अब वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने मिल कर एक ऐसी तकनीक का इजाद किया है, जो आंखों की दृष्टि को बेहतर करने में मदद करती है.
बढ़ती उम्र के साथ आंखों की रोशनी कम होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है. पर इससे होनेवाली असुविधाएं जीवन को अस्त-व्यस्त कर देती हैं. साधारण चश्मों में उपयोग किये जानेवाले लेंस किसी हद तक उनकी मदद करते हैं, पर बारीक चीजों को देखना, लोगों के चेहरे पहचानना आदि मुश्किल ही बना रहता है. लेकिन वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने अब इस समस्या का हल निकाल लिया है. इस हल का नाम है टेलिस्कोपिक कॉन्टैक्ट लेंस (टीसीएल).
क्या है टीसीएल
टेलीस्कोपिक कॉन्टैक्ट लेंस, एक ऐसे प्रकार का लेंस है जो सामान्य से बारीक दृष्टि के बीच खुद को फैला लेता है और समेट सकता है. इसे अंतरराष्ट्रीय टीम द्वारा बनाया गया है. इसमें लिक्विड क्रिस्टल ग्लासेस को और रीफाइन करते हुए बनाया गया है. इस सिस्टम से रेटिनल समस्याओं से जूझ रहे लोगों को आराम मिलेगा. जैसे बढ़ती उम्र के कारण दृष्टि में विकार पैदा होना. इसे अंगरेजी में ऐज-रिलेटेड मैकुलर डीजेनेरेशन (एएमडी) कहते हैं.
क्या होता है एएमडी
एएमडी वह चिकित्सीय स्थिति है, जिसमें केंद्रीय दृष्टि (सेंट्रल विजन) की रोशनी धीरे-धीरे कम होती जाती है. ऐसा रेटीना के खराब होने के कारण होता है. इसके कारण पश्चिमी देशों में बढ़ती उम्र के व्यक्ति ज्यादा दृष्टिहीन हो रहे हैं. टेलीस्कोपिक कॉन्टैक्ट लेंस उन लोगों के लिए सबसे ज्यादा कारगर होता है, जिनका पेरीफेरल विजन तो सही है, पर उन्हें पढ़ने और चेहरों को पहचानने में दिक्कत होती है (इसे ब्लुरी विजन कहते हैं).
लगातार कर रहे हैं सुधार
इस लेंस पर काम करनेवाले स्विट्जरलैंड के इरिक ट्रेमब्ले कहते हैं कि वे इसे और ज्यादा रिफाइन करने पर जोर दे रहे हैं. फिलहाल इसे प्लास्टिक मैटेरियल से बनाया गया है, जिसे पॉलीमीथाइल मैथेक्राइलेट (पीएमएमए) कहते हैं. यह काफी मजबूत मैटेरियल है. लेकिन यह मैटेरियल कॉन्टैक्ट लेंस के लिए ज्यादा अच्छा नहीं है क्योंकि इसे लंबे समय तक पहना नहीं जा सकता है. अब हम इस लेंस को बनाने के लिए स्टैंडर्ड कॉन्टैक्ट लेंस के मैटेरियल का उपयोग कर रहे हैं, जो गैस-परमेएबल है. इसमें कॉर्निया को जरूरत भर की ऑक्सीजन आराम से मिलती है, जिसके चलते इस लेंस को लंबे समय तक पहना जा सकता है और आंखों की सुरक्षा की दृष्टि से भी यह बेहतर साबित होगा.
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