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Petrol Diesel Price: बसों से सफर करना 40 फीसदी तक हुआ महंगा, डीजल की बढ़ती कीमत ने बिगाड़ा खेती का गणित

Updated at : 09 Apr 2022 12:50 PM (IST)
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Petrol Diesel Price: बसों से सफर करना 40 फीसदी तक हुआ महंगा, डीजल की बढ़ती कीमत ने बिगाड़ा खेती का गणित

Petrol Diesel Price: बसों से सफर करना 40 फीसदी तक महंगा हुआ है. डीजल की बढ़ती कीमत ने खेती का भी गणित बिगाड़ दिया है.

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Petrol Diesel Price: ”सर, कितना लीटर दे? अरे… लीटर क्या देखना है, टंकी फुल कर दो….” मधेपुरा के पेट्रोल पंप पर यह वार्तालाप सुना जानेवाला संवाद अब बीते दिनों की बात हो गयी है. पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगातार वृद्धि ने पेट्रोल पंप कर्मी और ग्राहकों के बीच के संवाद को पूरी तरह समाप्त कर दिया है. अब पंपों पर पेट्रोल लेने के लिए आनेवाले ग्राहक जरूरत और अपनी जेब के हिसाब से सीमित मात्रा में पेट्रोल ले रहे हैं.

पेट्रोल और डीजल के शतक से लोगों की सिमटी आमदनी

पेट्रोल का दाम पिछले कुछ महीनों से बढ़ते-बढ़ते अब 117 रुपये 22 पैसे तक पहुंच गया है. वहीं, डीजल का मूल्य भी शतक लगा चुका है. वही, प्रीमियम पेट्रोल का मूल्य 121 रुपया 23 पैसे प्रति लीटर तक पहुंच गया है. वैसे पेट्रोल के पीछे चल कर डीजल का दाम 101 रुपए तक आ गया है. आलम यह है कि व्यवसायी समेत हर तबके के लोग अपनी सिमटी आमदनी के बीच पेट्रोल और डीजल की महंगाई का अतिरिक्त आर्थिक दबाव झेल रहे हैं. निजी गाड़ी मालिक तो परेशान हैं ही, सार्वजनिक क्षेत्र के वाहन मालिकों की स्थिति और भी खराब हो गयी है.

बढ़ती कीमतों ने प्रभावित किया पेट्रोलियम कारोबारियों का व्यवसाय

पेट्रोलियम व्यवसाय को महंगाई ने जहां आहत किया है, वहीं आम आदमी भी इससे प्रभावित हो रहा है. पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों से पेट्रोलियम कारोबारियों का व्यवसाय भी प्रभावित हुआ है. इससे पेट्रोल पंप मालिकों के व्यवसाय को नुकसान पहुंच रहा है. कई पंप मालिकों ने बताया कि अब बार-बार दाम बढ़ने से बिक्री प्रभावित हो रही है. कारोबार पर ब्रेक लगने लगा है.

अब कम दिखते हैं कार और बाइक की टंकी फुल करानेवाले ग्राहक

पेट्रोल पंप मालिकों के मुताबिक, तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण व्यवसाय को 18 से 20 फीसदी तक नुकसान हुआ है. पेट्रोल पंप संचालक चंदन बताते हैं कि अब तो कार और बाइक में टंकी फुल करने के लिए कहनेवाले ग्राहक कम ही दिखते हैं. अब हर कोई पेट्रोल भराने से पहले अपनी जेब टटोलता है. उसके बाद बजट के हिसाब से तेल खरीदता है.

सार्वजनिक परिवहन क्षेत्र को हो रहा नुकसान

सार्वजनिक क्षेत्र के सभी व्यवसाय पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों से प्रभावित हुआ है. बस और ट्रक व्यवसायियों के लिए यह प्रत्येक भाड़े पर नुकसान पहुंचा रहा है. वाहन मालिकों का कहना है कि तेल के दाम बढ़ गये हैं. सड़क की दूरी कम नहीं हुई है. इस लिहाज से भाड़ा बढ़ाने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है. लेकिन, सवाल है कि कब कितना भाड़ा बढ़ाएं, क्योंकि यहां हर एक-दो दिन पर कीमतें बढ़ जा रही हैं. भाड़ा बढ़ाने का असर ट्रांसपोर्टिंग से आनेवाले उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों में भी असर हो रहा है. इससे जरूरत के सामान महंगे होने लगे हैं.

बस से सफर करना हुआ महंगा, स्कूल वैन का भी बढ़ा किराया

बसों से सफर करना महंगा साबित होने लगा है. निजी बसों सहित स्कूल के वैन का किराया बढ़ गया है. डीजल के बढ़े दाम का सबसे अधिक असर परिवहन पर पड़ रहा है. सभी छोटे वाहनों के किराये प्रति किलोमीटर डेढ़ से दो रुपये हो गए हैं. मधेपुरा से पूर्णिया के किराये में 33 फीसदी से ज्यादा की वृद्धि हो गयी है. पहले पूर्णिया का भाड़ा 120 रुपया था, अब बढ़ कर 160 हो गया है. भागलपुर का किराया 130 रुपये से बढ़ कर 180 रुपये हो गया है. मधेपुरा से सहरसा पहले 20 रुपये था, जो अब 50 रुपए हो गया है. वहीं, सुपौल जाने के लिए लोगों को पहले 50 रुपये देना पड़ता था. वहीं, अब 70 रुपये देना पड़ रहा है. मधेपुरा से पटना के लिए 350 रुपये देने पड़ रहे थे, लेकिन अब 400 रुपये देना पड़ रहा है.

डीजल की बढ़ती कीमत ने बिगाड़ा खेती का गणित

जिले के किसानों की की हालत भी अच्छी नहीं है. मक्के की फसल की कीमत नहीं मिल पा रही है. कभी बाढ़ तो कभी सूखा किसानों की उम्मीदों पर पानी फेरता रहा है. खरीफ की प्रमुख फसल धान की खेती का काम शुरू है. डीजल की कीमतों में भारी वृद्धि ने धान की खेती का गणित ही बिगाड़ दिया है. हालत यह है कि एक एकड़ खेती पर खर्च होनेवाली राशि में वृद्धि होना निश्चित है. खेत की जुताई से होकर खाद बीज की भी कीमत बढ़ गयी है. उसके साथ प्रति कट्ठा एक फेरा खेत की जुताई के लिए ट्रैक्टर का किराया 30 रुपया तक बढ़ गया है. पेट्रोल की कीमतों में 36 फीसदी की बढ़ोतरी हो चुकी है. मालवाहक वाहनों के किराए 30 फीसदी तक की वृद्धि हुई है. इसके चलते खाद-बीज व कीटनाशक की कीमतों में 35 फीसदी तक इजाफा हुआ है.

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