जहां खेतों और खुले मैदानों में हीरे तलाशते हैं लोग

Updated at : 04 Aug 2018 12:12 PM (IST)
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जहां खेतों और खुले मैदानों में हीरे तलाशते हैं लोग

मानसून आने के साथ ही आंध्र प्रदेश के करनूल और अनंतपुर ज़िले के गांवों में हीरे की तलाश तेज़ हो जाती है. आंध्र प्रदेश का रायलसीमा क्षेत्र ‘हीरे की धरती’ के तौर पर जाना जाता है क्योंकि यहां की ज़मीन में बहुत बड़ी मात्रा में खनिज पाए जाते हैं. जीएसआई अधिकारियों का कहना है कि […]

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मानसून आने के साथ ही आंध्र प्रदेश के करनूल और अनंतपुर ज़िले के गांवों में हीरे की तलाश तेज़ हो जाती है.

आंध्र प्रदेश का रायलसीमा क्षेत्र ‘हीरे की धरती’ के तौर पर जाना जाता है क्योंकि यहां की ज़मीन में बहुत बड़ी मात्रा में खनिज पाए जाते हैं.

जीएसआई अधिकारियों का कहना है कि वजराकरूर, जोन्नागिरी, पाग दी राई, पेरावली, तुग्गाली जैसे इलाक़ों को हीरे का खजाना माना जाता है.

आसपास और पड़ोसी राज्यों के लोग यहां हीरों की तलाश में आते हैं. ये ​लोग बिना किसी तकनीकी जानकारी के भी यहां हीरे ढूंढने में जुटे रहते हैं.

बीबीसी ने अनंतपुर ज़िले के गांवों में उन लोगों से बात की जो खुले मैदानों और खेतों में हीरे की खोज कर रहे थे.

एक दैनिक मजदूर जेहराबी ने बताया, ‘यहां हीरा मिलने की उम्मीद में हम अपनी दैनिक मजदूरी छोड़कर आते हैं. हमें अभी तक कुछ नहीं मिला है. हम कल दोपहर तक ढूंढेंगे और अगर नहीं मिलता तो वापस लौट जाएंगे.’

वहीं गुंटूर से हीरे की तलाश में आए एक और शख़्स बालू नाईक बताते हैं कि पिछले साल उनके एक जान पहचान वाले व्यक्ति को एक हीरा मिला था इसलिए वो भी इस बार अपनी क़िस्मत आज़माने आए हैं.

कैसे ढूंढते हैं हीरा

हालांकि, यहां हीरे की तलाश में आने वाले लोगों के पास इस ढूंढने के लिए कोई तकनीकी या ​वैज्ञानिक जानकारी नहीं होती. वो ऐसे पत्थर उठा कर अपने बैग में रख लेते हैं जो उन्हें कुछ अलग लगते हैं.

लेकिन, किस जगह पर हीरे की तलाश करनी है ये कैसे तय किया जाता है. इस बारे में वन्नुरुसा बताते हैं कि ज़मान पर पड़ने वाली सूरज या चांद की किरणों के प्रतिबिंब आधार पर वो हीरे ढूंढने के लिए जगह का चुनाव करते हैं.

कार्बन डाइऑक्साइड कहलाने वाला एक पत्थर दिखाते हुए वो कहते हैं कि इस तरह का पत्थर जहां भी मिलता है वहां हीरे पाए जाते हैं. इसलिए हम उसी इलाके आसपास हीरे खोजते हैं.

वो ये भी बताते हैं कि इस पत्थर के आधार पर ही अंग्रेजों ने यहां हीरों की खुदाई की थी.

उन्हें भी ​यहां पहले एक छोटा हीरा मिल चुका है और वो आगे भी मिलने की उम्मीद में ढूंढ रहे हैं.

क्या होता है हीरे का

हीरा खोज रहे एक गांव वाले ने बताया कि हीरा मिलने के बाद ये लोग उसे बिचौलिये को देते हें जो उन्हें हीरे की कीमत का छोटा सा हिस्सा मेहनताने के तौर पर दे देता है.

इस इलाके में हीरे मिलने को लेकर कई तरह की कहानियां भी सुनने को मिलती हैं.

