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नयी किताब : साझी संस्कृति के पक्ष में

Updated at : 07 Oct 2018 4:46 AM (IST)
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नयी किताब : साझी संस्कृति के पक्ष में

देश में लोकतांत्रिक, प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष लोगों ने हमेशा ही भेदभाव और सांप्रदायिकता की चुनौतियों का सामना किया और साझी संस्कृति के पक्ष में आवाज उठायी. ऐसी ही आवाज का नाम असगर वजाहत है. वरिष्ठ लेखक दुर्गाप्रसाद अग्रवाल के संपादन में बाबा हिरदाराम पुस्तक सेवा समिति, जयपुर से प्रकाशित असगर वजाहत की पुस्तक ‘हिंदू पानी-मुस्लिम […]

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देश में लोकतांत्रिक, प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष लोगों ने हमेशा ही भेदभाव और सांप्रदायिकता की चुनौतियों का सामना किया और साझी संस्कृति के पक्ष में आवाज उठायी. ऐसी ही आवाज का नाम असगर वजाहत है. वरिष्ठ लेखक दुर्गाप्रसाद अग्रवाल के संपादन में बाबा हिरदाराम पुस्तक सेवा समिति, जयपुर से प्रकाशित असगर वजाहत की पुस्तक ‘हिंदू पानी-मुस्लिम पानी’ में हमें यह आवाज बुलंदी से सुनायी देती है.
हिंदू-मुस्लिम भेदभाव और सांप्रदायिकता की समस्या हमारे देश और समाज की सबसे जटिल समस्या है. यह औपनिवेशिक काल में पनपी समस्या है. यहां हिंदू-मुसलमान सदियों से साथ रहते आये हैं और अपने अलग-अलग धार्मिक विश्वासों के बावजूद दोनों समुदाय के लोगों का जीवन आपसी तालमेल से चलता रहा है. मध्यकाल के कई शासकों ने इस तालमेल को तोड़ने की कोशिश की, लेकिन कामयाब नहीं हुए. अंग्रेजों ने ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति लागू कर दोनों समुदायों में अविश्वास पैदा कर दिया. समय के साथ दोनों में अलगाव की खाई बढ़ती गयी और देश का विभाजन हो गया. यह विभाजन केवल भौगोलिक नहीं था, बल्कि हिंदू-मुसलमानों की एकता और साझी संस्कृति का विभाजन था. विभाजन के बाद भी अलगाव और सांप्रदायिकता खत्म नहीं हुई, बल्कि नये मिथकों और अफवाहों के साथ नये रूपों में हमारे सामने आती रही.
असगर वजाहत मानते हैं कि सत्ता पाने का सबसे आसान रास्ता सांप्रदायिकता है. इसलिए विभाजन के बाद भारत-पाकिस्तान में सांप्रदायिकता खत्म नहीं हुई. इस पुस्तक में शामिल सात वैचारिक लेखों और अठारह कहानियों के माध्यम से लेखक प्रभावी शैली और आकर्षक भाषा में पाठकों के समक्ष हिंदुओं और मुसलमानों के आपसी संबंधों के अंतर्द्वंद्वों को रेखांकित करते हैं. गुरु-चेला संवाद, सारी तालीमात, जख्म, मुश्किल काम, मैं हिंदू हूं, शाह आलम कैंप की रूहें, दुश्मन-दोस्त आदि कहानियां अपने प्रभावी व अर्थपूर्ण संवादों के कारण मार्मिक बन पड़ी हैं.
वैचारिक लेखों में सांप्रदायिकता के साथ-साथ राजनीति, आतंकवाद, संस्कृति, धर्म, जाति जैसे ज्वलंत मुद्दों को वे उठाते हैं और उस पर अपनी बेबाक राय देते हैं. असगर वजाहत का पल्लव के साथ साक्षात्कार इस पुस्तक का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो सांप्रदायिक समस्या, राजनीति, साझी संस्कृति के साथ-साथ साहित्य और संस्कृति के मुद्दों पर केंद्रित है. पूरी उम्मीद है कि यह किताब पाठकों की चेतना को संपन्न बनायेगी.
– गणपत तेली
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