द्वादश ज्योतिर्लिंगों में नवम् हैं बाबा वैद्यनाथ धाम

Updated at : 25 Jul 2018 4:31 PM (IST)
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द्वादश ज्योतिर्लिंगों में नवम् हैं बाबा वैद्यनाथ धाम

– डा मोहनानंद मिश्र- झारखंड के संतालपरगना प्रमंडल के देवघर में अवस्थित वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग, जिसे द्वादश ज्योतिर्लिंगों में नवम् माना जाता है. वैद्यनाथ नाम से शिव के प्रशस्ति के कारण ही इसे इस नाम से संबोधित किया जाता है. वैद्यनाथ नामकरण के मूल में धार्मिक ग्रंथों में अनेक प्रसंग है. वैद्यनाथ महात्म्य के अनुसार, वैद्यम्यां […]

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– डा मोहनानंद मिश्र-

झारखंड के संतालपरगना प्रमंडल के देवघर में अवस्थित वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग, जिसे द्वादश ज्योतिर्लिंगों में नवम् माना जाता है. वैद्यनाथ नाम से शिव के प्रशस्ति के कारण ही इसे इस नाम से संबोधित किया जाता है. वैद्यनाथ नामकरण के मूल में धार्मिक ग्रंथों में अनेक प्रसंग है. वैद्यनाथ महात्म्य के अनुसार,

वैद्यम्यां पूजित सत्यं लिंग मेत्पुरामम् ।

वैद्यनाथ इति ख्यातं सर्वकामप्रदायकम् ।।

प्राचीन काल में इस लिंग की उपासना वैद्यों ने की थी. इसलिए सर्व कामप्रद इस लिंग की प्रसिद्धि हुई. वैद्यों के धार्मिक इकिवृत को देवताओं के वैद्य अश्विनी कुमारों से संबंधित माना जाता है. शिव रहस्य के पंचमांश में द्वादश ज्योतिर्लिंग माहात्म्य है. इसमें वैद्यनाथ की महिमा का वर्णन मिलता है. लोग सांसारिक बंधन से छूटने के लिए लिंग का पूजन करते हैं. यह वैद्यनाथ नामक लिंग मन के हरने वाला निर्मल लिंग है, जो मनुष्य एक बार भी विल्वपत्र से पूजन कर लिंग का दर्शन करता है, वह मुक्ति प्राप्त करता है तथा पाप समूह और ताप को त्याग कर अमृत को प्राप्त कर अपार दु:खों से छूट जाता है.

शिव रहस्य के इस प्रसंग में भी वैद्यनाथ नामकरण का रहस्य छिपा है. वैद्यनाथ महात्म्य में यह भी प्रसंग है कि शिव की पूजा एक भील कर रहा था. शिव उसकी पूजा से प्रसन्न हो गये. उसे दूसरे जन्म में वैद्यनाथ नामार्थ में वैद्य नाम से जन्म लेने का वरदान मिला. शिवपुराण की कोटिरुद्र संहिता के 28वें अध्याय में यह वर्णन है कि रावण जब शिव को लेकर कैलाश से लंका की ओर जा रहा था, तो उसने मूत्र विसर्जन के क्रम में ब्राह्मण वेशधारी विष्णु के हाथ में लिंग विग्रह को समर्पित किया था. विष्णु द्वारा अचल रूप में लिंग यहां प्रतिष्ठित हुआ. शिव को प्रसन्न करने के क्रम में उसने अपने दशग्रीव को काटकर समर्पित किया था.

उस समय शिव प्रसन्न हो गये और उन्होंने अमोघ दृष्टि से देखकर रावण के दश सिरों को पुन: जोड़ दिया था. इसीलिए इनका नाम वैद्यनाथ पड़ा इस प्रकार वैद्यनाथ नाम से शिव की प्रशस्ति अन्य पुराणों में भी मिलती है. जैसे-गजारण्ये तू वैद्यनाथ अर्थात हाथियों से भरे जंगल में वैद्यनाथ विराजमान हैं. इससे यह पता चलता है कि प्राचीन काल में झारखंड के वन प्रांतर में हाथी प्रचुर रूप में थे. कोलकाता के म्यूजियम में इस क्षेत्र के हाथी का ढांचा आज भी सुरक्षित है. इससे पुराण की सत्यता प्रमाणित होती है. इसका एक नाम हृदयपीठ है, क्योंकि सती का हृदय यहां गिरा है, तंत्र साहित्य में वैद्यनाथ को बगला देवी का उत्तम स्थान कहा गया है. इसलिए तंत्रसार में वैद्यनाथ को महातीर्थ की संज्ञा दी गयी है.

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