अनुच्छेद 370 : सावधानी की जरूरत

Updated at : 05 Jun 2014 5:30 AM (IST)
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अनुच्छेद 370 : सावधानी की जरूरत

।। शुजात बुखारी।। (एडिटर, राइजिंग कश्मीर) ऐसे समय में, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को आमंत्रित कर बहुत से लोगों को आश्चर्यचकित कर दिया और अपने प्रधानमंत्री बनने परकश्मीर के अलगाववादी नेताओं के एक वर्ग को सावधानीपूर्ण आशावाद के साथ प्रतिक्रिया देने पर विवश कर दिया, […]

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।। शुजात बुखारी।।

(एडिटर, राइजिंग कश्मीर)

ऐसे समय में, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को आमंत्रित कर बहुत से लोगों को आश्चर्यचकित कर दिया और अपने प्रधानमंत्री बनने परकश्मीर के अलगाववादी नेताओं के एक वर्ग को सावधानीपूर्ण आशावाद के साथ प्रतिक्रिया देने पर विवश कर दिया, प्रधानमंत्री के कार्यालय से कुछ अलग ही बात उठ गयी. पहली बार सांसद बने और प्रधानमंत्री कार्यालय में नवनियुक्त राज्यमंत्री डॉ जीतेंद्र सिंह ने अनुच्छेद 370 जैसे संवेदनशील एवं विवादास्पद मुद्दे को छेड़ते हुए मोदी का संदर्भ देकर ‘संबद्ध पक्षों’ के बीच कथित बातचीत का राग अलाप दिया. बाद में उन्होंने अपने बयान पर सफाई दी, लेकिन राज्य की प्रमुख पार्टियों- नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी- और कांग्रेस ने भी मंत्री के ‘गैरजिम्मेदाराना’ रवैये पर तगड़ा विरोध जताया.

भारतीय संघ और जम्मू-कश्मीर के बीच विशेष संबंध स्थापित करनेवाले इस अनुच्छेद को हटाने की भाजपा की मांग पुरानी है, लेकिन वाजपेयी सरकार के दौरान इस मुद्दे को हाशिये पर डाल दिया गया था और उन्होंने कश्मीर के विवादित मसले को सुलझाने के लिए बहुत प्रयास किये थे. मोदी ने भी उनकी विरासत का जिक्र करते हुए जम्मू के हीरा नगर में एक चुनावी सभा में कहा था कि वे वाजपेयी के रास्ते पर चलते हुए ‘इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत’ के दायरे में ही कश्मीर मुद्दे पर काम करेंगे. इससे पहले जम्मू में उन्होंने ‘अनुच्छेद 370’ के फायदे और नुकसान पर बहस की बात कही थी.

ऐसा नहीं है कि ‘आजादी’ की मांग कर रहे लोगों के लिए ‘अनुच्छेद 370’ कोई आस्था का प्रतीक है, लेकिन यह अब भी विशिष्टता की भावना पैदा करता है. इस अनुच्छेद के द्वारा भारतीय संविधान जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा प्रदान करता है. यह इस राज्य के प्रति किसी अनुग्रह का परिणाम नहीं है. राज्य की स्थिति का निर्धारण होना अभी बाकी है. इस बात को तीन हिस्सों में समझा जा सकता है.

उत्पत्ति : कश्मीर के लोग 1586 से ही अपने शासकों के उत्पीड़न का शिकार रहे हैं, जब मुगल बादशाह अकबर ने इस पर कब्जा कर लिया था. तब से कश्मीरी बेबसी के भाव के साथ जीते आये हैं और उन्हें हमेशा इस बात का भय रहा है कि विदेशी हमले उनकी सांस्कृतिक और भाषायी पहचान को नुकसान पहुंचा सकते हैं. 1947 में महाराजा हरी सिंह ने कश्मीर के सबसे बड़े नेता शेख अब्दुल्ला के सहयोग से भारत में विलय का निर्णय किया था, तब यह भारत के विभाजन के लिए अपनाये गये तौर-तरीके से बिल्कुल उलट था. मुसलिमों के बहुमत वाला राज्य होने के बावजूद इसने भारत में विलय का निर्णय किया था और विलय-प्रक्रिया में इस विशिष्टता का ध्यान रखा गया था.

