Sholay फिल्म में गब्बर सिंह बनना चाहते थे संजीव कुमार, रमेश सिप्पी की वजह से बनना पड़ा बिना हाथ वाला 'ठाकुर'

Published by : Ashish Lata Updated At : 10 Jul 2023 6:36 AM

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Sanjeev Kumar Birth Anniversary: हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता संजीव कुमार अपनी दमदार एक्टिंग के लिए जाने जाते हैं. उन्होंने अपनी एक्टिंग से लाखों दर्शकों के दिलों पर राज किया है. हालांकि बहुत कम लोग जानते होंगे कि शोले फिल्म में वह ठाकुर नहीं बल्कि गब्बर सिंह का रोल निभाना चाहते थे.

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संजीव कुमार को हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में सबसे बेहतरीन अभिनेताओं में से एक के रूप में याद किया जाता है. उनकी जबरदस्त एक्टिंग, बेहतरीन ढंग से डायलॉग्स बोलने का स्टाइल और प्रभावशाली काम ने उन्हें काफी बड़ा बना दिया. अभिनेता का जन्म 9 जुलाई 1938 को सूरत में एक गुजराती परिवार में हुआ था. जब वह बहुत छोटे थे, तो वह मुंबई आ गए. एक फिल्म स्कूल में एक स्टंट ने उन्हें बॉलीवुड तक पहुंचाया, जिसके बाद उन्होंने खूब मेहनत की और कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. हालांकि साल 1985 में 47 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया, लेकिन उनके फैंस आज भी उन्हें याद करते हैं. शोले फिल्म में उन्होंने ठाकुर बलदेव सिंह” का किरदार निभाया था. लेकिन क्या आप जानते हैं कि संजीव ये किरदार नहीं निभाना चाहते थे.

गब्बर बनना चाहते थे संजीव कुमार

शोले फिल्म तो लगभग सभी ने देखी होगी. फिल्म की कहानी से लेकर जय-वीरू की दोस्ती और गब्बर सिंह के डायलॉग्स काफी ज्यादा फेमस हैं. गब्बर सिंह जब सांभा को कहते थे, ‘कितने आदमी थे’… मां बच्चों को कहती थी ‘सो जाओ नहीं तो गब्बर आ जाएगा’ डायलॉग ने अमजद खान को अमर बना दिया. ऐसे में क्या आपको पता है कि ठाकुर का आइकॉनिक रोल निभाने वाले संजीव कुमार फिल्म में गब्बर का किरदार निभाना चाहते थे. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो उन्होंने मेकर्स को कहा था कि वो गब्बर की भूमिका निभाएंगे. हालांकि रमेश सिप्पी को ये बात कतई मंजूर नहीं थी. वह संजीव को ठाकुर की डकैत नहीं बल्कि ठाकुर की तरह देखते थे. जिसके बाद अमजद खान को ये आइकॉनिक रोल मिल गया.

अमजद खान नहीं थे गब्बर सिंह बनने के लिए पहली पसंद

हिंदी सिनेमा के मशहूर लेखक जावेद अख्तर और सलीन खान ने शोले की पूरी कहानी लिखी. इस फिल्म के हर किरदार के दमदार डायलॉग आज भी लोगों के जुबान पर रहते हैं. रिपोर्ट्स की मानें तो गब्बर सिंह के रोल के लिए जावेद अख्तर की पहली पसंद डैनी डेनजोंगपा थे और उन्हें ये किरदार ऑफर भी की गई थी, लेकिन उन्होंने ठुकरा दिया. डैनी उन दिनों फिरोज खान की फिल्म ‘धर्मात्मा’ की शूटिंग में बिजी थे जिस वजह से वह ‘शोले’ में काम नहीं कर पाए.

