बच्चों के हितों को सुनिश्चित करें बड़े

Updated at : 22 Jun 2014 1:19 PM (IST)
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बच्चों के हितों को सुनिश्चित करें बड़े

मित्रों, अपने देश में बच्चों के समुचित विकास को लेकर केंद्र व राज्य सरकार की कई योजनाएं है. राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर बाल संरक्षण आयोग भी हैं, मंत्रलय, विभाग व नीतियां भी. सरकार की योजनाएं शिशुओं, बढ़ते बच्चों और किशोरों की शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए अलग-अलग नामों से संचालित होती हैं. ये […]

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मित्रों,

अपने देश में बच्चों के समुचित विकास को लेकर केंद्र व राज्य सरकार की कई योजनाएं है. राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर बाल संरक्षण आयोग भी हैं, मंत्रलय, विभाग व नीतियां भी. सरकार की योजनाएं शिशुओं, बढ़ते बच्चों और किशोरों की शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए अलग-अलग नामों से संचालित होती हैं. ये सभी योजनाएं एकीकृत बाल विकास सेवा योजना, बच्चों की राष्ट्रीय नीति और बच्चों के राष्ट्रीय चार्टर के तहत कार्यान्वित हैं. बच्चों की इन योजनाओं में मध्याह्न् भोजन, किशोर न्याय योजना और बच्चों के यौन शोषण से सुरक्षा की योजना के अलावा बालिकाओं के लिए विशेष रूप से किशोरी शक्ति योजना और बालिका समृद्धि योजना शामिल है. शिशुओं के लिए भी विशेष रूप से पोषण की योजना और दत्तक योजना चलायी जा रही है. समन्वित बाल सांक्षण योजना भी है. हम इस अंक में इन योजनाओं की चर्चा कर रहे हैं.

आरके नीरद

किशोर न्याय अधिनियम, 2000
देश में किशोर न्याय अधिनियम, 2000 लागू है. यह पहले से लागू किशोर न्याय अधिनियम, 1986 के स्थान पर आया है. इसने बच्चे की नयी परिषाभा गढ़ी है. इसके मुताबिक एक अप्रैल, 2001 से बिना भेदभाव के 18 साल से कम उम्र के सभी लड़के और लड़कियां बच्च हैं. इस कानून में 2006 में फिर संशोधन हुआ और यौन शोषण से बच्चों की सुरक्षा, सूखा व अकालग्रस्त इलाकों के बच्चों पर नजर तथा प्राकृतिक आपदा से प्रभावित बच्चों समेत सभी के पुनर्वास और उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ना इस कानून का मकसद बनाया गया. पीड़ित बच्चों और उनके परिवार का मनोवैज्ञानिक और आर्थिक पुनर्वास करके उन्हें आश्रय उपलब्ध कराना भी इसमें शामिल है.

किशोरी शक्ति योजना
किशोरी शक्ति योजना किशोर उम्र की लड़कियों को सक्षम बनाने के लिए शुरू की गयी है, ताकि वो अपने जीवन को दिशा दे सकें. यह केंद्र प्रायोजित ‘एकीकृत बाल विकास सेवा योजना’ यानी आइसीडीएस के तहत संचालित है. इसमें 11 से 18 वर्ष तक की बालिकाओं को शामिल किया गया है. इसके तहत किशोरियों को अपनी क्षमताओं का उपयोग करने के अवसर दिये जाते हैं. यह पहले से चल रही किशोरवय बालिका योजना का संशोधित स्वरूप है. इसका उद्देश्य किशोरियों में पोषण, स्वास्थ्य विकास, शिक्षा, कुशलता प्राप्त करना, जीवनशैली में सुधार और समाज के लिए एक उत्पादक सदस्य के रूप में उभरने की दिशा तय करना है.

राजीव गांधी राष्ट्रीय कैच स्कीम
कामकाजी महिलाओं के बच्चों को सुरक्षा और पोषण देने के लिए सरकार ने राजीव गांधी राष्ट्रीय कैच स्कीम की शुरुआत की है. बच्चों की राष्ट्रीय नीति 1994, शिक्षा की राष्ट्रीय नीति 1986 और महिला सशक्तीकरण की राष्ट्रीय नीति और बच्चों के लिए राष्ट्रीय क्रियान्वयन योजना 2005 में इस पर जोर दिया गया है. इसमें शून्य से छह साल तक के उन बच्चों के लिए सरकार की तरफ से मुफ्त सुविधाएं दी जाती है, जिनके अभिभावकों की कुल मासिक आय 12,000 से कम होती है.

सेंट्रल अडॉप्शन रिसोर्स एजेंसी
बेघर बच्चे को एक घर और परिवार मिल सके. महिला एवं बाल विकास विभाग के अधीन इस योजना को 1990 में कल्याण मंत्रलय ने शुरू किया था जो 1999 में एक स्वायत्तशासी संस्था बन गयी. सीएआरए यानी कारा को बाद में एमडब्ल्यूसीडी में स्थानांतरिक कर दिया गया. इस योजना में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अडॉप्शन के प्रावधान है.