‘अनुच्छेद 370’ यहां के लोगों की विशिष्ट पहचान का रेखांकन था और इस व्यवस्था का उद्देश्य उनकी सांस्कृतिक और भाषायी पहचान की रक्षा करना था. प्रसिद्ध संविधानविद एजी नूरानी ने अपनी किताब ‘आर्टिकल 370’ में लिखा है कि जम्मू-कश्मीर एकमात्र राज्य था, जिसने भारतीय संघ के साथ अपने संबंधों पर मोल-भाव किया था. यह अलग बात है कि नेहरू से लेकर अब तक के शासकों ने राज्य की विशिष्टता को बरकरार रखने के वादे को नहीं निभाया है. इस कारण भारतीय राजनीतिक तंत्र और उसके प्रजातंत्र से आम कश्मीरी का भरोसा उठता गया, जो कश्मीर में हिंसक विद्रोह का एक कारण बना. कश्मीरियों ने खुद को ठगा हुआ महसूस किया, क्योंकि सिर्फ तीन बातों पर ही यह विलय हुआ था और संयुक्त राष्ट्र में देश के पहले प्रधानमंत्री ने जनमत संग्रह का वादा भी किया था.

आज यह अनुच्छेद बेमानी हो चुका है, लेकिन इसका मनोवैज्ञानिक महत्व बरकरार है. कश्मीरियों के भरोसे को पहला झटका 1953 में लगा, जब राज्य के तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला की सरकार को गैरकानूनी तरीके से बर्खास्त कर दिया गया. यह अनुच्छेद 370 से मिली स्वायत्तता को कमजोर करने के लिए किया गया था. इसके बाद संविधान के कई अनुच्छेदों के साथ संघीय सूची के 98 में से 94 व्यवस्थाओं को राज्य में लागू कर दिया गया, जिसमें नौसेना से संबंधित कायदे भी हैं, जिसका राज्य से कोई लेना-देना नहीं है. अनुच्छेद 249 को भी इस राज्य पर लागू कर दिया गया, जिसके अनुसार संसद साधारण स्थिति में भी राज्य से संबंधित कोई कानून बना सकती है. यह सब राज्यपाल के अंतर्गत हुआ और संसद को दिये गये अंतरिम अधिकार अब भी प्रयोग में हैं, जबकि 1956 में जम्मू-कश्मीर संविधान सभा द्वारा राज्य के संविधान को स्वीकृत किये जाने के साथ ही यह अंतरिम अधिकार समाप्त हो जाना चहिए था.

गलत सूचना : इस मुद्दे पर अनेक गलत सूचनाएं भी फैलायी जा रही हैं, जिनमें कुछ इस प्रकार हैं. पहला, कोई बाहरी व्यक्ति राज्य में जमीन नहीं खरीद सकता है. इस बात का इस अनुच्छेद से कोई लेना-देना नहीं है. राज्य-विषयक यह नियम डोगरा शासकों द्वारा 1927 में पारित किया गया था. दूसरा, राज्य सर्वोच्च न्यायालय के अधिकार-क्षेत्र में नहीं है. सच यह है कि ऐसा नहीं है और राज्य उच्च न्यायालय के न्यायाधीश राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय की सलाह से ही नियुक्त होते हैं. तीसरी अफवाह नागरिकता से संबंधित है. नागरिकता से संबंधित भारतीय कानून ही जम्मू-कश्मीर में लागू होते हैं. चौथी अफवाह यह है कि तिरंगे झंडे का अपमान करनेवाले लोगों के खिलाफ कारवाई नहीं की जाती है, क्योंकि राज्य का अपना झंडा है. हकीकत यह है कि तिरंगे का अपमान करनेवाले कई लोगों के खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा दर्ज किया गया है.

क्या सरकार इसे हटा सकती है : इसका सीधा जवाब है-नहीं. इस अनुच्छेद को हटाने से पहले अनुच्छेद 368 में संशोधन करना होगा, लेकिन राज्य की संविधान सभा की मंजूरी के बिना यह मान्य नहीं हो सकता है, जो अभी अस्तित्व में नहीं है. अगर राज्य का संविधान रद्द हो जाता है, तो हमें विलय के दस्तावेज के पास जाना होगा, जो रक्षा, संचार और विदेश मामलों में ही केंद्र को अधिकार देता है. कश्मीरियों के लिए यह आदर्श स्थिति होगी, जो मसले का स्थायी हल चाहते हैं.

कुल मिला कर कश्मीर पर नयी सरकार की शुरुआत निराशाजनक है. सरकार को ‘एक विधान, एक निशान, एक प्रधान’ के नारे को छोड़ कर नयी सोच और पहल के साथ इस मसले के समाधान की कोशिश करनी होगी.

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