महिलाओं का संबल बने दो महिला समूह

Updated at : 22 Jun 2014 1:05 PM (IST)
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महिलाओं का संबल बने दो महिला समूह

रांची जिले के बेड़ो प्रखंड की चंपू उराइन, सविता देवी, कमला देवी, जीतन उराइन, सन्नु देवी, चिंता देवी, दुग्गी उराइन, बतिया उराइन, लीला देवी, बरिया लकड़ा व बुधनी उराइन जैसी महिलाओं को अपनी जिंदगी में उम्मीद की नयी किरण दिख रही है. अब वे पहले की तरह निराश नहीं हैं और वे इस ऊहापोह में […]

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रांची जिले के बेड़ो प्रखंड की चंपू उराइन, सविता देवी, कमला देवी, जीतन उराइन, सन्नु देवी, चिंता देवी, दुग्गी उराइन, बतिया उराइन, लीला देवी, बरिया लकड़ा व बुधनी उराइन जैसी महिलाओं को अपनी जिंदगी में उम्मीद की नयी किरण दिख रही है. अब वे पहले की तरह निराश नहीं हैं और वे इस ऊहापोह में नहीं हैं कि उन्हें क्या करना है या क्या नहीं. उनके सामने एक स्पष्ट सोच है.

दरअसल खुखरा पंचायत के सरदाबाड़ी गांव की महिलाओं की जिंदगी में उम्मीद की इस किरण का नाम है : मां संतोषी महिला किसान समूह व गुलाब महिला किसान समूह. आमतौर पर महिला समूहों में किसान शब्द नहीं जुड़ता है, क्योंकि खेती के कार्य में लगे होने के बाद भी उन्हें पुरुषों की तरह किसान का दर्जा प्राप्त नहीं है. लेकिन धान फाउंडेशन नामक स्वयंसेवी संस्था की पहल पर यह समूह महिला किसान समूह के रूप में ही गठित की गयी है. इस समूह से जुड़ी महिलाएं कृषि कार्य में सक्रिय योगदान देती हैं.

गुलाब महिला समूह की अध्यक्ष हैं पोलिना लकड़ा. जबकि नैना देवी मां संतोषी महिला किसान समूह की अध्यक्ष हैं. इस समूह की सचिव हैं रुक्की देवी. डेढ़ साल पहले इस समूह का गठन हुआ था. मां संतोषी महिला किसान समूह से 13 महिलाएं तो गुलाब महिला किसान समूह से 14 महिलाएं जुड़ी हैं. समूह से जुड़ी महिलाएं हर महीने 105 रुपये जमा करती हैं. पहले यह राशि 65 रुपये थी. पर समूह की गतिशीलता व महिलाओं को हो रहे लाभ को देखते हुए जमा की जाने वाली राशि बढ़ा दी गयी. समूह से जुड़ी कोई भी महिला सदस्य दो प्रतिशत मासिक ब्याज पर कर्ज ले सकती हैं और पैसे होने पर उसे वापस करना होता है.

समूह से जुड़ी कौशल्या देवी बताती हैं कि सूद पर बाहर वाले को हम पैसे नहीं देते हैं. इस सवाल पर कि क्यों नहीं आप उन्हें भी समूह से जोड़ लेती हैं, कौशल्या कहती हैं : वे समूह से नहीं जुड़ना चाहती हैं, कई बार इसका कारण पैसे की कमी भी होती है. हालांकि राजंती उराइन कहती हैं कि जो महिला इस समूह के महत्व को समझ जायेगी, वह खुद ब खुद समूह से जुड़ जायेगी. समूह की अध्यक्ष पौलीना लकड़ा कहती हैं कि अगर उन्हें कुछ पैसे मिलेंगे, तो वह अपनी पति की साइकिल मरम्मत की दुकान को और आगे बढ़ायेंगी.

समूह ने दी उम्मीदों को उड़ान
इन दोनों स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाएं इसके लाभ से खुश व उत्साहित हैं. समूह ने उनकी उम्मीदों को उड़ान दे दी है. मैना कहती हैं कि वह भविष्य में समूह से कर्ज लेकर अपने लिए एक सिलाई केंद्र शुरू करना चाहती हैं. वहीं, कौशल्या मनिहारी की एक दुकान खोलना चाहती हैं. निजी व्यापार करने की उम्मीद लगायी महिलाओं से अलग कुछ ऐसी भी महिलाएं हैं, जो अपने घर-परिवार व जीवन को पटरी पर समूह के माध्यम से लाना चाहती हैं. जैसे मरियम चाहती हैं कि वे समूह से कुछ पैसे उधार लेकर अपने घर की मरम्मत करायें. उत्साही मरियम के लिए अपने व्यापार के कुछ अनुभव निराश करने वाले रहे हैं. जैसे उन्होंने समूह से पांच हजार रुपये कर्ज लेकर 40 बत्तख पालना शुरू किया व तीन हजार लेकर मुर्गी पालन शुरू किया. लेकिन बत्तख व मुरगी के बीमारी के कारण मर जाने के कारण उन्हें आर्थिक नुकसान ङोलना पड़ा. लेकिन इसके बावजूद उनका उत्साह कम नहीं हुआ है और भविष्य में नास्ते की एक बेहतर दुकान नजदीकी बाजार में वे अपने लिए खोलना चाहती हैं. कई महिलाओं ने बच्चों की पढ़ाई, उनका स्कूल ड्रेस खरीदने के लिए समूह से पैसे लिये, तो कुछ महिलाओं ने शादी में शामिल होने के लिए भी समूह से कर्ज लिये. इन समूहों से जुड़ी महिलाओं ने आत्मनिर्भरता की दिशा में दो कदम तो बढ़ा दिये हैं.

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