बंधुआ और शोषित बच्चों की मुक्ति योजना
केंद्र सरकार ने बंधुआ और शोषित बच्चों को मुक्त कराने की भी योजना चलायी है. यह योजना 1998-99 में शुरू की गययी. इसेा मकसद बच्चों को शोषण से मुक्त कराना, उन्हें उनका मौलिक अधिकार दिलाना तथा उनके पुनर्वास के लिए काम करना है. इसके लिए एक फोन नंबर तय किया है. वह है 1098. इस पर कोई भी व्यक्ति ऐसे बच्चे के बारे में जानकारी दे सकता है. इस सूचना पर सरकार और निजी संगठन सक्रिय होते है.

एकीकृत बाल विकास सेवा योजना
एकीकृत बाल विकास सेवा बाल विकास की सबसे व्यापक योजना हैं. 1975 में स्थापित और महिला एवं बाल विकास मंत्रलय के अधीन चल रही यह योजना राष्ट्रीय बाल नीति के तहत काम करती है. इसका लक्ष्य वे बच्चे हैं जो जनजातीय, ग्रामीण, झोपड़पट्टी क्षेत्रों में रहते हैं. योजना के तहत उनके समुचित विकास पर नजर रखी जाती है.

राष्ट्रीय बाल नीति
राष्ट्रीय बाल नीति यह सुनिश्चित करती है कि केंद्रीय योजनाओं के अलावा, राज्य भी बच्चों को पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध कराएं. इसमें जन्म से पहले, जन्म के बाद और विकसित होते बच्चे शामिल है. इसमें बच्चों के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास पर जोर दिया जाता है.

किशोरियों के लिए पोषण कार्यक्रम
बालिका समृद्धि योजना और किशोरी शक्ति योजना के अलावा भी बालिकाओं के लिए कई अन्य कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं. इनमें किशोरवय लड़कियों में कुपोषण की समस्या से निपटने और गर्भवती महिलाओं के साथ-साथ दूध पिलाने वाली माओं के लिए 2002-03 में योजनाएं आयोग ने किशोरियों के लिए पोषण कार्यक्रम एनपीएजी की शुरुआत में बालिकाओं और गर्भवती महिलाओं को छह किलो अनाज दिया जाता था. बाद में इसे महिला एवं बाल विकास विभाग के अधीन दे दिया गया लेकिन आइसीडीएस के तहत जाने के बाद इस योजना के गर्भवती महिलाओं और मांओं को हटा दिया गया. अब इस योजना का सारा फोकस 11 से 19 साल की उन लड़कियों पर है, जिनका वजन 35 किलों से कम है.

शिशु पोषण योजना
शिशु पोषण योजना के तहत नवजात बच्चों के पोषण और विकास के कार्यक्रम चलाये जाते हैं. निकाय क्षेत्रों से लेकर सुदूर गांवों तक विभिन्न सरकारी संस्थाओं के माध्यम से यह अभियान चलाया जाता है. इसके तहत छोटे बच्चों को जन्म से अगले छह माह तक हर परिस्थिति में स्तनपान कराना सुनिश्चित किया जाता है. मांओं के बीच यह जागरूकता फैलायी जाती है कि ऊपरी दूध के साथ भी दो साल तक स्तनपान जारी रखा जाय. इसका उद्देश्य बच्चे के शुरुआती विकास में सभी तरह के पोषक तत्व शामिल करना है. स्वास्थ्य विज्ञान के अनुसार मां के दूध में वे सारे तत्व पाये जाते है, जो शिशु के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए आवश्यक होते हैं. 1993 में लागू की गयी राष्ट्रीय पोषण नीति के तहत महिला एवं बाल विकास विभाग इसके संचालन के लिए जिम्मेदार है.

बेघर बच्चों के लिए एकीकृत कार्यक्रम
इस कार्यक्रम का उद्देश्य बेघर बच्चों को आश्र्य देना,पोषक भोजन उपलब्ध कराना, उनके स्वास्थ्य की देखभाल, शिक्षा के साथ-साथ मनोरंजन उपलब्ध कराना है. कार्यक्रम के तहत बच्चों को उत्पीड़न और यौन शोषण से बचने के लिए उपाय सुविश्चित किए जाते हैं. इस योजना का लक्ष्य आमतौर पर ऐसे बच्चे हैं जिन्हें आसानी से प्रताड़ित या शोषित किया जा सकता है. जैसे कि सड़कों पर निवास करने वाले बेघर बच्चे हैं. योजना के तहत बच्चों को अनौपचारिक शिक्षा उपलब्ध कराने और बेघर बच्चों को उनके परिवार के साथ जोड़ने जैसे कार्यक्रम चलाये जाते हैं. इन बच्चों को छात्रवासों और आवासीय स्कूलों में नामांकित कराया जाता है. या फिर व्यावसायिक संस्थाओं से जोड़ा जाता है.

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