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Exclusive: यही वजह है कि मैं द बेस्ट एक्टर वाले अवार्ड नहीं लेता हूं...जानिए ऐसा क्यों कहा के के मेनन ने

Updated at : 29 Aug 2023 2:16 PM (IST)
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Exclusive: यही वजह है कि मैं द बेस्ट एक्टर वाले अवार्ड नहीं लेता हूं...जानिए ऐसा क्यों कहा के के मेनन ने

के के मेनन जल्द ही फ़िल्म लव ऑल में दिखेंगे. जब उनसे पूछा गया कि, लव ऑल बैडमिंटन पर आधारित फ़िल्म है, किस तरह से यह फ़िल्म इस खेल को बढ़ावा देगी? इसपर एक्टर ने कहा, ये बहुत ही खूबसूरत खेल है. उस खूबसूरती के साथ कभी इसे पेश नहीं किया जाता है, खासकर सिनेमा में कभी ये आ ही नहीं पाया है.

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हिंदी सिनेमा के समर्थ कलाकारों में से एक अभिनेता के के मेनन जल्द ही फ़िल्म लव ऑल में नजर आनेवाले हैं. आगामी एक सितंबर को सिनेमाघरों में रिलीज हो रही यह फ़िल्म बैडमिंटन खिलाडियों की यात्रा और मुश्किलों के बारे में है. यह एक पिता पुत्र की भी इमोशनल कहानी है. इस फिल्म से के के मेनन के जुड़ाव और तैयारियों पर उर्मिला कोरी से हुई बातचीत.

लव ऑल बैडमिंटन पर आधारित फ़िल्म है, किस तरह से यह फ़िल्म इस खेल को बढ़ावा देगी?

ये बहुत ही खूबसूरत खेल है,जिस खूबसूरती के साथ ये खेला जाता है. उस खूबसूरती के साथ कभी इसे पेश नहीं किया जाता है, खासकर सिनेमा में कभी ये आ ही नहीं पाया है. बैडमिंटन में कई खास ग्लोरी देश को मिली है. इस फिल्म के निर्देशक ने जब मुझसे ये बात कही तो मुझे लगा कि इस पर फिल्म बननी चाहिए. इसके अलावा इस फिल्म के निर्देशक सुधांशु शर्मा बैडमिंटन खिलाड़ी रहे हैं, तो उन्हें इस खेल से जुड़ी बारीकियों से भी रूबरू करवाया.

किसी किरदार को प्ले करते हुए आपका अप्रोच क्या होता है?

मैं जब भी किसी किरदार से जुड़ता हूं , तो उस इंसान को समझने की कोशिश करता हूं , जिसे मैं प्ले कर रहा हूं. मुझे बस स्क्रिप्ट अच्छी लगती है, उसके बाद मैं और कुछ नहीं सोचता हूं. मैं बस खुद में से बेस्ट उस किरदार में से निकालकर लाता हूं.

निर्देशक कितना मायने रखता है?

बहुत मायने रखता है, क्योंकि आपकी पहली बातचीत निर्देशक के साथ ही होती है. आपको तुरंत समझ आ जाता है कि कितनी वेव लेंथ मिलेगी और आपसी समझदारी कितनी होने वाली है. ये सब बहुत मायने रखता है. बेशक आप कहानी बहुत अच्छी लिखते हो , लेकिन जब आप उसको अमल करने पर आये तब वो आपके हाथ से ना निकल जाए, लेकिन इस फिल्म में बैडमिंटन स्टार है और एक्टर जो भी मुसीबतों से इस दौरान जूझता है,निर्देशक सुधांशु को पता थी क्योंकि वह खुद भी बैडमिंटन प्लेयर रहे हैँ , तो मेरा काम और ज़्यादा आसान हो गय.

किसी फिल्म के दौरान आपको ऐसा लगा हो कि स्क्रिप्ट से अलग फिल्म बन रही है ?

कई बार ऐसा हुआ है.

ऐसे में एक्टर के तौर पर क्या प्रोजेक्ट से जुडी रूचि खत्म हो जाती है ?

वो मैं अफोर्ड नहीं कर सकता हूं. हारते हुए मैच को भी खेलना पड़ता है. हार जानते हुए भी कभी फिल्म को छोड़ता नहीं हूं. अपनी तरफ से बहुत कोशिश करता हूं. ऐसी कई फिल्में थी , जो फ्लोर पर आयी थी,तो मुझे बहुत अच्छी लगी थी, लेकिन शूटिंग के तीसरे दिन ही आपको समझ आ जाता है कि ये फिल्म डूबने वाली है , लेकिन एक प्रोफेशनल के तौर पर आप अपना बेस्ट देना चाहते हैं और मैं वही करता हूं.

विनर की आपकी परिभाषा क्या है?

