सिंघल मामलाः 'हो सकता है नियम बदल गए हों'

सलमान रावी बीबीसी संवाददाता, दिल्ली गुजरात में वर्ष 2004 में हुए इशरत जहां मुठभेड़ मामले में अभियुक्त आईपीएस अधिकारी जीएल सिंघल को बहाल कर दिया गया है. उनकी बहाली पर भारतीय पुलिस सेवा के कई वरिष्ठ अधिकारियों की मिली-जुली प्रतिक्रिया सामने आई है. कुछ उनका निलंबन ख़त्म करने का समर्थन नहीं करते जबकि कुछ का […]
गुजरात में वर्ष 2004 में हुए इशरत जहां मुठभेड़ मामले में अभियुक्त आईपीएस अधिकारी जीएल सिंघल को बहाल कर दिया गया है.
उनकी बहाली पर भारतीय पुलिस सेवा के कई वरिष्ठ अधिकारियों की मिली-जुली प्रतिक्रिया सामने आई है. कुछ उनका निलंबन ख़त्म करने का समर्थन नहीं करते जबकि कुछ का कहना है कि किसी भी सरकारी कर्मचारी या अधिकारी को लंबे समय तक के लिए निलंबित नहीं रखा जा सकता.
बीबीसी संवाददाता सलमान रावी ने कुछ प्रमुख वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से बात की.
जूलियो एफ़ रिबेरियो, मुंबई के पूर्व पुलिस आयुक्त
ऐसा पहले नहीं होता था, कोई पुलिस अधिकारी अगर किसी आपराधिक मामले में अभियुक्त बनाया गया हो और जेल गया हो तो उसका निलंबन तब तक ख़त्म नहीं होता था जब तक अदालत से वह बरी न हो जाए. यह मैं नया चलन देख रहा हूँ.
ऐसा तब तक नहीं हो सकता जब तक आप नियमों को बदल नहीं देते हैं. मुझे लगता है कि नियमों को बदल दिया गया है. अगर आप गिरफ़्तार किए जाते हैं या जेल जाते हैं तो फिर अपने पद पर कैसे बहाल हो सकते हैं?
आपको तो पूरी क़ानूनी प्रक्रिया से गुज़रना होगा और मुक़दमे का सामना करना होगा. अगर अदालत मामले से बरी कर देती है तब जाकर अपने पद पर जाया जा सकता है.
यह सब कुछ नया है. मैंने पहले ऐसा नहीं सुना था.
मैंने गुजरात के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) की वो चिट्ठी पढ़ी है, जिसमें उन्होंने कहा है कि ऐसा नियमों के अनुसार किया गया है. मुझे नहीं पता कि एसके नंदा किस नियम का हवाला दे रहे हैं.
सेवा की नियमावली जो सभी सरकारी विभागों के कर्मचारियों के लिए हैं, साफ़ कहती है कि अगर किसी सरकारी मुलाज़िम को किसी आपराधिक मामले में पकड़ा जाता है तो तब तक उन्हें बहाल नहीं किया जा सकता जब तक अदालत उन्हें निर्दोष न क़रार दे दे.
ज़मानत पर जेल से बाहर आने का मतलब यह नहीं है कि उन्हें बरी कर दिया गया है. यह भी सच है कि आजकल कई चीज़ें राजनीतिक दबाव में भी की जाती हैं, नियमों के अनुरूप नहीं.
प्रकाश सिंह, उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक
निलंबन कोई सज़ा नहीं है. देखिए, कभी-कभी सरकारी मुलाज़िम को निलंबित किया जाता है ताकि जांच बिना किसी दबाव के पूरी की जा सके.
सामान्य तौर पर देखा गया है कि किसी अधिकारी को निलंबित कर दिया गया है और निलंबित हुए काफ़ी समय बीत चुका है तो उन्हें बहाल किया जा सकता है. विभागीय कार्रवाई तो फिर भी जारी रखी जा सकती है. यह भी समझा जाता है कि किसी मुलाज़िम को एक साल या दो साल तक निलंबित नहीं रखा जा सकता है. इसे ठीक नहीं समझा जाता है.
अधिकारी अपना काम करे और हां, उसके ख़िलाफ़ जो सबूत हैं, तो जांच भी चलती रह सकती है.
फिर जांच के बाद जो सज़ा निर्धारित हो, वह मिले. किसी मुलाज़िम को सामान्यतः लंबे समय तक निलंबित नहीं रखा जाता. अगर उसके बहाल होने से जांच या विभागीय कार्रवाई पर असर नहीं पड़ता है, तो ऐसा किया जा सकता है.
हालांकि यह अंदेशा रहता है कि बहाल होने से जांच प्रभावित हो सकती है. अगर ऐसा लगता है तो फिर बहाल नहीं किया जाना चाहिए. सिंघल के मामले में यह सब क्या सोच कर किया गया, यह तो मुझे पता नहीं. लेकिन मुझे लगता है कि वह लम्बे अरसे से निलंबित थे इसलिए ऐसा किया गया होगा.
मुझे मामले की उतनी जानकारी तो नहीं है लेकिन इस मामले में कई अधिकारियों को निलंबित किया गया है. मुझे पता चला है कि कई अच्छे अधिकारी भी निलंबित किए गए हैं.
वैसे जब क़ानूनी कार्रवाई चल ही रही है, जब विभागीय कार्रवाई चल ही रही है, तो अगर वह दोषी पाये जाते हैं तो सज़ा मिले. लम्बे अरसे तक निलंबित क्यों रखा जाए?
वेद मारवाह, दिल्ली के पूर्व पुलिस आयुक्त
कमाल की बात है कि जीएल सिंघल तो सरकार के ख़िलाफ़ हो गए थे, जहाँ तक मेरी जानकारी है. उन्होंने जांच के दौरान कई महत्वपूर्ण सबूत सरकार के ख़िलाफ़ जांचकर्ताओं को उपलब्ध कराए थे. मैंने अख़बार में पढ़ा है कि सिंघल ने तो नरेंद्र मोदी और अमित शाह तक के ख़िलाफ़ सबूत उपलब्ध कराए हैं.
हक़ीक़त क्या है, मुझे पता नहीं.
लेकिन हर मामले को उसके विशेष संदर्भ में देखना चाहिए. ऐसा भी नहीं है कि हर मामले में, जिसकी जांच चल रही हो, उस अधिकारी या मुलाज़िम को निलंबित ही कर देना चाहिए. अब जांच के दौरान जेल जाने की वजह से निलंबन हो यह ज़रूरी भी नहीं है. हाँ, अलबत्ता अगर सज़ा सुना दी जाए तो फिर नौकरी से निकालने की प्रक्रिया शुरू कर देनी चाहिए.
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