इतिहास की बात करें तो श्री कृष्णा देवराया के शासन में व्यापारी हीरों और कीमती पत्थरों को खुले बाजार में बेचा करते थे.

लोग कहते हैं कि आगे चलकर साम्राज्यों के पतन, प्राकृतिक आपदाओं और युद्धों के बाद ये सभी संसाधन खो गए लेकिन अब बारिश होने पर वो सतह पर दिखाई देते हैं.

जिओलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के उप निदेशक राजा बाबू कहते हैं, ‘आंध्र प्रदेश में करनूल व अनंतपुर जिले और तेलंगाना में महबूबनगर ज़मीन में मौजूद ​खनिज संपदाओं के लिए जाने जाते हैं. जब ज़मीन की अंदरूनी सतह पर प्राकृतिक रूप से कुछ बदलाव होता है तो ये हीरे ज़मीन के ऊपर आ जाते हैं.’

वह बताते हैं कि हीरों को किम्बरलाइट और लैंम्प्रोइट पाइप में रखा जाता है जो ज़मीन के अंदर होती हैं. यह करनूल और अनंतपुर ज़िलों में पृथ्वी की ऊपरी सतह के नज़दीक होती हैं. पानी, बाढ़ या बारिश उन्हें ज़मीन के ऊपर फेंक देते हैं. ये भी एक कारण है कि इन इलाक़ों में लोग ज्यादातर मानसून में हीरों की खोज करते हैं.

क्या है काला पत्थर

राजा बाबू कहते हैं, ‘इस क्षेत्र में पिछले 5000 वर्षों में हुआ मृदा क्षरण भी हीरों के सतह पर आने का एक कारण है.’

जीएसआई अधिकारियों के मुताबिक, ‘140-190 फीट की गहराई में धरती की नीचली सतह पर मौजूद कार्बन परमाणु अत्यधिक तापमान और दबाव के चलते हीरे में तब्दील हो जाते हैं.’

‘धरती में विस्फोट होने से लावा बनने लगता है और बाद में यही लावा काले पत्थर में बदल जाता है जिसे किम्बरलाइट और लैम्प्रोइट पाइप कहते हैं. ये पाइप हीरे के स्टोर हाउस की तरह कम करते हैं. खनन कंपनियां धरती में इन पाइपों की उपस्थिति के आधार पर हीरे के लिए खुदाई करती हैं.’

16वीं और 17वीं शताब्दी की किताबों और अभिलेखों से पता चलता है कि श्री कृष्णा देवराय और अंग्रेजों के शासन में इस क्षेत्र में खुदाई की जाती थी.

जोन्नागिरी गांव में जॉन टेलर शाफ्ट नाम से मौजूद एक 120 साल पुराने कुंए से पता चलता है कि अंग्रेज़ों के शासन में यहां खुदाई का काम होता था.

इस क्षेत्र के पास किम्बरलाइट पाइप देखे जा सकते हैं. केंद्र सरकार ने 1970 में इस शाफ्ट के आसपास एक हीरा प्रसंस्करण केंद्र शुरू किया था. बाद में किम्बरलाइट पार्क और एक म्यूजियम उसी जगह पर बना दिया गया.

कर्नाटक से भी आते हैं लोग

लोगों की मान्यताओं को प्रमाणित करते हुए, जीएसआई के अतिरिक्त महानिदेशक श्रीधर कहते हैं कि जोन्नागिरी के पास अशोक के चट्टान शिलालेख इस क्षेत्र में खनिज संपदा होने का प्रमाण देते हैं.

हालांकि, आर्केलॉजिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया द्वारा इसकी पुष्टि किए जाने की जरूरत है.

न सिर्फ आंध्र प्रदेश से बल्कि पड़ोसी राज्य जैसे कर्नाटक के बेल्लारी से भी इन गावों में लोग हीरों की तलाश में आते हैं.

वो इन जगहों के आसपास एक अस्थायी आवास बना लेते हैं और अपनी किस्मत आजमाने के लिए पेड़ की छांव, स्थानीय स्कूलों और मंदिरों में रहते हैं और हीरे तलाशते हैं.

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