विनर एक अस्थायी फेज है. अगली बार आप हार भी सकते है. जीत मॉमेंट्री होता है. आप बेस्ट नहीं हो. आपसे भी अच्छा कोई होगा और उससे अच्छा और कोई. यही वजह है कि मैं द बेस्ट वाले अवार्ड नहीं लेता हूं. मैं मानता ही नहीं हूं कि द बेस्ट होता है कहीं. स्पेशली आर्ट में ये सब्जेक्टिव मैटर होता है. किसी को पसंद आता है. किसी को नहीं आता है. द बेस्ट क्या होता है. आपको हमेशा अवार्ड टोकन ऑफ़ एप्रिशिएसन के तौर पर मिल सकता है,लेकिन द बेस्ट बोलना बस आपके ईगो को सहलाना है और कुछ नहीं.

नवाज ने कहा कि बच्चों के साथ अभिनय करना मुश्किल है, इस फ़िल्म में बाल कलाकार आपके लिए कितना मुश्किल रहा?

इस फ़िल्म में जिस उम्र का बच्चा है, उस उम्र के बच्चों के साथ नहीं बल्कि बहुत ही छोटे बच्चे जो होते हैं , जो पप बोलते हैं, उनके साथ मुश्किल होता है. उनके अच्छा टेक के लिए हमें बहुत मेहनत करनी पड़ती है और जब उनका अच्छा टेक हो जाता है, तो वो हमारे टेक को ख़राब कर देते हैं. रो वोकर करके ही सही, इसलिए बच्चों के साथ मुश्किल होती है. बच्चे और जानवरों के साथ एक्टिंग मुश्किल है क्योंकि सारी वह वाही वही ले जाते हैं. इस फिल्म का बच्चा बड़ा है. इस फिल्म में जितने भी बच्चे नज़र आएंगे वो असल ज़िन्दगी में बैडमिंटन प्लेयर है.

आप बैडमिंटन के खेल से कितना जुड़ाव रखते हैं?

एक ज़माने में खेलते थे , फिर टेनिस की और झुकाव हो गया. अब तो मुश्किल है,क्योंकि ये खेल टफ है. स्पोर्ट्स के प्रति मेरा बहुत लगाव है और में खिलाडियों का बेहद सम्मान करता हूं.

आपके बचपन में किस तरह से आपका जुड़ाव खेलों के प्रति रहा था ?

मैं एक स्प्रिंटर था. वो दौर ऐसा था कि लोग स्पोर्ट्स को बहुत ही काम महत्व देते थे और स्पोर्ट्स में बहुत मेहनत की ज़रूरत होती है, तो वो अपने आप ही खत्म हो गया. (हंसते हुए )उसके बाद मैं किसी चीज़ से भागने में इसका इस्तेमाल करने लगा.

इस फ़िल्म से बैडमिंटन स्टार पुलेला गोपीचंद बतौर प्रेजेंटर जुड़े हैँ?

यह संयोग ही था. फिल्म का ट्रेलर उनतक पंहुचा और उन्होंने फ़िल्म को देखने की गुजारिश की. सभी को पता है कि बैडमिंटन उनके लिए क्या मायने रखता है. फ़िल्म देखकर उन्हें लगा कि ये फ़िल्म यूथ और पेरेंट्स में इस खेल के प्रति जागरूकता ला सकती है, इसलिए वे इस फ़िल्म से प्रेजेंटर के तौर पर जुड़ गए.

क्या फ़िल्में बदलाव लाने की कूवत रखती हैं?

कुछ लोगों को बदल सकता है,लेकिन बदलाव की कोई लहर नहीं ला सकता है. फिल्म उस क्षेत्र में ज़िन्दगी के आता है, जहां पर आपकी बेसिक ज़रूरत जब खत्म हो जाती है ,मैंने दस साल पहले भी यही बात कही थी कि कोई क्राइसिस होता है, तो सबसे पहले चीज़ प्राथमिकता में से हटती है वो सिनेमा है. कोविड में यह बात साबित भी हो गयी,तो फ़िल्मी दुनिया से जुड़े हर किसी को उदार होना चाहिए. यह रोटी,कपडा और मकान नहीं है। ये वो आर्ट है,जब आपके पास समय हो,पैसा हो और हालात ठीक ठाक हो, तो ही आप एन्जॉय करते हैं. हमें खुद को भगवान मानना बंद करना चाहिए.

अपने अब तक के करियर से कितने संतुष्ट हैं?

मेरा कोई गोल नहीं है कि ये मिला. ये नहीं मिला. मैं इसे ज़िन्दगी की तरह लेता हूं, जो मिल रहा है, मैं उसमें अपना बेस्ट देना चाहता हूं बस.

ओटीटी की प्रसिद्धि कितनी खास है?

बहुत ज़्यादाय ओटीटी ने एक्टर के तौर पर मुझे अलग – अलग मौके दिए हैं, वरना फिल्मों में जबरदस्ती विलेन बनना पड़ता था, क्योंकि वही एक माध्यम था.

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कोरी

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By कोरी

कोरी is a contributor at Prabhat Khabar.

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