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संजीव कुमार की फिल्में

उन्होंने दस्तक (1970) और कोशिश (1972) फिल्मों में अपने अभिनय के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के दो राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार सहित कई प्रमुख पुरस्कार जीते. संजीव कुमार को ऐसी भूमिकाएं निभाने में कोई आपत्ति नहीं थी जो गैर-ग्लैमरस हों, जैसे कि उनकी उम्र से कहीं ज़्यादा के किरदार हो. शोले (1975), अर्जुन पंडित (1976) और त्रिशूल (1978), खिलोना (1970), नया दिन नई रात (1974), यही है जिंदगी ( 1977), देवता (1978) और राम तेरे कितने नाम (1985) उनकी बहुमुखी प्रतिभा का उदाहरण हैं. उन्होंने शिकार (1968), उलझन (1975) और तृष्णा (1978) और क़त्ल (1986) जैसी सस्पेंस-थ्रिलर फिल्में भी कीं.

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Ashish Lata

लेखक के बारे में

By Ashish Lata

आशीष लता डिजिटल मीडिया की अनुभवी पत्रकार हैं और वर्तमान में प्रभात खबर में सीनियर कंटेंट राइटर के साथ एंटरटेनमेंट हेड के रूप में कार्यरत हैं. मीडिया इंडस्ट्री में करीब 7 साल का अनुभव रखने वाली आशीष ने एंटरटेनमेंट से लेकर देश-दुनिया और विभिन्न राज्यों की खबरों पर गहराई से काम किया है. बिहार, मध्यप्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों से जुड़ी खबरों के कंटेंट प्रोडक्शन में भी उनकी मजबूत पकड़ रही है. वह खबरों को आसान, रोचक और पाठकों की रुचि के अनुसार पेश करने के लिए जानी जाती हैं. एंटरटेनमेंट जर्नलिज्म में आशीष की खास दिलचस्पी सिनेमा और सितारों की दुनिया से जुड़ी खबरों में रही है. वह बॉलीवुड और टीवी इंडस्ट्री की थ्रोबैक स्टोरीज, BTS अपडेट्स, सेलेब्रिटी गॉसिप, बॉक्स ऑफिस रिपोर्ट, टीवी शोज, वेब सीरीज और स्टार इंटरव्यू जैसे विषयों पर लगातार लिखती रही हैं. इसके अलावा स्पेशल और प्रीमियम न्यूज कंटेंट तैयार करने में भी उनकी खास विशेषज्ञता मानी जाती है. उनकी राइटिंग स्टाइल में फैक्ट्स, एंटरटेनमेंट वैल्यू और रीडर्स फर्स्ट अप्रोच का अच्छा संतुलन देखने को मिलता है. आशीष लता ने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत प्लस न्यूज से की थी. यहां उन्होंने बिहार में एंकर और रिपोर्टर के रूप में काम करते हुए कई महत्वपूर्ण ग्राउंड रिपोर्ट्स कीं. इस दौरान उन्होंने अशोक चौधरी और नगर निगम अध्यक्ष जैसे कई प्रमुख नेताओं के इंटरव्यू भी किए. शुरुआती दौर में रिपोर्टिंग और फील्ड जर्नलिज्म के अनुभव ने उनकी लेखन शैली और न्यूज प्रेजेंटेशन को और मजबूत बनाया. इसके बाद आशीष ने एबीपी न्यूज और ईटीवी भारत जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम किया। इन संस्थानों में रहते हुए उन्होंने न्यूज कवरेज, डिजिटल कंटेंट और एंटरटेनमेंट रिपोर्टिंग के कई अलग-अलग फॉर्मेट्स पर काम किया. लगातार बदलते डिजिटल मीडिया ट्रेंड्स को समझते हुए उन्होंने अपने कंटेंट को हमेशा ऑडियंस फ्रेंडली और SEO ऑप्टिमाइज्ड बनाए रखा. पटना में जन्मी आशीष लता की शुरुआती पढ़ाई पटना सेंट्रल स्कूल, सीबीएसी से हुई. इसके बाद उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से बैचलर ऑफ मास कम्युनिकेशन की डिग्री हासिल की. आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से मास्टर्स ऑफ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया किया. उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि और मीडिया अनुभव उन्हें हिंदी पत्रकारिता के उन मूल सिद्धांतों की मजबूत समझ प्रदान करते हैं, जो जर्नलिज्म के बेसिक प्रिंसिपल 5Ws+1H यानी पर आधारित न्यूज राइटिंग के लिए बेहद जरूरी माने जाते हैं.

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